उम्र कहने को भले ही एक आंकड़ा है, लेकिन इस बढ़ते आंकड़े का असर शरीर और दिमाग दोनों पर होता है। बढ़ती उम्र के साथ प्राकृतिक तौर पर मिली शारीरिक और मानसिक शक्तियां धीरे-धीरे कम होती जाती हैं। यह भी एक सहज प्रक्रिया है। यदि आप सही और संतुलित जीवन नहीं जीते, तो उम्र के ये निशान समय से पहले भी नजर आ सकते हैं। लेकिन कई बार आपने ऐसे लोगों को देखा होगा, जो उम्र के इस बढ़ते असर से बेफिक्र जीवन जीते हैं। ऐसे लोगों पर बढ़ती उम्र खास फर्क नहीं डालती। इसके बिल्कुल विपरीत कुछ लोग उम्र के बढ़ने के ख्याल से ही इस तरह परेशान हो जाते हैं कि वे मानसिक रूप से कई उलझनों के शिकार हो जाते हैं। मिडलाइफ क्राइसिस यानी उम्र के 45 से 65वें पड़ाव पर दिमाग को उलझाने वाली स्थिति। जब इंसान को अपनी उम्र और इससे जुड़ी स्थितियों को लेकर हताशा, चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी आदि जैसे अनुभव होने लगते हैं। जरूरी नहीं कि यह हर व्यक्ति के साथ हो ही, लेकिन जिनके साथ होती है, उन्हें इससे समय रहते न निकाला जाए तो डिप्रेशन की घातक स्थिति भी बन सकती है। इसलिए मिडलाइफ क्राइसिस को लेकर सही कदम उठाना बहुत जरूरी है।