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Sunday Interview: डिजिटल डेब्यू पर बोले अश्विनी चौधरी, आने वाला समय मनोरंजन का नया स्वर्णिम युग होगा

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अश्विनी चौधरी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
निर्देशक अश्विनी चौधरी ने पत्रकारिता के बाद सिनेमा में खूब नाम कमाया। और, अब वह डिजिटल की तरफ बढ़ चले हैं। अश्विनी अपनी पहली ही फिल्म ‘लाडो’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी हासिल कर चुके हैं। वह एक प्रयोगधर्मी फिल्मकार रहे हैं और मुंबई में फिल्म जगत में उनकी गिनती उन चंद फिल्मकारों में होती है जो सच को सच कहने में पीछे नहीं रहते। सिनेमा की खेमेबाजी से दूर उभरते कलाकारों पर भरोसा रखने वाले अश्विनी का वूट सेलेक्ट की वेब सीरीज ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन से डिजिटल डेब्यू हुआ है। दर्शकों की बदलती रुचियों, फंतासी से बाहर आकर वास्तविकता के करीब की कहानियों की बढ़ती मांग और सिनेमा व ओटीटी के बीच बने नए पुल को लेकर उनकी पंकज शुक्ल से एक खास मुलाकात।
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इललीगल सीजन 2 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पिछले दो साल में भारतीय दर्शकों की रुचियों में हुए बदलाव को कितना सकारात्मक मानते हैं आप?

कोरोना संक्रमण काल दर्शकों के लिए खुद को जानने का समय रहा है। अब तक दर्शक भावनाओं में बहकर अपने पसंदीदा सितारों की फिल्में देखते रहे हैं, कहानियां उनके लिए गौण हुआ करती थीं और सितारे पहली पसंद। लेकिन, बीते दो साल में घरों में कैद रहने के दौरान दर्शकों ने विदेशी कहानियों के साथ साथ भारत की हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं में बनी फिल्में और वेब सीरीज खूब देखी हैं। इसका फायदा ये हुआ है कि हिंदीभाषी दर्शकों में भी बेहतर कहानियों की भूख बढ़ी है।
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इललीगल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वेब सीरीज ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन से आपका डिजिटल डेब्यू हो रहा है। इसी सीरीज से ओटीटी पर कदम रखने की कोई खास वजह?

कानून और अदालतों की पृष्ठभूमि पर हिंदी में मनोरंजन सामग्री पहले भी बनती रही है। हिंदी सिनेमा की चंद कालजयी फिल्में भी इसी पृष्ठभूमि पर बनी हैं। लेकिन, वकालत के पेशे में शामिल लोगों की निजी जिंदगियों, उनकी अपनी महात्वाकांक्षाओं और उनके मानवीय स्वभावों की कमजोरियों पर कहानियां बनाना आसान नहीं है। वेब सीरीज ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन में आपको ये सब दिखेगा। इसकी रिलीज के बाद जिस तरह के संदेश मुझे मिल रहे हैं, वे इस बात का प्रतीक हैं कि हिंदीभाषी दर्शकों का कहानियों में निवेश बढ़ रहा है।

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इललीगल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
ओटीटी पर मनोरंजन सामग्री लगातार बढ़ रही है। अब सिनेमाघर भी खुल गए हैं तो क्या अब ओटीटी के लिए चुनौती बढ़ती जाएगी?

ओटीटी एक ऐसा मनोरंजन माध्यम है जिसमें दर्शक अपनी सुविधानुसार कभी भी, कहीं भी मनोरंजन सामग्री देख सकता है। दूसरे जिस तरह से फिल्मों और वेब सीरीज में भाषाओं के बंधन मिट रहे हैं, उससे मुझे लगता है कि चुनौती सिनेमा के लिए ज्यादा बढ़ी है। अब सिनेमाघरों में दर्शक वही फिल्में देखने जाएंगे जिनकी कहानियों का आनंद बड़े परदे पर ही बेहतर तरीके से आएगा। छोटे बजट की कथानक प्रधान फिल्मों के लिए ओटीटी बेहतर माध्यम है लेकिन लार्जर दैन लाइफ कहानियां आपको बड़े परदे पर ही आनंद देंगी।
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मारा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
भाषाई दूरियां मिटने को लेकर आपकी क्या राय है?

हिंदी भाषी दर्शकों में दूसरी भाषाओं की मनोरंजन सामग्री को लेकर पहले भी रुचि कम नहीं रही है। हां, तब उनके पास सिर्फ इनकी सूचनाएं पहुंचती थीं। दूसरी भारतीय भाषाओं में बनी सामग्री ओटीटी के आने के बाद उनके पास सुगमता से पहुंच रही है। तभी ‘मारा’ और ‘जय भीम’ जैसी फिल्में अपनी मूल भाषाओं के दर्शकों से ज्यादा हिंदीभाषी दर्शकों के बीच देखी जा रही हैं। आने वाला समय भारतीय मनोरंजन सामग्री का होगा और ये सामग्री सभी मुख्य भारतीय भाषाओं में दर्शकों को परोसी जाएगी। अलग अलग भाषाओं के कलाकारों को एक ही फिल्म या सीरीज में लेकर इन्हें अखिल भारतीय दर्शकों को परोसने की शुरुआत हो चुकी है। आने वाला तसमय भारतीय मनोरंजन सामग्री का नया स्वर्णिम युग होने वाला है।
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जय भीम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जिस तरह से विदेशी ओटीटी भारतीय मनोरंजन सामग्री में निवेश कर रहे हैं, उससे कुछ लोग भारतीय परंपराओं और संस्कृति को नुकसान की बात भी कर रहे हैं, इस बारे में आपका क्या कहना?

दर्शकों की सोच से बड़ा दूसरा कोई फिल्टर नहीं है। उसके सामने आप अंतर्राष्ट्रीय पैकेजिंग के नाम पर कुछ भी नहीं परोस सकते। वह विदेशी कहानियां देख देखकर अपनी सोच विकसित कर चुका है। वह अब सितारों के आभामंडल से प्रभावित नहीं होता। सितारों की ब्रांड वैल्यू अब भी है और आगे भी रहेगी लेकिन अब समय आ गया है जब प्रोडक्शन कंपनियों को कहानी में निवेश करने की पहल करनी होगी। लेखकों को भी इस मौके का फायदा उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। हां, उनको अपने विचार या कहानियां निर्माताओं के साथ साझा करने से पहले उसका पंजीकरण जरूर करा लेना चाहिए।
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