फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फिराक गोरखपुरी की जयंती पर विशेष: 'ऐ मौत आके खामोश कर गई तू, सदियों दिलों के अंदर गूंजते रहेंगे हम'

Fri, 28 Aug 2020 08:58 AM IST
vivek shukla शैलेश चौरसिया/ब्रजेन्द्र सिंह, बरनवारपार/कुईं बाजार।
विज्ञापन
1 of 8
Firaq Gorakhpuri - फोटो : अमर उजाला।
‘आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हम-असरों, जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने फिराक को देखा है।’ मशहूर शायर रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी की कलम से लिखीं ये पंक्तियां आज काफी कुछ हकीकत सी बयां करती हैं। उर्दू अदब की दुनिया में जिन नामों ने गोरखपुर को राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई, उनमें फिराक साहब का नाम सबसे पहले और पूरे अदब के साथ लिया जाता है।
विज्ञापन

2 of 8
Firaq Gorakhpuri - फोटो : अमर उजाला।
उन्होंने अपने नाम के आगे गोरखपुरी जोड़कर गोरखपुर को अदब की दुनिया में अमर कर दिया। फिराक साहब बागी तेवर के साथ ही जिंदादिली व नेकदिली के भी मिसाल रहे। इन्हीं वजहों से वह उर्दू शायरी के अजीम शायर के रूप में न केवल मशहूर हुए बल्कि एक ऐसे मुकाम पर पहुंचे जहां हर शायर को पहुंचने की ख्वाहिश होती है। अदब की दुनिया के फनकार कहे जाने वाले फिराक गोरखपुरी का नाम देश-दुनिया में भले ही सम्मान से लिया जाता हो, लेकिन हुक्मरानों और अफसरानों की उदासीनता के चलते उनके पैतृक आवास व उनसे जुड़ी यादें धीरे-धीरे दम तोड़ती नजर आ रही हैं।

 
विज्ञापन

3 of 8
Firaq Gorakhpuri - फोटो : अमर उजाला।
यह विडंबना ही है कि गोरखपुर का नाम देश-दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचाने वाले मशहूर शायर फिराक साहब की जयंती हो या पुण्यतिथि सिर्फ बातों में ही गुजर जाती है। हुक्मरान से लेकर अफसरान तक किसी को फुरसत नहीं कि उनकी याद में कोई ऐसा आयोजन करें जो उनको सच्ची श्रद्धांजलि देने के साथ ही नई पीढ़ी को फिराक साहब के जीवन से जुड़ी यादों व साहित्य की दुनिया से रूबरू करा सके। गोला तहसील क्षेत्र के बनवारपार निवासी पेशे से वकील मुंशी गोरख प्रसाद इबरत के पुत्र के रूप में 28 अगस्त 1896 में रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी का जन्म हुआ था। फिराक साहब के पिता पेशे से वकील भले ही थे, लेकिन शायरी में उनका अच्छा दखल था। या यूं कहें कि फिराक साहब को शायरी विरासत में मिली थी।

 

4 of 8
Firaq Gorakhpuri - फोटो : अमर उजाला।
बचपन का बड़ा हिस्सा बनवारपार में गुजारने के बाद फिराक साहब ने प्रयागराज विश्वविद्यालय से पढ़ाई मुकम्मल की। वर्ष 1930 में अंग्रेजी साहित्य से एमए करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही उन्होंने ने 1930 से 1959 तक अंग्रेजी शिक्षक की जिम्मेदारी संभाली। अंग्रेजी पढ़ने व पढ़ाने वाले फिराक साहब ने न सिर्फ कालजयी रचनाओं के लिए ज्ञानपीठ, पद्मभूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान हासिल किए बल्कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की भूमिका निभाते हुए आने वाली नस्लों को मनन करने के लिए बहुत कुछ छोड़ गए। फिराक साहब 3 मार्च 1982 को अंतिम सांस लेकर दुनिया को अलविदा कह गए।
विज्ञापन

5 of 8
फिराक गोरखपुरी का पुश्तैनी खपरैल का मकान।(इनसेट में फिराक गोरखपुरी की फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।
बनवारपार वालों को उपेक्षित हाल में नजर आने वाले फिराक गोरखपुरी का पैतृक आवास देखकर बेहद मलाल होता है। उनकी पीड़ा तब और बढ़ जाती है जब जयंती या पुण्यतिथि पर भी इस स्थान पर फिराक की याद में कोई आयोजन नहीं होता। फिराक लाइब्रेरी के पास लगी उनकी प्रतिमा पर फिराक साहब सेवा संस्थान के अध्यक्ष डॉ. छोटेलाल यादव सरीखे कुछ चंद लोगों के अलावा कोई भी जिम्मेदार श्रद्धा के दो फूल तक चढ़ाने के लिए नहीं पहुंचता। हालांकि उनकी अजीम शख्सियत ऐसी किसी पहचान की मोहताज नहीं है। जबकि फिराक साहब ने लिखा है, ‘ऐ मौत आके खामोश कर गई तू, सदियों दिलों के अंदर गूंजते रहेंगे हम।’
विज्ञापन

6 of 8
फिराक गोरखपुरी का मकान। - फोटो : अमर उजाला।
फिराक साहब का पुश्तैनी खपरैल का मकान देखरेख के अभाव में पूरी तरह से जर्जर हाल में पहुंच चुका है। बारिश की वजह से कुछ दिन पहले फिराक साहब के मकान का कुछ हिस्सा ढह गया, लेकिन आज तक किसी भी जनप्रतिनिधि या अधिकारी ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लेने तक की जहमत नहीं उठाई। इस बात को लेकर बनवारपार के लोगों के साथ ही साहित्य व शायरी में रुचि रखने वालों में बेहद आक्रोश है। प्रवीण श्रीवास्तव, शंभूनाथ मिश्र, महीप श्रीवास्तव, संतोष कुमार, हरिद्वार यादव, डॉ. तालिब गोरखपुरी का कहना है कि फिराक साहब से जुड़ी स्मृतियों को संरक्षित नहीं कर पाना अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की लापरवाही का परिचायक है। लोगों ने शासन-प्रशासन से खंडहर में तब्दील हो चुकी फिराक के पुश्तैनी मकान के जीर्णोद्धार के साथ ही पर्यटन स्थल बनवाने की मांग की है।
विज्ञापन

7 of 8
फिराक गोरखपुरी की प्रतिमा। - फोटो : अमर उजाला।
देश प्रेम की भावना में छोड़ दिया था डिप्टी कलेक्टर का पद
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने के बाद फिराक साहब ने प्रशासनिक सेवा में भी अपने हुनर का परचम लहराया था। वर्ष 1918 में उन्हें डिप्टी कलेक्टर के पद पर तैनाती मिली, लेकिन देश में धधक रही आजादी के आंदोलन की ज्वाला ने उनकी क्रांतिकारी तबियत को सरकारी नौकरी में रमने ही नहीं दिया। नवंबर 1920 में उन्होंने डिप्टी कलेक्टर के पद से इस्तीफा देकर पूरी शिद्दत के साथ आजादी के जंग में कूद पड़े। उस दौरान उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के दायित्यों का निर्वहन करते हुए अंग्रेजी हुकूमत में जेल की सजा भी काटी थी।

... और जब बेचनी पड़ जाती पुश्तैनी कोठी
1918 में पिता के आकस्मिक निधन के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी फिराक के कंधे पर आ गई। कर्ज को अदा करने व बहन की शादी के सिलसिले में उन्हें अपनी कोठी तक बेचनी पड़ जाती है, लेकिन इसी समय एक महत्वपूर्ण घटना घटी। बीए करने के बाद डिप्टी कलेक्टर के पद पर उनका चयन हो गया, लेकिन वह नौकरी उन्हें रास नहीं आई।
विज्ञापन

8 of 8
फिराक गोरखपुरी के नाम पर बना पुस्कालय। - फोटो : अमर उजाला।
अब तक नहीं बना फिराक कम्युनिटी सेंटर
फिराक साहब सेवा संस्थान बनवारपार के अध्यक्ष डॉ. छोटेलाल यादव ने बताया कि 18 अक्तूबर 2012 को शासन से फिराक कम्युनिटी सेंटर बनवाने की मांग की थी। इस मांग को ध्यान में रखते हुए शासन ने लोक निर्माण विभाग को कम्यूनिटी सेंटर के निर्माण कराने का आदेश दिया था। इस आदेश के क्रम में विभाग ने बनवारपार का सर्वे किया और आर्ट गैलरी, मंच, एक बड़ा हाल, गेस्ट रूम, पुस्तकालय, वाचनालय व शौचालय आदि के निर्माण के लिए 61 लाख रुपये का प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा, लेकिन आज तक वह प्रस्ताव की फाइल कहीं धूल फांक रही है। इतना ही नहीं पर्यटन विभाग ने भी फिराक साहब के पैतृक आवास को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए सर्वे किया था और जल्द कार्य पूरा करने का आश्वासन दिया, लेकिन सरकार की उपेक्षित रवैया के कारण यह योजना भी ठंडे बस्ते में चली गई।

ग्रामीणों के सहयोग से संचालित होता है पुस्तकालय
फिराक साहब सेवा संस्थान बनवारपार में ग्रामीणों के सहयोग से पुस्तकालय संचालित होता है। संस्थान के अध्यक्ष डॉ. छोटेलाल बताते हैं कि फिराक साहब से जुड़ी स्मृतियों को सहेजने व संरक्षित करने के लिए शासन से मांग की गई थी, लेकिन जब शासन ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई तो ग्रामीणों के सहयोग से फिराक साहब के नाम पर एक पुस्तकालय बनवाया गया। इसे भी विकसित करने के लिए शासन से गुहार लगाई गई, लेकिन इस बात को भी अनसुना कर दिया गया। बेहद कम पुस्तकों के माध्यम से फिराक साहब की कालजयी रचनाओं को सहेजने का कार्य किया जा रहा है।

 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें