फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Zoya Akhtar Interview: जावेद अख्तर नहीं इन्हें सबसे पहले फिल्म दिखाती हैं जोया, बताया रीमा से दोस्ती का किस्सा

विज्ञापन
1 of 8
जोया अख्तर का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हिंदी सिनेमा में पटकथाएं लिखने का एक नया दौर शुरू करने वाले जावेद अख्तर की बेटी जोया हिंदी सिनेमा की एकमात्र महिला फिल्म निर्देशक हैं जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार दो बार जीता है। उनकी मां हनी ईरानी का भी फिल्म लेखन में बड़ा नाम रहा है। जोया की पिछली फीचर फिल्म ‘गली बॉय’ ने रिकॉर्ड 13 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते और ये भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर ऑस्कर तक भी गई। अब उनकी नई फिल्म ‘द आर्चीज’ जल्द ही रिलीज होने वाली है। जोया अख्तर से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक एक्सक्लूसिव मुलाकात।
विज्ञापन

2 of 8
जोया अख्तर, रीमा कागती - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आप और आपकी करीबी सहयोगी रीमा कागती शुरू से साथ काम करती आ रही हैं, दो रचनात्मक लोगों का मेल कितना मुश्किल होता है?
मेरे हिसाब से तो बहुत मुश्किल है। साथ काम करने की बजाय मैं कहूंगी कि हम आपस में सहयोग करते हैं। हम जिस कलाक्षेत्र में हैं, वह सहयोगी कला है। अकेले तो कोई फिल्म बना ही नहीं सकता। अभिनेता, निर्देशक, छायाकार, संगीतकार सबको सहयोग करना पड़ता है। लेकिन मुझे लगता है जो सबसे मुश्किल सहयोग है, वह दो लेखकों का होता है। दोनों के बीच अगर तारतम्य नहीं है तो बहुत मुश्किल होता है काम करना।
विज्ञापन

3 of 8
बॉम्बे बॉयज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
25 साल हो गए आप दोनों की दोस्ती को तो आप दोनों की पहली मुलाकात कब हुई?
रीमा और मैं मिले थे एक फिल्म के सेट पर। एक फिल्म बन रही थी ‘बॉम्बे बॉयज’ (1998), हम दोनों उस फिल्म में सहायक निर्देशक थे। फिर हम दोनों ने साथ लिखना शुरू किया और धीरे धीरे पहली स्क्रिप्ट पूरी की। ये फिल्म थी ‘तलाश’ और उसके बाद फिर हम आगे ही बढ़ते गए।

4 of 8
आर्चीज के स्टारकास्ट के साथ जोया अख्तर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कुछ नया करते रहने की तलाश आपकी अब भी जारी है और ये आपकी नई फिल्म ‘द आर्चीज’ की झलकियों में दिखता भी है, 60 के दशक की दुनिया रचना तो चुनौती भरा रहा होगा?
हम एक बहुत ही प्रतिष्ठित कॉमिक बुक आर्चीज का सिनेमा के लिए अनुकूलन कर रहे थे। सबसे बड़ी चुनौती तो ये थी कि हम जैसे जो आर्चीज के फैन्स हैं, वे इसे पहली ही नजर में नकार न दें। उसके बाद हमें कुछ बेहद प्रतिभाशाली कलाकार मिले तो ये चुनौती थोड़ा कम हो गई। इन सबने इसके बारे में बहुत अध्ययन किया। हमने तो देखी हैं 50 और 60 के दशक की फिल्में, उन्होंने नहीं देखी हैं। उन्होंने उस दौर का संगीत सुना, उस दौर की फिल्में देखीं, कॉमिक बुक्स पढ़ीं और बहुत शोध किया अपने अपने किरदारों को लेकर।
विज्ञापन

5 of 8
आर्चीज पोस्टर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘द आर्चीज’ के सात नए कलाकारों में से कई तो आपसे बहुत पहले से घुले मिले रहे हैं तो इनके साथ काम करना आसान ही रहा होगा, या वहां का अनुशासन अलग था?
ये बहुत ही दिलचस्प रहा है। मैंने मिहिर आहूजा को इससे पहले भी निर्देशित किया है तो उसका मेरे साथ रिश्ता अलग था। फिर डॉट एक संगीतकार है। मैं डॉट की प्रशंसक हूं। डॉट को मैं फॉलो करती थी, उसके संगीत को पसंद करती थी तो उससे रिश्ता अलग है। फिर अगस्त्य है मैं उसे जानती थी हालांकि ज्यादा तो नहीं क्योंकि उसकी परवरिश दिल्ली में हुई और फिर वह लंदन में रहा तो सबके साथ समीकरण अलग अलग थे।
विज्ञापन

6 of 8
सुहाना खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
शाहरुख खान की बेटी की पहली फिल्म निर्देशित करने जैसा कोई दबाव नहीं महसूस किया आपने?
नहीं, ऐसा नहीं है। हमें पता है कि वह कितनी प्रतिभावान कलाकार हैं। हम कोई गलती करें या न करें, उसका सुहाना पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। मेरा ये मानना है कि किसी भी प्रतिभा को कभी दबाया नही जा सकता। वह बहुत ही मेहनती लड़की है और हम सब लोग जानते हैं कि ये कारोबार क्या है।
विज्ञापन

7 of 8
जोया अख्तर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
गावों के बच्चों को प्रतियोगिताओं के बारे में असल जानकारी 12वीं कक्षा के बाद मिलनी शुरू होती हैं, वहीं शहर का बच्चा कक्षा छह से आईआईटी की तैयारी शुरू कर देता है, वैसे ही फिल्मी परिवारों के बच्चों को भी कुछ तो फायदा मिलता ही होगा..
मैं अपना उदाहरण दे सकती हूं। आप अगर अपने अभिभावकों के पेशे को देखते रहते हैं, उसमें दिलचस्पी रखते हैं, उनके कार्यस्थल पर जाते रहते हैं तो आपको कुछ न कुछ अनजाने में ही सीखने को मिलता रहता है। ये माहौल में होता है। आप अपने अभिभावकों से सीखते ही हैं और अगर आपकी इसमें रुचि है तो आप इसे और बेहतर सीख सकेंगे और जल्दी शुरू कर सकते हैं लेकिन फिल्मी परिवारों के भी तमाम बच्चे ऐसे हैं जिन्हें फिल्मों में कतई रुचि नहीं है, जैसे अगस्त्य की बहन नव्या, उनको एक्टिंग नहीं करनी है।
विज्ञापन

8 of 8
परिवार के साथ जोया अख्तर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपके पिता जावेद अख्तर की बात आपके लेखन-निर्देशक के सिलसिले में खूब होती है, लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि आपकी मां हनी ईरानी का आप पर कितना असर है?
मेरी मां मेरी हर कहानी की पहली पाठक होती हैं। किसी भी कहानी का पहला ड्राफ्ट वह ही पढ़ती है। फिल्म जब तैयार होती है तो उसका फर्स्ट कट भी उनके पास ही जाता है। फिल्म संपादन में भी वह लाजवाब हैं। और, वह हमेशा खरी खरी बात कहती हैं, घुमा फिराकर कहने की उनका आदत नहीं है। और, मेरी ये फिल्म ‘द आर्चीज’ तो है ही उस दौर की जब वह टीनएजर थीं तो इसमें तो उन्होंने बहुत मदद की है।
ये पूरा वीडियो इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं:
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें