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केदारनाथ धाम मंदिर में पुजारी ने किया 'भगवान' का आभास

Wed, 14 Sep 2016 08:20 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
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kedarnath temple
भले ही विज्ञान और तकनीकी के युग में लोग भगवान के अस्तित्व पर विश्वास न करें, लेकिन कभी-कभी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं या सुनने को मिलती है। जिससे किसी महान शक्ति के होने का आभास होता है।
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kedarnath dham
समय पर लोगों द्वारा किसी महान शक्ति के आभास होने की बात सामने आती है। भारत के प्रसिद्घ धाम के पुजारी बाधेश लिंग ने भी तीन साल पहले ऐसा ही कुछ महसूस किया था।
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kedarnath dham
16-17 जून 2013 को केदारनाथ में चोराबरी ग्लेशियर से आए सैलाब ने केदारधाम को मरघट में बदल दिया था। मंदिर के पुजारी ने आपदा के वक्त साक्षात मंदिर में किसी महान शक्ति के होने का आभास किया। नेशनल फ्रंटीयर मैगजीन में छपे डॉ. ‌ब्रिजेश स‌ती के लेख में मंदिर के पुजारी बागेश लिंग ने इस बात का स्वीकारा है। पुजारी के मुताबिक आपदा के वक्‍त बागेश ने साक्षात ‌भगवान शिव के दर्शन किए।

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kedarnath dham
16 जून की रात मंदिर के आसपास की धर्मशालाएं बहने के बावजूद रात डेढ़ बजे पुजारी बाधेश लिंग मंदिर में गए और भगवान केदार का ‌अभिषेक, पूजन और बालभोग लगाया, जिसके बाद वह सुबह साढ़े पांच बजे अपने आवास पर चले गए। 
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kedarnath dham
कुछ देर बाद अचानक पुजारी को अनहोनी का आभास हुआ। उन्होंने केदार बाबा की भोग मूर्ति को अपने पास लिया और केदारधाम की ओर चल दिए।
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kedarnath dham
आठ बजे तेज आवाज हुई मंदिर हिलने लगा और मंदाकिनी नदी तेज बहाव के साथ मंदिर के पूर्वी दरवाजे से गर्भगृह में आ गई। इसके बाद मं‌दाकिनी ने गर्भगृह स्थित लिंग का अभिषक कर परिक्रमा की। इसके बाद सफेद रेत मंदिर के अंदर आ गई।
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kedarnath dham
अचानक मंदिर का पश्चिमी द्वार खुला और मलबा वहां से ‌बाहर चला गया। यह दृश्य अद्भुत था। पुजारी ने बताया कि इतना मलबा आने के बाद भी गर्भगृह में पहुंचा मंदाकिनी का जल एक दम साफ था।

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kedarnath dham
इसके बाद पानी के साथ आई रेत ने लिंग को समाधिस्त कर दिया था। फिर देखते ही देखते मंदिर में पानी का जल स्तर बढ़ता गया। पुजारी ने बताया कि पानी गले तक पहुंच गया, लेकिन वह केवल भगवान की भोगमूर्ति के बारे में सोच रहे थे।

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special photo gallery on kedarnath disaster
उन्होंने बताया कि सुबह आठ बजे से शाम साढ़े चार बजे तक वह मलबे में दबे रहे। लेकिन बाबा केदारनाथ की परंपरा को खत्म होने नहीं दिया। और तीन दिन तक इधर-उधर भटक कर भोग मूर्ति को गुप्तकाशी के ओंकारेश्वर मंदिर पहुंचाया।
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मंदिर के पुजारी के पास भोगमूर्ति थी। (भोगमूर्ति अभिमंत्रित होती है और जब मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद होते हैं तो भगवान की उत्सव डोली के साथ इस मूर्ति के शीतकालीन पूजा के लिए ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में रखा जाता है।)
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