दुर्गम चोटियों पर दुश्मन से लोहा लेते हुए जो चुनौतियां सामने आईं, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। एक तरफ तीनों चोटियों पर बैठी पाकिस्तानी सेना, दूसरी तरफ नीचे बुलंद हौसला लिए भारत माता के जांबाज सपूत। करीब तीन महीने के इस युद्ध मेें दुश्मन ऊपर से एक-एक हरकत देख वार कर रहा था, तो भारतीय सेना हर हाल में उन्हें धूल चटा उन्हें उनकी औकात पर आमादा थी। सबसे ज्यादा बहादुरी के अवार्ड भी फौजियों को इसी लड़ाई में मिले। पूर्व सैनिक सेवा परिषद के उधमपुर जिला के अध्यक्ष मेजर उमा कांत शर्मा ने कारगिल युद्ध से जुड़ी याद ताजा करते हुए बताया कि यह उन दिनों की बात है, जब मैं अखनूर में आर्मी के हेडक्वार्टर मेें तैनात था। आर्मी की ट्रांसपोर्ट बटालियनें डिस्बैंड की जा रही थीं। हेडक्वार्टर मेें हमने अपने मुख्य अधिकारियों के सहयोग से राजोरी, नौशेरा से इस एक माउंटेन आर्टिलरी बटालियन को डिस्बैंड होने से रुकवाया था, जो कारगिल के युद्ध में काकसर और अन्य दुर्गम पहाड़ियों में सेना के तोपखाने को ले जाने में बहुत ही मददगार साबित हुए। मेजर उमा कांत शर्मा के अनुसार सबसे भयंकर सामना दुश्मन से द्रास सेक्टर के तोलोलिंग की पहाड़ियों, प्वाइंट 5140 और टाइगर हिल पर हुआ। यह रक्षा के मुताबिक अति महत्वपूर्ण थे। यहां पर दुश्मन हमारा लेह का रास्ता रोके हुए काफी नुकसान पहुंचा रहा था। वहीं श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग को चालू रखना आर्मी की पहली जरूरत थी। द्रास के सामने वाली तीनों पहाडि़यों पर पाकिस्तान की बड़ी संख्या में फौज थी।