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Army Of The Dead Review: स्नाइडर ने दिखाया वीभत्सता का चरम, सिर्फ फैंस के लिए है ‘आर्मी ऑफ द डेड’

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Army of the Dead Review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

Movie Review : आर्मी ऑफ द डेड
लेखक, निर्देशक: जैक स्नाइडर
कलाकार: डेव बाउटटिस्टा, एला परलने, एना डिला रेगुएरा, ओमारी हार्डविक, मथियास श्वेइगॉफर, हुमा कुरैशी और हिरोयूकी सनाडा
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: **

जैक स्नाइडर हॉलीवुड के सलमान खान है। एक बार कमिटमेंट कर दी तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनते। जैसी फिल्म बनाना चाहते हैं वैसी ही बनाते हैं। और, उनके फैंस भी सलमान के फैंस जैसे ही हैं। बिल्कुल ‘भक्त’ मोड में। कभी और किसी फिल्म के बारे में सुना है कि किसी फिल्म को किसी तकनीशियन के फैंस के दबाव में किसी स्टूडियो ने फिर से रिलीज किया हो और वह भी निर्देशक के संस्करण के नाम से। ‘जस्टिस लीग’ के चार साल बाद ‘जस्टिग लीग स्नाइटर्स कट’ रिलीज हुई और उसके ठीक बाद नेटफ्लिक्स ने रिलीज कर दी ‘आर्मी ऑफ द डेड’। नेटफ्लिक्स को बड़े नाम खूब भाते हैं। और, ये बात अब इन बड़े नाम वाले सितारों को भी समझ आ चुकी है। वे नेटफ्लिक्स के साथ तीन तीन फिल्मों का ठेका लेते हैं। एक फिल्म कोई ढंग की बनाते हैं बाकी दो ऐंवई चिपका देते हैं। यहां ये काम धर्माटिक और रेड चिलीज जैसी कंपनियां कर रही हैं, वहां जैक स्नाइडर इसी मोड में हैं। जिस पृष्ठभूमि में फिल्म ‘आर्मी ऑफ द डेड’ बनी है, उसी पर उनकी एक सीरीज का काम भी शुरू हो चुका है।

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आर्मी ऑफ द डेड - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म ‘आर्मी ऑफ द डेड’ खून-खराबे, शोरगुल और लाशों के ढेर लगने का सिनेमा है। 15 साल पहले दर्शकों ने जैक स्नाइडर की ही फिल्म ‘300’ में पहली बार बड़े परदे पर इतना खून बहते देखा था। फिल्म बनी भी अच्छी थी लेकिन फिर जैक को कहानी से नहीं तकनीक से प्यार हो गया। यहां फिल्म ‘आर्मी ऑफ द डेड’ भी ध्यान से देखेंगे तो आपको हर फ्रेम में फोकस बस एक या दो चेहरों पर ही दिखेगा। जैक ने फिल्म लिखने और निर्देशित करने के अलावा खुद ही शूट भी की है। उन्होंने कुछ ऐसे लेंस पा लिए जिनसे कैमरा फोकस में दिख रही वस्तु, स्थान या व्यक्ति के ठीक पीछे की सारी चीजों को धुंधला (आउट ऑफ फोकस) कर सकता है। निर्देशक किसी फिल्म में कहानी सुनाता है लेकिन तकनीक के मोहपाश में उलझते जा रहे जैक स्नाइडर ने फिल्म ‘आर्मी ऑफ द डेड’ में कहानी की नवीनता पर सबसे कम ध्यान दिया है।

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आर्मी ऑफ द डेड - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

ये कहानी है उस समय की जब जॉम्बियों को खदेड़ कर एक शहर में सीमित कर दिया गया है। शहर के चारों तरफ कंटेनर्स की बाड़ लगा दी गई है। फैसला हुआ कि एक परमाणु बम गिराकर शहर को जॉम्बियों समेत जमींदोज कर दिया जाए। और, इस पृष्ठभूमि में कहानी के हीरो को मिलता है एक काम। हीरो को जॉम्बियों से लड़ने का पुराना अनुभव है। बाकी जिंदगी आराम से गुजारने का मौका उसके सामने है। काम है जॉम्बियों से भरे शहर में जाकर एक कैसीनो के तहखाने में रखी बेशुमार दौलत को बाहर निकालना। हीरो अपनी टीम बनाता है। ‘ओशंन्स एलेवन’ टाइप के हरफनमौलाओं की इस टीम के बनने और बाद में फिल्म ‘आर्मी ऑफ द डेड’ आपको कभी ‘प्लैटेन ऑफ द एप्स’ की याद दिलाएगी तो कभी किसी और फिल्म की। ओरीजनल कुछ है तो बस ये कि जॉम्बी अब जानवर भी होने लगे हैं और जॉम्बी सोचने समझने भी लगे हैं।

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आर्मी ऑफ द डेड - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म ‘आर्मी ऑफ द डेड’ में जैक स्नाइडर ने वीभत्सता की हर सीमा के पार जाने की कोशिश की है। उनके ‘भक्त’ फैंस को ये फिल्म पसंद भी आ सकती है लेकिन अगर इस फिल्म से आपको ढाई घंटे मनोरंजन की उम्मीद है तो आपको निराश होना पड़ सकता है। फिल्म की ओपनिंग दमदार है। विचार भी धमाकेदार है। लेकिन जैक स्नाइडर फिल्म को जब वीडियो गेम की तरह आगे बढ़ाने लगते हैं तो इसका दर्शकों से तारतम्य टूटने लगता है। फिल्म को बाप-बेटी का इमोशनल ड्रामा बनाने की उनकी कोशिश विफल इसलिए हो जाती है क्योंकि फिल्म के नायक को नायकत्व दिखाने का जो मौका मिला है, उसकी नीयत में ही खोट है। इस कहानी पर उनके हस्तक्षेप के बिना एक अच्छी पटकथा बुनी जा सकती थी और ये फिल्म स्नाइडर को ये भी बताती है कि उन्हें अब अपने स्वमोह से बाहर आ जाना चाहिए। जिद करके हर बार दुनिया नहीं बदली जा सकती।

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आर्मी ऑफ द डेड - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म को तकनीकी रूप से जैक स्नाइडर ने एक असीमित दायरा देने की कोशिश की है लेकिन ऐसी पृष्ठभूमि में कलाकारों से बहुत ज्यादा उम्मीद करना बेमानी है। डेव ने फिर भी बहुत कोशिश की है चीजों को संभालने की। बाकी कलाकारों ने भी अपनी तरफ से कोशिश पूरी की है लेकिन फिल्म मे बाकी चीजें इतना ध्यान भटकाती हैं कि अच्छे कलाकार भी अपना अभिनय खुल के दिखा नहीं पाते हैं। फिल्म के बैकग्राउंड म्यूजिक में टॉम हॉल्केनबोर्ग ने अच्छे प्रयोग किए हैं। लेकिन, फिल्म के एडीटर डॉडी डॉर्न को फिल्म दो घंटे के भीतर ही समेट देना चाहिए था। अगर आप जैक स्नाइडर के कट्टर प्रशंसक हैं तो ये ही ये फिल्म आपके लिए है नहीं तो नेटफ्लिक्स पर ही रिलीज हुई फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ वीकएंड के लिए कहीं बेहतर फिल्म है।
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