हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित प्रोडक्शन हाउस यशराज फिल्म्स के 50 साल पूरे होने के जश्न का मुंबई को अब भी इंतजार है। 1973 में रिलीज हुई पहली फिल्म ‘दाग’ से लेकर दिसबंर 2019 में रिलीज हुई फिल्म ‘मर्दानी 2’ तक यशराज फिल्म्स कुल 76 फिल्में बना चुकी है और इसकी आठ नई फिल्में निर्माणाधीन हैं। इन 81 फिल्मों में अगर किसी महिला किरदार के नाम पर बनी फिल्मों की बात करें तो ऐसी फिल्में सिर्फ दो हैं, ‘नूरी’ और ‘चांदनी’। महिला विषयक दो और फिल्में ‘मर्दानी’ और ‘मर्दानी 2’ भी यशराज फिल्म्स के बैनर तले बन चुकी हैं। लेकिन, जिस फिल्म की बात मैं आज के बाइस्कोप में करने वाला हूं ये वो फिल्म है जिसने यशराज फिल्म्स को डूबने से बचाया। उधार के पैसे लेकर बनी यशराज फिल्म्स की शायद ये इकलौती फिल्म है। फिल्म में निर्माता के तौर पर यश चोपड़ा और सहायक निर्माता के तौर पर टी सुब्बीरामी रेड्डी का नाम है। अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, शशि कपूर, राखी, परवीन बाबी, नीतू सिंह और संजीव कुमार स्टारर फिल्म ‘काला पत्थर’ के बाद यशराज फिल्म्स की छह बैक टू बैक फिल्में ‘नाखुदा (1981)’, ‘सिलसिला (1981)’, ‘सवाल (1982)’, ‘मशाल (1984)’, ‘फासले (1985)’ और ‘विजय (1988)’ वैसा करिश्मा करने से चूक गई जैसी कि इनसे उम्मीद की गई थी। इनमें से ‘सिलसिला’, ‘फासले’ और ‘विजय’ ने बतौर फिल्म निर्देशक यश चोपड़ा की तिजोरी और साख दोनों को काफी चोट पहुंचाई। लेकिन, साल 1989 के सितंबर महीने में जब ‘चांदनी’ रिलीज हुई तो इसने आगे पीछे के सारे हिसाब बराबर कर दिए।