महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को ब्रिटिश हुकूमत के नमक कानून भंग को करने के लिए साबरमती आश्रम से जो दांडी यात्रा निकाली थी, उसकी निशानियां देहरादून में भी मौजूद हैं।
विज्ञापन
2 of 6
kharakhet
- फोटो : AmarUjala
24 अप्रैल को इस ऐतिहासिक मार्च का दून भी साक्षी बना था। लेकिन दुख इस बात का है कि राजधानी से महज 22 किलोमीटर दूर स्थित इस ऐतिहासिक स्थल का कोई खैरख्वाह नहीं है।
विज्ञापन
3 of 6
kharakhet
- फोटो : AmarUjala
खाराखेत की पहाड़ी में नमक वाले पानी का प्राकृतिक स्रोत हैं। गांधी जी ने इसी खासियत को देखते हुए नमक कानून तोड़ने के लिए 24 अप्रैल 1930 को यहां नमक बनवाया था। हालांकि नमक बनाए जाने की निशानदेहियां अब मिट चुकी हैं। नमक बनाने के लिए लगाया कुंड भी अब नजर नहीं आता है।
4 of 6
kharakhet
- फोटो : AmarUjala
स्रोत की देखभाल न होने के कारण यहां से हल्का रिस रहा नमकीन पानी जरूर दिख जाता है। निशानी के तौर पर अब एक स्मारक ही शेष है, जिस पर लिखे नाम और यादें भी धुंधला गई हैं। गांधी जी और उनके नमक सत्याग्रह की याद में ही यह स्मारक वर्ष 1983 में स्थापित किया गया था।
विज्ञापन
5 of 6
kharakhet
- फोटो : AmarUjala
गांधी की यादों से जुड़े इस ऐतिहासिक स्थल तक पहुंचना मुश्किल है। नंदा की चौकी से आगे सेला गांव आता है। यहां से आगे न तो बाइक, न ही कार से जाया जा सकता है। आगे तीन किलोमीटर का मुश्किल चढ़ाई वाला रास्ता है। स्मारक के नजदीक एक गेट है जो झाड़ियों से घिरा है।
‘वन विभाग के कुछ कर्मचारी आकर यहां कभी-कभी हल्की सफाई जरूर करा देते हैं लेकिन यहां कभी न तो कोई अधिकारी पहुंचता है और न ही कोई नेता। गांधी जयंती पर भी यहां आम दिनों जैसा सूनापन रहता है।’
- मोतीलाल (स्थानीय निवासी)