सियाचिन को दुनिया का सबसे ऊँचा रणक्षेत्र कहा जाता है। अगर नाम के मतलब पर जाएँ तो सिया मतलब है गुलाब और चिन मतलब जगह यानी गुलाबों की घाटी। भले ही नाम का अर्थ गुलाबों की घाटी हो लेकिन मौसम के हालिया हालातों में सियाचिन में फौज कांटों की सेज पर होने जैसी स्थितियों में काम कर रही है। जानकर हैरानी होगी कि जितने तापमान में मैदानी इलाके के लोग अपने घरों से नहीं निकलना चाहते उससे 25 डिग्री कम के तापमान में बेहद विषम परीस्थितियों के बावजूद सरहद पर सेना के जवान देश की रक्षा कर रहे हैं, तस्वीरों में देखें कैसे हालातों में काम करते हैं सियाचिन के सैनिक।
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सियाचिन में भारतीय सेना के बेस कैंप से सबसे दूर स्थित पोस्ट इंद्रा कॉल समेत पूरे सियाचिन में आजकल तापमान शून्य से करीब 10 डिग्री सेल्सियस नीचे रहता है। पैदल मार्ग से इंद्रा कॉल पोस्ट तक सैनिकों को पहुंचने के लिए 20-22 दिनों का समय लग जाता है।
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मुश्किल हालातों और बर्फिले तूफानों वाले दुनिया के इस सबसे मुश्किल रणक्षेत्र में सैनिकों को कई बार हिमस्खलन और बेहद कम तापमान वाले मौसम से जूझना पड़ता है। सियाचिन में हाल का तापमान करीब -14 डिग्री के आसपास है जो न्यूनतम -50 डिग्री तक पहुंच जाता है।
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बेहद कम तापमान के मौसम और चारो तरफ बर्फ से न सिर्फ पर्यावरण की दुश्वारियां सैनिकों की जान ले सकता हैं बल्कि बर्फिले पहाड़ों पर पड़ने वाली धूप की चमक से फौजियों को आंख की रोशनी जाने का डर भी रहता है।
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सियाचिन में सर्द रातों में चलने वाली हवाओं में बर्फ के कण मिलकर ये हवाएं और सर्द बन जाती हैं। ऐसे में फौजियों को मौसम की दुश्वार हालत से बचने के लिए एक विशेष तरह का कोट पहनने के लिए दिया जाता है।
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सर्द मौसम के समय पहाड़ों पर होने वाले हिमस्खलन के कारण कई बार फौजियों की जान चली जाती है। इसके अलावा पहाड़ों पर ऑक्सीजन की कमी से भी कई बार फौजियों की नींद में ही मौत हो जाने का खतरा बना रहता है।
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सियाचिन में दुर्गम परीस्थितियों में सेना के हेलीकॉप्टरों की मदद से सप्लाई पहुंचाई जाती है। कहते हैं सियाचिन में पहुंचने वाली जो रोटी मैदानी इलाके में 2 रूपए में मिल जाती है सियाचिन ले जाने तक में उसका मूल्य करीब 200 रूपए तक हो जाता है।
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खाने के अलावा सियाचिन की भौगोलिक परीस्थितियों की वजह से फौजियों को उनकी सर्विसेज की तैनाती के दौरान नहाने और दाढ़ी बनाने की अनुमति नहीं होती। दरअसल इसके पीछे वजह ये है कि सियाचिन के मौसम के कारण शरीर की त्वचा इतनी नाजुक हो जाती है कि अगर दाढ़ी बनाने के दौरान त्वचा कट जाए तो उसे भरने में महीनों का समय लग सकता है।
इन तमाम मुश्किलों के बीच जहां फौजियों को कई विषम परीस्थितियों से गुजरना पड़ता है वहीं उनके पास मनोरंजन के लिए कोई सुविधा भी नहीं होती। लेकिन देश की हिफाजत का जज्बा और सेना की कठिन ट्रेनिंग के कारण देश के रक्षक पूूरी प्रतिबद्धता से तिरंगे की हिफाजत में तैनात रहते हैं।