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Shilpa Rao: शाहरुख से पहली बार ‘पठान’ के शो पर ही मिली मैं, उनमें जरा सा भी घमंड नहीं है सुपरस्टार होने का

Sat, 20 May 2023 08:37 PM IST
मोहम्मद फायक अंसारी अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
'जावेदा जिंदगी' से अपने करियर की शुरुआत करने वाली पार्श्वगायिका शिल्पा राव ने अपनी आवाज से संगीत जगत में एक अलग पहचान बनाई है। झारखंड से मुंबई शहर तक अपना नाम बनाने में उन्हें 15 साल लग गए। शिल्पा अपने इस पूरे सफर का श्रेय अपने पिता एसवी राव को देती हैं क्योंकि पहले गुरु के तौर पर उनके पिता ने ही उनकी संगीत शिक्षा की नींव रखी। आइए जानते हैं ‘अमर उजाला’ से एक खास बातचीत में शिल्पा ने अपने अब तक के सफर के बारे में बात की।
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शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म अनवर के गाने 'जावेदा जिंदगी' से आपने शुरुआत की और आज आपके गाने हर व्यक्ति की जुबान पर है। ये 15 साल आपके लिए कैसे रहे ?

मैं अपने आपको बहुत ही खुशनसीब मानती हूं कि मुझे इतने महान लोगों के साथ काम करने का मौका मिला। मैंने जिन भी लोगों के साथ काम किया है वह ऐसे लोग हैं जिनसे मैंने संगीत से लेकर जीवन के बारे में बहुत सी चीजें सीखी हैं। आज जो देश दुनिया से मुझे प्यार मिल रहा है उसके लिए मैं बहुत ही आभारी हूं। लेकिन मेरा मानना है कि यह जो मैंने इतने साल में किया है उसको मैं अकेले नहीं कर सकती थी। मुझे लगता है कि कोई भी व्यक्ति अकेले आगे नहीं बढ़ सकता है। मेरे साथ कई लोग रहे जिन्होंने मुझे यहां तक पहुंचने में मदद की है।
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हरिहरन, शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

वे कौन लोग हैं जिन्होंने आपकी मदद की?

लोगों की लिस्ट तो बहुत ही लंबी है। हरिहरन जी के बारे में तो आप लोग जानते ही होंगे। क्योंकि मैं उनका नाम अक्सर लेती ही रहती हूं। इनके अलावा उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहब, मिथुन, शंकर महादेवन सहित कई लोग हैं। अगर और लोगों की बात करूं तो विशाल और शेखर, सिद्धार्थ आनंद, प्रीतम जैसे लोगों ने मुझे शुरुआत में काफी कुछ सिखाया है।
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अपने पिता के साथ शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आपने संगीत की तालीम किससे ली? और आप संगीत में किसको अपना गुरू मानती हैं?

मेरे सबसे पहले गुरु मेरे पिता रहे हैं। उन्होंने मुझे बहुत बचपन से ही शास्त्रीय संगीत की तालीम देना शुरू कर दिया था। आज मैं जो कुछ भी हूं उसमें बहुत बड़ा हिस्सा उनका है। उसके बाद हरिहरन जी, गुलाम मुस्तफा खान जी से भी काफी कुछ सीखा। इन्हीं लोगों से मैं बचपन से संगीत सीखती आ रही हूं। आज भी कुछ पूछना होता है या रियाज करना होता है तो मैं हरिहरन जी के पास जाती हूं।  मुझे लगता है पूरी जिंदगी इन लोगों की शिष्या बनी रहूंगी। क्योंकि हम सभी पूरी जिंदगी किसी न किसी से कुछ ना कुछ सीखते हैं।
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शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
संगीत को पेशा बनाना है यह कब सोचा
दरअसल कभी सोचा नहीं था। यह तो बस हो गया। मैं संगीत में जहां हूं वह बचपन की तालीम की वजह से ही है। अगर मैने तब संगीत नहीं सीखा होता तो मैं संगीत में अपना करियर नही बना पाती। बचपन में ही मुझे शास्त्रीय संगीत और गजल की तालीम मिली है। जिसकी मदद से मैं अच्छा कर पा रही हूं। मुझे लगता है जिन लोगों को भी संगीत में अपना करियर बनाना है उनको अगर हो सके तो बचपन से ही संगीत सीखना चाहिए। और संगीत से प्रेम होना बहुत जरूरी है। मैं इतने साल से काम कर रही हूं लेकिन कभी लगा ही नहीं कि मैं काम कर रही हूं। क्योंकि संगीत तो मेरा प्यार था। और बहुत कम लोगों के साथ ऐसा होता है कि जो उनको पसंद है वो मिल जाए।
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शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आपका अपने शहर जमशेदपुर से अब कितना जुड़ाव है?

मैं चाहे जितना भी आगे चली जाऊं लेकिन जमशेदपुर हमेशा मेरी आत्मा का हिस्सा रहेगा। आज इतने काम के बावजूद भी कभी-कभी बचपन की और जमशेदपुर की याद आती है। और मुझे लगता है इंसान चाहे जितना आगे चला जाए लेकिन कभी अपनी जड़ें नहीं भूलता है। अपना घर तो अपना ही होता है। जब कभी मैं जमशेदपुर जाती हूं तो लोग आज भी मुझे उसी प्यार से ट्रीट करते हैं जैसे पहले करते थे। बस अब वहां पर थोड़े ज्यादा लोग मुझे जानने लगे हैं। हाल ही में मैं अपने स्कूल गई थी और वहां स्कूल में खड़े होकर मैं भावुक हो गई। क्योंकि लग रहा था कि कितना आगे आ गई हूं तो जब भी यादों में जाना होता है जमशेदपुर याद कर लेती हूं।
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शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आपने कई बार गुलजार और ए आर रहमान के साथ काम किया है। तो ऐसे महान लोगों के साथ काम करने का अनुभव कैसा होता है?

हर बार इन लोगों के साथ काम करना मेरे लिए एक सीख की तरह होता है। गुलजार साहब और एआर रहमान जी ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी वजह से मैंने संगीत में अपना करियर सोचा था और आज जब मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिल रहा है तो यह अनुभव ही बहुत खूबसूरत होता है। आज कई दशकों से लगातार काम करने के बाद भी यह लोग काम को बहुत इज्जत से देखते हैं। मैंने देखा कि काम उनके लिए पूजा की तरह है तो उनके साथ रहते हुए मैंने संगीत सीखने से ज्यादा सीखा, संगीत की इज्जत करना क्योंकि काम का तरीका अच्छा होना बहुत ही जरूरी होता है। 
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शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

मणि रत्नम के साथ काम करना कैसा होता है?

मणि रत्नम एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनको देखना ही मन में शांति का अनुभव कराता है। वह बहुत शांति से आपको आपका काम सौंप कर चले जाते हैं क्योंकि उन्हें आप पर भरोसा होता है। उनके साथ काम करना बहुत ही शांतिपूर्ण होता है। उनका व्यक्तित्व उनके काम में दिखत है। हम देख पाते हैं कि वह कितने लगन से अपने काम को करते हैं। शायद यही वजह है कि लोग उनके साथ काम करने को उत्सुक रहते हैं। मैं तो हर व्यक्ति से सीखती हूं तो मणि रत्नम से भी बहुत कुछ सीखा क्योंकि वहां तो खजाना है सीखों का।

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शिल्पा राव, शाहरुख खान - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

'बेशर्म रंग' के दौरान या उसके बाद कभी शाहरुख खान से मिलना हुआ? अगर हां तो कैसा रहा शाहरुख से मिलना ?

मैं उनसे पहली बार 'पठान' फिल्म की स्क्रीनिंग के समय ही मिली थी। उसी दिन फिल्म रिलीज हुई थी। स्क्रीनिंग के समय वहां पर फिल्म से जुड़े लगभग सभी लोग थे। मैंने देखा कि शाहरुख खान जाकर सभी से मिल रहे हैं, बातें कर रहे हैं। ये देख कर मैं थोड़ी सी हैरान थी। शाहरुख के बारे में जो धारणा है कि वह लोगों को अच्छा महसूस कराते हैं। वह एकदम सच है क्योंकि इतना बड़ा स्टार होने के बाबजूद भी उनमें घमंड नहीं है। मैंने उनसे सीखा कि आप चाहे जिस भी जगह पहुंच जाइए लेकिन लोगों के साथ प्रेम से पेश आना बेहद जरूरी है। 

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शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

शिल्पा 'जावेदा जिंदगी' भी गाती हैं और 'बेशर्म रंग' भी गाती हैं तो किस तरह का संगीत आप पसंद करती हैं?

मुझे लगता है मैं जिस तरह के गाने की तैयारी कर रही होती हूं, उस दुनिया में चली जाती हूं। मुझे लगता है संगीत एक ऐसी कला है जो लोगों के साथ बहुत लंबे समय तक रहती है। मैं चाहे जो करूं हर चीज को अच्छे से करूं और उसमें खुद को महसूस करूं इतनी ही मेरी इच्छा होती है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम ऐसा संगीत बनाएं जिससे लोग खुद को जोड़ कर देख सकें। फिर यह मायने नहीं रखता है कि वह गजल है या पॉप। और जिस तरह से मैं गाती हूं उसी तरह से सुनती भी हूं। मैं कोशिश करती हूं कि हर तरह का संगीत सुन सकूं।

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शिल्पा राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आपके जुबान पर अपना खुद का सबसे ज्यादा कौनसा गाना रहता है? 

मुझे लगता है यह सभी के साथ होता है कि आपका पहला काम आपके दिल के सबसे करीब होता है। और, पता नहीं क्यों लेकिन आज भी मैं उसे ही सबसे ऊपर रखती हूं। बाकी भी बहुत से गाने पसंद हैं लेकिन वह एक गाना है जो आज इतने सालों बाद भी मेरा पसंदीदा बना हुआ है। ‘जावेदा जिंदगी’ को आज भी सुनती हूं तो दिल खुश हो जाता है। शायद इसलिए क्योंकि शुरुआत वहीं से हुई थी तो यादें भी बहुत हैं उसके साथ।
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