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विशेषज्ञ से जानें: कोई भी वैक्सीन कितने प्रतिशत तक प्रभावी है, इसका कैसे पता लगाते हैं?

Mon, 05 Jul 2021 02:55 PM IST
सोनू शर्मा हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना वैक्सीन - फोटो : iStock
देश में कोरोना के खिलाफ टीकाकरण अभियान काफी तेजी से चल रहा है। इस राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान के तहत अब तक 35 करोड़ 28 लाख से अधिक टीके लगाए जा चुके हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि बीते 24 घंटे में 14 लाख 81 हजार टीके लगाए गए। हालांकि बीते कुछ दिनों के मुकाबले टीकाकरण की रफ्तार कम हुई है, क्योंकि कुछ दिन पहले रोजाना 50 लाख से अधिक टीके लगाए जा रहे थे। इस बीच स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि सरकार पूरे देश में कोविड टीकाकरण की गति को तेज करने के लिए प्रतिबद्ध है। फिलहाल भारत में कोरोना की तीन वैक्सीन का इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा भी कई अन्य कंपनियों की वैक्सीन को भी भारत लाने की तैयारी चल रही है। आइए विशेषज्ञ से जानते हैं कि भारत में और कौन-कौन सी वैक्सीन आने वाली हैं और कोई भी वैक्सीन कितने प्रतिशत तक प्रभावी है, इसका कैसे पता लगा सकते हैं? साथ ही वैक्सीन से जुड़े कुछ अन्य सवालों के जवाब भी जानिए... 
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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
वैक्सीन की दूसरी डोज के गैप को लेकर कई लोग भ्रम में हैं, सही समय क्या है? 
  • पीएचएफआई के अध्यक्ष डॉ. के. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, 'अगर किसी को कोविशील्ड या कोवाक्सिन की पहली डोज लगने के बाद कोरोना हो गया है, तो ठीक होने के तीन महीने बाद दूसरी डोज लेनी है। कोरोना से ठीक होने के बाद माना जाता है कि उसके अंदर एंटीबॉडीज बन गई हैं, जो उन्हें वायरस की गंभीरता से बचाती हैं। इसके अलावा जिन लोगों ने कोविशील्ड की पहली डोज ले ली है, तो उन्हें दूसरी डोज तीन महीने के बाद ही लेनी है, जबकि कोवाक्सिन की दूसरी डोज एक महीने में ही लेनी है।' 
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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
कई वैक्सीन आने के बाद अब लोग सोच में हैं कि कौन सी लगवाएं, क्या कहेंगे? 
  • डॉ. के. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, 'हमारे देश में तीन वैक्सीन लगाई जा रही हैं, कोविशील्ड, कोवाक्सिन और स्पूतनिक-वी। इसके अलावा कई वैक्सीन जो विदेश में बनी हैं, उन्हें भी भारत लाने की योजना चल रही है। इसके अलावा भारत में भी कई अन्य वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है। इस लोग इस चक्कर में फंस रहे हैं कि कौन सी वैक्सीन सबसे अच्छी है या ये अच्छी नहीं है। ऐसे लोगों से कहना चाहते हैं कि इस चक्कर में न फंसें। ये जरूरी है कि शरीर में संक्रमण से पहले ही इम्यूनिटी बन जाए, ताकि अगर संक्रमण हो भी तो उसकी गंभीरता कम हो। आने वाले दिनों में और वैक्सीन आएंगी, फिर तो आप और असमंजस में आ जाएंगे। इस बात का ध्यान रखें कि सभी वैक्सीन कोरोना के खिलाफ कारगर हैं।' 

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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
जर्मनी में मिश्रित टीके की मंजूरी मिल गई है, यह कितनी सुरक्षित है? 
  • डॉ. के. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, 'इस प्रकार का प्रयोग कई देशों में किया गया है। पहले अमेरिका में मॉडर्ना और फाइजर की वैक्सीन दी गई है। दोनों एक किस्म की वैक्सीन हैं, लेकिन अलग-अलग हैं। वहां तब शुरू में फाइजर नहीं मिलने पर मॉडर्ना और मॉडर्ना नहीं मिलने पर फाइजर लगाई गई थी। इसके अलावा यूरोप में भी कुछ जगहों पर जहां एस्ट्राजेनेका की डोज पहले लगी थी, उनमें से कुछ उम्रदराज लोगों में साइड-इफेक्ट निकले तो उन्हें दूसरी डोज फाइजर या मॉडर्ना देने की अनुमति दी गई। इसके बाद जांच के नतीजों में सामने आया कि जिन्हें एस्ट्राजेनेका का पहला शॉट लगा है और दूसरा मॉडर्ना या फाइजर का, उनकी इम्यूनिटी बढ़ रही है। हमारे यहां भी इस तरह के प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन अभी तक इसे दिया नहीं जा रहा है।' 
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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
भारत में और कौन कौन सी वैक्सीन आने वाली हैं? 
  • डॉ. के. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, 'जो वैक्सीन विदेश में बन चुकी हैं और सरकार उन्हें लाने की चर्चा में लगी हुई है, उनमें मॉडर्ना की वैक्सीन जल्द आने की संभावना है। फाइजर की वैक्सीन भी आ सकती है। सरकार इस कोशिश में भी लगी है कि केवल इम्पोर्ट करके ही वैक्सीन न आए बल्कि भारत में भी बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाए। इसके अलावा, हमारे देश में अब जॉनसन एंड जॉनसन, जो सिंगल डोज वैक्सीन है और नोवावैक्स वैक्सीन, जो सीरम इंस्टीट्यूट में बनेगी, ये भी काफी प्रभावशाली वैक्सीन हैं। इसके साथ हैदराबाद में बायोलॉजिकल-ई और जायडस कैडिला भी वैक्सीन बना रहे हैं। साथ ही कुछ और वैक्सीन, जो इंजेक्शन वाली नहीं बल्कि मुंह के जरिये या नाक के जरिये लेने वाली हैं, बन रही हैं। मान कर चलें कि अगले 4-6 महीनों में कई वैक्सीन हमारे देश में प्रवेश करेंगी।' 
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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
कोई भी वैक्सीन कितने प्रतिशत तक प्रभावी है, इसका कैसे पता लगाते हैं? 
  • डॉ. के. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, 'जब वैक्सीन का ट्रायल होता है तो समान उम्र, लिंग आदि के लोगों को दो भागों में बांट दिया जाता है। आधे लोगों को वैक्सीन लगाते हैं और आधे लोगों को नहीं लगाते हैं। तब देखते हैं कि वैक्सीन जिन्हें लगी है, उन्हें अगर कोरोना का संक्रमण हुआ है, तो कितना हुआ और बीमारी कितनी गंभीर थी, किसी की मृत्यु तो नहीं हुई। उसी प्रकार जिन्हें वैक्सीन नहीं लगी है, उनका भी परीक्षण किया जाता है। दोनों ग्रुप की तुलना की जाती है और पता चलता है कि वैक्सीन बीमारी से बचाने में कितनी कारगर है।' 
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