गढ़चिरौली जिले में बुधवार को नक्सलियों द्वारा किए गए आईईडी विस्फोट में महाराष्ट्र पुलिस के 15 सी 60 जवान शहीद हो गए हैं। इनकी क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नक्सली इस फोर्स से सीधी लड़ाई कर ही नहीं सकते। जहां नक्सलियों को सी 60 बल के जवानों के होने का पता लगता है वे उस स्थान से भाग जाते हैं। जानिए क्या है इस फोर्स की खासियत और इन्हें कैसे मिला सी 60 का नाम:
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सांकेतिक तस्वीर
गढ़चिरौली जिले की स्थापना के बाद से ही पूरे क्षेत्र में नक्सली गतिविधियां बढ़ गई थी। इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए तत्कालीन पुलिस अधीक्षक केपी रघुवंशी ने 1 दिसंबर 1990 को सी 60 की स्थापना की।
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लतेहार में सीआरपीएफ जवान नक्सलियों से जब्त हथियारों के साथ
- फोटो : CRPF
उस वक्त सी 60 में सिर्फ 60 विशेष कमांडो की भर्ती हुई थी। जिससे इसे यह नाम मिला। नक्सली गतिविधियों को रोकने के लिए गढ़चिरौली जिले को दो भागों में बांटा गया। पहला उत्तर विभाग, दूसरा दक्षिण विभाग।
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कमांडो
- फोटो : social media
इन कमांडो को विशेष ट्रेनिंग दी जाती है जिसके बाद वह जिले के विभिन्न हिस्सों में जाकर नक्सल विरोधी अभियान को चलाते हैं। इतना ही नहीं वह नक्सलियों के परिवार, नाते-रिश्तेदारों से मिलकर उन्हें सरकार की योजनाओं के बारे में बताकर समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का काम भी ये जवान करते हैं।
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नक्सली गतिविधियां बढ़ीं
- फोटो : अमर उजाला
इतना ही नहीं, सी 60 के जवान केवल सैन्य कार्रवाई ही नहीं करते। ये जवान नक्सली इलाकों में जाकर एक प्रशासनिक अधिकारी की तरह काम करते हैं। जिससे वहां भी सरकार की योजनाओं का प्रचार प्रसार हो और लोगों की समस्याएं प्रशासन तक पहुंचे।
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नक्सली हमला
- फोटो : gettty
इनका दिन-रात किसी भी समय कार्रवाई करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इन विशेष कमांडो को विषम परिस्थितियों में जूझने के लिए विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। इनकी ट्रेनिंग राज्य के बाहर भी होती है। जिसमें हैदराबाद, एनएसजी कैंप मनेसर, कांकेर, हजारीबाद में होता है।