फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Tandav Review: अली अब्बास जफर के ‘तांडव’ की अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है

विज्ञापन
1 of 9
Tandav Review - फोटो : अमर उजाला
कलाकार: डिंपल कपाड़िया, मोहम्मद जीशान अयूब, कृतिका कामरा, सुनील ग्रोवर, सारा जेन डायस, कुमद मिश्रा और सैफ अली खान।
लेखक: गौरव सोलंकी
सृजनकर्ता और निर्देशक: अली अब्बास जफर
रेटिंग: ***1/2
राजनीतिक षडयंत्रों की कहानियां रोचक होती हैं। जानी पहचानी सी लगती है। सुनी सुनाई सी भी लगती हैं। निर्माणाधीन सेंट्रल विस्टा के ठीक बगल वाली इमारत में बीते हफ्ते ही देश के शीर्षतम अधिकारियों में से एक से इन पर चर्चा हो रही थी। और, संक्रांति हो गई। वेब सीरीज ‘तांडव’ मनोरंजन की संक्रांति है। इसमें कुछ भी इस पार और उस पार नहीं है। न सब कुछ काला। न सब कुछ सफेद। फैज़ की वो नज़्म याद है, ‘सुब्ह ए आज़ादी’।  उसका मतला है, ‘ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर, वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं’! दूर से सारे ढोल सुहाने हैं। एक शेर दिनेश ठाकुर का वो भी याद आता है कि, ‘हर हंसी मंज़र से यारों फासले कायम रखो, चांद जो धरती पे उतरा, देख के डर जाओगे..!’
विज्ञापन

2 of 9
Tandav Review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तो प्रथम प्रथमा से जिसे अंग्रेज़ी में कहते हैं ‘फर्स्ट थिंग फर्स्ट’। सैफ अली खान को 12 फ्लॉप फिल्में देने के बाद जो कैवल्य प्राप्त हुआ कि उन्हें ‘तानाजी’ में विलेन का रोल कर लेना चाहिए, वह उनके अभिनय जीवन का सबसे सही फैसला है। समर प्रताप के चेहरे पर काइयांपन, धूर्तता और फरेब का जो अक्स उनके इस किरदार के करते उभरता है, दूसरा अभिनेता शायद कोई कर न पाता। वह सीरीज के विलेन हैं। इससे ज्यादा भेद सीरीज के खोलकर मैं इसे देखने का आपका आनंद कम नहीं करना चाहता क्योंकि ये सीरीज सिर्फ सैफ अली खान की नहीं है। इसके हर एपीसोड में दिखती है हिंदी सिनेमा के हाशिये पर पड़े रहे तमाम ऐसे कलाकारों की उम्दा अदाकारी कि दिल से वाह निकल ही जाती है।
विज्ञापन

3 of 9
Tandav Review - फोटो : अमर उजाला मुंबई
वेब सीरीज ‘तांडव’ की कहानी संक्षेप में कहें तो आधुनिक दुर्योधन की है जो कलयुग में उससे भी दो कदम आगे निकल जाता है। सत्ता के सर्वोच्च आसन का मोह सबसे पाप कराता है। इस कहानी में कोई पुण्यात्मा है तो वह अब तक के हिसाब से है शिवा, उसी का ‘तांडव’ सीरीज के दूसरे भाग में देखने का इंतजार रहेगा। पहला सीजन हालांकि दिल्ली से बाहर नहीं निकलता लेकिन इसमें दिल्ली की सत्ता के लिए जरूरी हिंदी पट्टी के प्रदेशों का प्रताप पूरा है। किसान आंदोलन है। जेएनयू जैसी वीएनयू है। टीआरपी बाज चैनलों के मालिक हैं। एम्स जैसा एक अस्पताल है। और, ये देखके आपकी आंखें फैल सकती हैं कि राजनीति में क्या क्या नहीं हो सकता। यहां न कोई सच के साथ है न झूठ के, सब राजनीति के साथ है। जो सच के साथ है उसे कोई दल अपने साथ रखना नहीं चाहता।

4 of 9
Tandav Review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सीरीज की शुरुआत के साथ ही दो चीजें अपना असर छोड़ना शुरू करती हैं। एक डिंपल कपाड़िया, दूसरा इसका बैकग्राउंड म्यूजिक। ए आर रहमान, महबूब और कार्तिक का रचा फिल्म ‘युवा’ का गाना ‘धक्का लगा बुक्का’ भी आग चलकर बजता है और सही जगहों पर बजता ही रहता है। ओटीटी ने एक काम तो किया है कि जिन कलाकारों को वाकई अभिनय आता है उनके लिए पूरा मैदान खुला छोड़ दिया है। डिंपल के साथ सीरीज में गौहर खान, कृतिका कामरा, सारा जेन डायस, नेहा हिंजे, अमायरा दस्तूर, संध्या मृदुल, सुखमनी सडाना, शोनाली नागरानी हैं।
विज्ञापन

5 of 9
Tandav Review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
राजनीति में महिलाओं से कैसे खेल होते हैं, और किस तरह के खेलों में वह अपनी महात्वकांक्षाओं या कमजोरियों के चलते शामिल होती हैं, इस पर ‘तांडव’ ने बहुत बारीकी से एक समानांतर कथा को विस्तार दिया है। राजनीति की रेखाएं कभी बिस्तर पर, कभी लाइब्रेरी में तो कभी न्यूज चैनलों में अपने अपने हिसाब से बनाती बिगाड़ती इन महिलाओं में डिंपल का अभिनय इनाम के काबिल है और उनके बाद नंबर दो पर हैं कृतिका कामरा। दूसरे सीजन में कृतिका की कमी खलेगी। पहले सीजन की आभा का वह दीप्तिमान वलय हैं।
विज्ञापन

6 of 9
Tandav Review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अब आते हैं, वेब सीरीज ‘तांडव’ के असली तांडव पर। पिता के अवैध संबंधों से 30 साल से उकताया बेटा अपनी पार्टी के तीसरी बार सत्तासीन होने से ठीक पहले अपने भीतर के दानव से हार जाता है। सैफ अली खान आखिरकार उसी रास्ते पर पूरी रफ्तार से चल निकले हैं, जिस रास्ते पर उनके दौर के सितारे संजय दत्त, सुनील शेट्टी, जैकी श्रॉफ वगैरह पहले ही अपनी जगह तलाश चुके हैं। हिंदी सिनेमा में हीरो बहुत हैं। दमदार विलेन ज्यादा हैं नहीं। सैफ इस ज़ोन में अधिक सेफ भी हैं। बस, उनको अपने हिंदी उच्चारण के लिए साथ में एक ट्यूटर ज़रूर रख लेना चाहिए। चाणक्य को चणक्या और कैकेई का काइकाई बोलना उन पर फबता नहीं है। पटौदी के नवाब हैं वो। और, फिर आने वाले दिनों में उन्हें रावण भी बनना है। वह तो संस्कृत का प्रकांड पंडित था।
विज्ञापन

7 of 9
Tandav Review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सीरीज में मामला दमदार सहायक अभिनेताओं का है। गौरव सोलंकी ने अस्पताल के चपरासी तक के किरदार को अच्छे से गढ़ा है और मुकेश भट्ट के लिए भी खासतौर से सीन लिखा है। सुनील ग्रोवर हर तीसरे चौथे सीन में हैं और उनकी एक्टिंग का एक सेट पैटर्न है इस किरदार के लिए। मेहनत उन्होंने इस किरदार में की भी बहुत है। पर वह परदे पर दिखती है। किरदारों के गठन और हर कलाकार को कम से कम दो तीन सीन में अपने अभिनय क्षमता का विस्तार दिखाने का पूरा मौका निर्देशक अली अब्बास जफर ने भी दिया। सहायक कलाकारों की भूमिकाओं का विस्तार देखना हो तो छठे एपीसोड में परेश पाहूजा और राजीव गुप्ता के सीन देखने चाहिए। नोटबंदी पर प्रहार करता एक संवाद है यहां राजीव का, ‘गांधीजी का कलर कुछ भी हो, गांधीजी तो गांधीजी ही रहेंगे।’ ऐसे तमाम संवाद मैंने सीरीज देखते समय नोट किए, लेकिन सबको लिखना यहां संभव नहीं है। ऐसा ही सोशल मीडिया की शोहरत पर कटाक्ष करता एक संवाद काफी ज़ोरदार है।

8 of 9
Tandav Review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पहले एपीसोड में तिग्मांशु धूलिया और कुमुद मिश्रा के मेकअप की खराबी को छोड़ दें तो बाकी सीरीज में इसकी तकनीकी टीम ने ठीक काम किया है। दिल्ली को सियासी साजिशों का शहर दिखाने का ऐसा काम दूसरी किसी सीरीज या फिल्म में कम ही हुआ है। मनमोहन देसाई की फिल्म ‘कुली’ के संवाद का प्रयोग करने से गौरव सोलंकी बच सकते तो उनकी मौलिकता और गाढ़ी होती। उनकी कहानी थोड़ी असली और थोड़ी नकली है यहां। दलित नेता के साथ हाईकमान का बंद कमरे में बर्ताव और इसी दलित नेता का अगड़ी जाति की एक प्रोफेसर का अपने पति से तलाक कराने के बाद खुद के तलाक से मुकर जाने का किस्सा रोचक है। सीरीज की कहानी आगे पीछे होते हुए बढ़ती है। ‘टाइगर जिंदा है’, ‘सुल्तान’ और ‘भारत’ जैसी 300 करोड़ी फिल्में बनाने वाले अली अब्बास जफर का यशराज फिल्म्स के बाहर ये पहला लिटमस टेस्ट था और वह इसमें सम्मान सहित उत्तीर्ण होने में सफल भी रहे।
विज्ञापन

9 of 9
Tandav Review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, आखिर में बात सीरीज के असली हीरो की। ये हीरो इन मेकिंग है मोहम्मद जीशान अयूब। गौरव सोलंकी को अपनी पिछली फिल्म से जो शिकायत रही, वैसी ही शिकायत जीशान ने भी की थी। लेकिन. यहां दोनों को खुला आसमान मिला है। जीशान ने इस किरदार में जान भी डाली है। वह एक बेबस छात्र नेता नहीं है। बेवकूफ भी नहीं। उसे एक मिनट में सियासत समझ आती है। और, यह एक मिनट ही शिवा के ‘तांडव’ के अगले सीजन की असली कहानी होगी। इंतजार रहेगा।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें