महाराज
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
करसनदास का समाज और परिवार में खूब विरोध हुआ। लेकिन, वे रास्ट गोफ्तार में योगदान देते रहे। जल्द ही उन्हें यह अहसास हुआ कि इतना करना पर्याप्त नहीं है। वर्ष 1855 में उन्होंने आपनी पत्रिका, सत्यप्रकाश शुरू की। इसमें उन्होंने पुरानी परंपराओं और सामाजिक समस्याओं पर खुलकर लिखा। खुद एक वैष्णव, करसनदास ने वैष्णव पुजारियों के 'कुकर्मों' पर लिखना शुरू किया, जिसमें महिला भक्तों का शोषण भी शामिल था। 1858 में जब दयाल मोतीराम द्वारा शुरू किए गए एक मामले में बंबई उच्च न्यायालय ने वैष्णव पुजारी जीवनलालजी महाराज को गवाह के रूप में बुलाया, तो उन्होंने उपस्थित होने से इनकार कर दिया। इसके अलावा उन्होंने वैष्णव पुजारियों को अदालत में पेश होने से हमेशा के लिए छूट देने के लिए लंदन से एक आदेश मांगा। उन्होंने वैष्णव अनुयायियों को तीन शर्तों पर सहमत होने के लिए मजबूर किया, शर्तें थीं- 1. कोई भी वैष्णव महाराज के खिलाफ नहीं लिख सकता था, 2. कोई भी वैष्णव उन्हें अदालत में नहीं ले जा सकता था और तीसरी अगर कोई उन पर मुकदमा करता है, तो अनुयायी मामले का खर्च वहन करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि महाराज को अदालत में पेश न होना पड़े। करसनदास ने 'सत्यप्रकाश' में कई लेख लिखकर इस जबरदस्ती के समझौते की खूब आलोचना की और इसे गुलामी का समझौता करार दिया।