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Sandeep Aur Pinky Faraar Review: तब सुशांत, अब अर्जुन का करियर संकट में, दिबाकर ने दिया एक और ‘धोखा’

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संदीप और पिंकी फरार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
Movie Review: संदीप और पिंकी फरार
कलाकार: अर्जुन कपूर, परिणीति चोपड़ा, नीना गुप्ता, रघुबीर यादव और जयदीप अहलावत आदि।
लेखक: दिबाकर बनर्जी और वरुण ग्रोवर
निर्माता, निर्देशक: दिबाकर बनर्जी
रेटिंग: *



छह साल हो गए यशराज फिल्म्स की दिबाकर बनर्जी निर्देशित फिल्म ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ को बॉक्स ऑफिस पर फुस्स हुए। इस फिल्म के फ्लॉप होने के जो रिपेल इफेक्ट्स हुए, उन्होंने इसके हीरो सुशांत सिंह राजपूत को यशराज फिल्म्स से नाता तोड़ने पर मजबूर किया। यशराज फिल्म्स की ‘पानी’ बंद हो गई। क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की बायोपिक लागत के हिसाब से मुनाफा वसूल करने में विफल रही। ‘राब्ता’ का सबको पता ही है। उसके बाद ‘छिछोरे’ तक आते आते सुशांत के भीतर की ‘ड्राइव’ ऐसी शांत हुई कि वह खुद ही शांत हो गए। तब से दिबाकर अब लौटे हैं एक और औसत से कमतर फिल्म ‘संदीप और पिंकी फरार’ लेकर। फिल्म का सबसे क्रिएटिव हाईलाइट यही है कि फिल्म में हीरो का नाम पिंकी है और हीरोइन का संदीप। ‘खोसला का घोसला’ बनाने वाले निर्देशक का ये नया भ्रमजाल है।
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संदीप और पिंकी फरार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
निर्देशक दिबाकर बनर्जी जैसा मौका हिंदी सिनेमा में उनके समकालीन सितारों में बिरले निर्देशकों को ही मिला है। यशराज फिल्म्स जैसे बैनर ने उनकी प्रतिभा पर भरोसा किया लेकिन वह खुद पर भरोसा बरकरार नहीं रख पाए। ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ से ठीक पहले ‘शंघाई’ में उनके लिए खतरे की घंटी बजी थी। लेकिन तब वह ‘ओए लकी लकी ओए’ और ‘लव सेक्स और धोखा’ के हैंगओवर में थे। 11 साल बाद ‘लव सेक्स और धोखा’ की सीक्वेल भी शुक्रवार को घोषित हुई है, लेकिन इससे कुछ होने वाला नहीं। अगर उनको ‘संदीप और पिंकी फरार’ बनाकर अपने फैंस का दिल और नहीं तोड़ना है तो फिर उनको चार छह महीने बैठकर अपनी सारी फिल्में फिर से दो दो चार चार बार जरूर देखनी चाहिए।
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संदीप और पिंकी फरार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘संदीप और पिंकी फरार’ हिंदी सिनेमा के निर्देशकों की उस सोच की फिल्म है जिसमें कोई निर्देशक एकाएक खुद को एक अलग तरह का फिल्मकार मानने लगता है। उसे लगता है कि उनसे इतना वर्ल्ड सिनेमा देख लिया है कि वह गलत हो ही नहीं सकता। लेकिन, ‘संदीप और पिंकी फरार’ के दर्शक गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ, मुरादाबाद, पटना, पुणे और जयपुर के दर्शक हैं। न्यूजर्सी के नहीं। ये उतावले दर्शक हैं। इन्हें हरियाणवी पुलिस अफसर ‘पाताललोक’ जैसा चाहिए। पिंकी जैसा नकली नहीं। संदीप वालिया उर्फ सैंडी में बैंकर फिर भी दिबाकर ने ठीक ठाक छाप लिया है। लेकिन, फिल्म की कहानी और इसका निर्देशन इसकी सबसे कमजोर कड़ियां हैं।

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संदीप और पिंकी फरार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दिबाकर का सिनेमा प्याज की तरह खुलता है। परत दर परत। ये उनकी खूबी भी है और यही उनकी कमजोरी भी। वह अपनी अलग दुनिया रचने की कोशिश करते हैं। इस दुनिया की गति सामान्य नहीं है। इंटरवल से पहले ये तेज रफ्तार भागती है और इंटरवल के बाद इसके नमक का आयोडीन उड़ जाता है। जेम्स बॉन्ड की फिल्मों की तरह ‘संदीप और पिंकी फरार’ पहले ही सीन से दर्शकों को अलग दुनिया में ले जाने की कामयाब कोशिश तो करती है लेकिन, खुलकर समझ नहीं आता कि आखिर सैंडी का पीछा इतने खतरनाक तरीके से क्यों हो रहा? कहानी कब्ज सी अटकी रहती है। और, इतना प्रेशर बनाने के बाद मामला बाहर आता भी है तो दर्शकों को कोई सुख नहीं दे पाता। दिबाकर की फिल्मों में इंडिया और भारत का संघर्ष शुरू से रहा है। ये अंतर्धारा उन्होंने यहां भी भुनाने की कोशिश की लेकिन फिर फेल रहे।
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संदीप और पिंकी फरार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कलाकारों में दर्शक उन चेहरों को पहचानने की कोशिश में आखिर तक लगा रहता है जिन्होंने लीड कलाकारों से बेहतर काम किया है। नीना गुप्ता और रघुबीर यादव वेब सीरीज ‘पंचायत’ के बाद फिर कमाल लगे हैं। हालांकि, फिल्म ये उस वेब सीरीज से काफी पहले की शूट हो चुकी दिखती है। सुरुचि औलख, देव चौहान, राहुल कुमार का काम असर छोड़ता है। लेकिन, यही बात अर्जुन कपूर और जयदीप अहलावत के लिए नहीं कही जा सकती है। दोनों से इस फिल्म में बहुत उम्मीदें थीं। जयदीप अहलावत ने अपने प्रशंसकों को सबसे ज्यादा निराश किया। अर्जुन कपूर का अभिनय शुरू से आखिरी तक नकली लगता है। परिणीति चोपड़ा ने फिल्म में खुद को बेहतर अभिनेत्री साबित करने के लिए पूरा जोर लगाया है। लेकिन, ऐसा करते समय सहज रहना ही एक अभिनेत्री की असली जीत होती है। वह धीरे धीरे परिपक्व तो हो रही हैं, लेकिन समय उनके हाथ से फिसलता जा रहा है।
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संदीप और पिंकी फरार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तकनीकी तौर पर फिल्म में सिनेमैटोग्राफी छोड़ कुछ प्रभावित नहीं करता। अनिल मेहता का कैमरा कमाल है, लेकिन इसके अलावा म्यूजिक से लेकर एडीटिंग और बैकग्राउंड म्यूजिक से लेकर कलर करेक्शन तक सब थोपा हुआ सा है। फिल्म ‘संदीप और पिंकी फरार’ की रिलीज से निर्देशक दिबाकर बनर्जी के जीवन वृत्त का एक चक्र पूरा हो गया है। अब उन्हें निर्माता बनने का लालच छोड़ सिर्फ उसी काम पर फोकस करना चाहिए, जिसके वह मास्टर हैं। निर्देशक वह कमाल के हैं, बस कहानियां उन्हें अब सतर्क होकर चुननी चाहिए। ‘लव सेक्स और धोखा’ जैसी फिल्मों से भी वह बहुत आगे निकल आए हैं, करियर बचाने के लिए इसी विचार की तरफ वह फिर भागेंगे तो अपने लिए ही मुश्किल तलाशेंगे।
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