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बाइस्कोप: गोल्डन जुबली की यात्रा पर निकले देव आनंद, वैंकूवर में किया इस लड़की को हीरोइन बनाने का एलान

Sat, 08 Aug 2020 02:55 AM IST
Mishra Mishra पंकज शुक्ल
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मैं सोलह बरस की - फोटो : सोशल मीडिया
किस्सा थोड़ा पुराना है लेकिन यहां बताना जरूरी है। मध्यप्रदेश के जबलपुर में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान एकाएक किसी ऐसे बंदे की जरूरत आन पड़ी जिसे हिंदी आती हो। पता चला पी एल श्रीवास्तव नाम का लड़का है जो लिखने पढ़ने में तेज है। उसे बुलाया गया। लोगों को उसका काम पसंद आया और वह फिल्म यूनिट के साथ बंबई चला आया है। ये बात है सन 1930 के आसपास की। बाद में इस लड़के ने अपने सरनेम से श्रीवास्तव उड़ाया है और बन गया पी एल संतोषी। वही पी एल संतोषी जिन्होंने हिंदी सिनेमा को दिया 1946 में फिल्म ‘हम एक हैं’ में दिया एक नया सितारा, देव आनंद। देव आनंद की ही बनाई फिल्म ‘मैं सोलह बरस की’ हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है, लेकिन इस फिल्म से डेब्यू करने वाले सितारों और इस फिल्म को बनाने की वजह पर बात करने से पहले थोड़ी सी बात पी एल संतोषी की और कर लेते हैं।

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मैं सोलह बरस की - फोटो : सोशल मीडिया
पी एस संतोषी का बंबई में कामकाज सेट हो गया तो वह दक्षिण भारत भी सिनेमा के ही काम से जाने लगे । वहां चेन्नई में उनका एक खूबसूरत महिला से इश्क हुआ। पहले से शादीशुदा संतोषी ने एक और शादी कर ली। इस शादी से जो बेटा हुआ उसका नाम है, राजकुमार संतोषी। राजकुमार संतोषी ने अपने पिता से बहुत कुछ सीखा लेकिन उनको अब भी ये दर्द सालता है कि अपने पिता के आखिरी दिनों में वह उनकी कोई सेवा नहीं कर पाए। मजबूरी में ठाणे रहने चले गए पी एल संतोषी का निधन बहुत ही कष्टदायक स्थिति में के ई एस अस्पताल में हुआ। लेकिन, उनके बनाए हीरो देव आनंद ने एक सबक अपने पहले डायरेक्टर से ये सीखा कि जब जीवन का बसंत हो तो बरसात के दिनों के लिए भरपूर अनाज बचाकर जरूर रख लेना चाहिए। देव आनंद ने यही सिनेमा में भी किया, उन्होंने अपने कामयाबी के दिनों में अभिनय और निर्देशन से इतना पैसा कमाया कि आखिर में फिर वह फिल्में सिर्फ अपना शौक पूरा करने के लिए बनाते रहे। फिल्म चले ना चले, इसकी फिक्र उन्होंने की ही नहीं।

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मैं सोलह बरस की - फोटो : सोशल मीडिया
आज के बाइस्कोप की फिल्म ‘मैं सोलह बरस की’ कहानी भी ऐसी ही है। आपको शायद जानकर यकीन न हो लेकिन देव आनंद ने अपने आखिरी दिनों में अपने हर परिचित को बुला बुलाकर कुछ न कुछ यादगार के तौर पर कुछ न कुछ देना शुरू किया था। वह चाहते थे कि उनके चाहने वाले उनकी कोई न कोई निशानी अपने पास जरूर रखें और आने वाली नस्लों को बताएं कि उन्होंने कितने सदाबहार इंसान के साथ यादें संजोई हैं। जी हां, देव आनंद सदाबहार इंसान पहले थे, नामचीन अभिनेता, निर्माता और निर्देशक उसके बाद में। ना जाने कितने चेहरों को उन्होंने बड़े परदे पर मौका दिया। उनकी नजर पारखी लंबे समय तक रही। वह भीड़ में भी हीरा पहचान लेते थे।

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मैं सोलह बरस की - फोटो : सोशल मीडिया
ये बात 1995 की है। देव आनंद ने सिनेमा में अपने पचास साल पूरे होने का जश्न पूरी दुनिया घूम कर मनाने का फैसला किया। वो मुंबई से निकले तो फिर हर उस जगह गए जहां उनके दीवाने रहते थे। कुछ लोगों से उन्होंने फोन पर पहले से ही बात भी कर रख थी तो जहां भी वह जाते वहां तुरत फुरत एक छोटा मोटा कार्यक्रम तैयार हो जाता। कोई उनके बोले गए संवाद सुनाता तो कोई उनकी नकल उतारता। 1923 में पैदा हुए देव आनंद 1995 में 72 साल के होने के बावजूद पूरी तरह सक्रिय थे और बिना किसी के सहारे के चलते फिरते थे और अकेले ही सैर पर भी निकल जाते थे। तो इस स्वर्ण जयंती यात्रा के दौरान वह कनाडा, अमेरिका और भी तमाम देशों में घूमे और इसी दौरान वैंकूवर के फ्रेजरव्यू बैंक्वेट ह़ॉल में एक कमाल हो गया।

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मैं सोलह बरस की - फोटो : सोशल मीडिया
हुआ यूं कि देव आनंद के तमाम चाहने वालों ने उनके खैरमकदम के लिए वहां एक पार्टी रखी थी और एक लड़की ने वहां देव आनंद की फिल्मों के हिट गानों पर ऐसा डांस किया कि लोग हैरान रह गए। उसका नाचना बंद हुआ तो लोग देर तक खड़े होकर तालियां बजाते रहे और लोगो को देख देव आनंद से भी रहा नहीं गया। वह खड़े हुए, इशारे से बच्ची को अपने पास बुलाया और वहीं सबके सामने एलान कर दिया कि वह उसे अपनी अगली फिल्म की हीरोइन बना रहे हैं।

‘मैं सोलह बरस की’ तब तक न कहानी तय थी, न बाकी कोई स्टार कास्ट। देव आनंद ने इससे पहले एक बहुत ही खूब खराबे वाली फिल्म ‘गैंगस्टर’ बनाई थी और एक फिल्म ‘रिटर्न ऑफ ज्वैल थीफ’ वह बना रहे थे। तो उन्होंने तय किया कि इसके बाद जो फिल्म इस नई लड़की के साथ वह बनाएंगे, उसमें नफरत, अदावत और बगावत की कोई जगह न होगी, वह फिल्म बस प्यार मोहब्बत की बातें करेगी। सुरीले तराने सुनाएगी और लोगों को एक बदलती रंगत का एहसास कराएगी। देव आनंद ने अभिनेत्री तनूजा से बात की। नवकेतन में उनकी ये तीन दशक बाद की वापसी की फिल्म बनी। तमाम सीनियर सितारे भी वह इस फिल्म में ले आए, मसलन ए के हंगल, सत्येन कप्पू, शशिकला, उर्मिला भट्ट आदि। लेकिन, हीरो? फिल्म की जो हीरोइन देव आनंद ने वैंकूवर में तलाशी उसका नाम था, नीरू बाजवा और हीरो का मौका इस फिल्म में मिला जस अरोरा को।

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मैं सोलह बरस की - फोटो : सोशल मीडिया
कोरोना संक्रमण के दौरान जब महाभारत और रामायण की दूरदर्शन पर वापसी हुई तो एक शूटिंग शर्टिंग का विज्ञापन भी इसके साथ खूब चला, इसमें जो लड़का दिखा वही जस अरोरा है। लोग उन्हें ‘मैं सोलह बरस की’ के हीरो के तौर पर भले याद न कर पाते हों लेकिन अगर आप उन्हें उस वक्त के दो तीन म्यूजिक वीडियो मसलन ‘गुड़ नाल इश्क मीठा’, ‘मेरा लौंग गवाचा’ और ‘यारों सब दुआ करो’ याद दिला दें, तो लोगों का उनका चेहरा तुरंत याद आ जाता है। ‘मैं सोलह बरस की’ से जस अरोरा का हिंदी सिनेमा में डेब्यू हुआ। बाद में उन्होंने ‘दुश्मन’, ‘मॉनसून वेडिंग’, ‘चलते चलते’, ‘प्यार के साइड इफेक्ट्स’, ‘एक पहेली लीला’ और ‘फ्रीकी अली’ जैसी फिल्मों में भी काम किया है।

देव आनंद ने जस अरोरा और नीरू बाजवा को लेकर अमेरिका जाने की तैयारी कर ली थी। वह वहां ये फिल्म ओलंपिक खेलों के दौरान शूट करना चाहते थे लेकिन फिल्म की शूटिंग में इतने झमेले होते हैं कि कभी न कभी, कहीं न कहीं, कोई न कोई गड़बड़ हो ही जाती है। प्रोडक्शन की टीम से ये दिक्कतें संभल नहीं पाईं तो देव आनंद ने अपना इरादा ही बदल दिया। देव आनंद को जो लोग करीब से जानते थे, वे ये भी जानते हैं कि देव आनंद को खुश रहने की आदत थी। वह चिंतामुक्त जीवन जीने में यकीन रखते थे।

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देव आनंद के जीवन का एक ही फलसफा था कि जो चीज ज्यादा परेशान कर रही हो, उससे दूर हो जाओ। फिर चाहे वह इंसान हो, वस्तु हो या स्थान हो। उन्होने अमेरिका में शूटिंग करने का इरादा त्याग दिया और पूरी फिल्म स्कॉटलैंड में जाकर शूट कर ली। फिल्म में हर लोकेशन बहुत खूबसूरत बन पड़ी है। पाटनी ब्रदर्स ने देव आनंद की फिल्मों प्यार का तराना और गैंगस्टर की तरह इस फिल्म में बहुत मन लगाकर काम किया और उनके काम की वाहवाही भी खूब हुई।

फिल्म ‘मैं सोलह बरस की’ को तब भी ज्यादातर लोग समय से पहले की फिल्म मानते थे। फिल्म का पूरा ट्रीटमेंट और इसका कलेवर ऐसा था कि ये फिल्म उस समय के परिवेश की लगती ही नहीं थी। ‘रहना है तेरे दिल में’ श्रेणी की ये फिल्म इसकी रिलीज से भी तीन साल पहले की है। फिल्म को अब देखो तो लगता है कि देव आनंद ने ये फिल्म किस पीढ़ी को सोचकर बनाई होगी। वह नीरू बाजवा की आयु वर्ग के लोगों की फिल्म बनाना चाहते थे और अमेरिका, कनाडा या ब्रिटेन का जैसा युवा तब था, वैसा देश का युवा अब जाकर हो पाया है। समय से पहले की इस फिल्म का इसीलिए देव आनंद ने भारत में ज्यादा प्रचार भी नहीं किया। और, नीरू बाजवा को भी आखिर तक यही लगता रहा कि अगर भारत में इस फिल्म के बारे में देव आनंद बात करते तो यहां फिल्म जरूर हिट होती। लेकिन देव आनंद तो तब तक हिट और फ्लॉप से कहीं ऊपर उठ चुके थे।

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मैं सोलह बरस की - फोटो : सोशल मीडिया
देव आनंद ने फिल्म ‘मैं सोलह बरस की’ का प्रीमियर लंदन में किया। और, शायद ही आपको पता है कि फिल्म का नाम ‘मैं सोलह बरस की’ ठीक फिल्म की रिलीज से कुछ ही दिन पहले रखा गया नहीं तो ये फिल्म बनना तो ‘सोलह साल को सलाम’ से शुरू हुई थी। फिल्म के लंदन प्रीमियर पर खुद प्रिंस चार्ल्स मुख्य अतिथि के तौर पर आए। देव आनंद ने ये फिल्म सिर्फ और सिर्फ विदेशी दर्शकों को ध्यान में रखते हुए बनाई थी और वहां इस फिल्म को पसंद भी काफी लोगों ने किया। फिल्म का संगीत इसकी एक और हाईलाइट था। देव आनंद की फिल्मों का संगीत हमेशा से उसकी हाईलाइट रहा है। ऐसे मौके भी हुए हैं जब  ‘प्रेम पुजारी’ जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर भले अच्छी कमाई न की हो, लेकिन इनके गानों ने पूरी दुनिया पर राज किया।

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‘मैं सोलह बरस की’ को नवकेतन फिल्म्स की आखिरी फिल्म माना जाता है जिसमें देव आनंद ने गीत संगीत पर पूरा ध्यान दिया। ‘देस परदेस’, ‘मनपसंद’ और ‘लूटमार’ के बाद एक बार फिर देव आनंद इस फिल्म में गीतकार अमित खन्ना और संगीतकार राजेश रोशन को साथ लाए और दोनों ने मिलकर क्या खूब संगीत तैयार किया। फिल्म ‘मैं सोलह बरस की’ की कहानी वही है जो मैंने शुरू में सुनाई थी कि देव आनंद सिनेमा में अपनी गोल्डन जुबली मनाने निकले और एक नई हीरोइन तलाश लाए।

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फिल्म की कहानी ये है कि एक निर्देशक विदेश में अपनी फिल्म की हीरोइन तलाशने निकलता है। फिल्म मे जो हीरोइन तलाशी जाती है उसका किरदार शाइस्ता उस्ता नाम की लड़की ने किया जिसका नाम बदलकर देव आनंद ने सबरीना कर दिया था। जब ये फिल्म रिलीज हुई तो देव आनंद के बड़े भाई चेतन आनंद जानबूझकर फिल्म देखने गए, ये जताने के लिए कि देव आनंद को अब रिटायर हो जाना चाहिए और फिल्में बनाना बंद कर चैन से रहना चाहिए। लेकिन, जो रुक जाए, उसका नाम भला देव आनंद कहां..! आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।

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(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)
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