हॉलीवुड के साथ ही अमेरीका, ब्रिटेन और कनाडा की सेनाएं भी भारत के हथियारों का लोहा मानती हैं। इनमें उपयोग में लाए गए हथियार और कॉस्ट्यूम भारत में बनाए जाते हैं।
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थॉर का हथोड़ा, गेम्स ऑफ थ्रोन की तलवार और कॉस्ट्यूम, 300 की तलवार और र्स्फाटीयंस के हेलमेट, आयरन मैन का हेलमेट, ग्लैडिएटर और लॉर्ड ऑफ द रिंग्स के वीर नायकों के हाथों में चमचमाती तलवारें भारत में ही बनती हैं।
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इतना ही नहीं भारत की तलवारें विदेशी सेनाओं की शान भी हैं। देहरादून की विंडलास स्टीलक्राफ्ट्स से हर साल अमरीकी सेना को 7000 से 10000, इंग्लैंड को क़रीब 1500 और कनाडा की सेना को करीब 500 तलवारें भेजी जाती हैं। इसके साथ ही यूनान (ग्रीस) की सेना को भी यहां से तलवारें भेजी जाती हैं।
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सेनाओं के अलावा विदेशों में बड़े पैमाने पर लोग शौकिया तौर पर भी इन्हें खरीदते हैं। विंडलास स्टीलक्राफ्ट्स के मालिक सुधीर विंडलास ने बीबीसी को बताया कि पश्चिमी देशों में तलवारों और हेलमेट को लेकर एक दीवानगी सी है जिन्हें ऐतिहासिक लड़ाइयों में इस्तेमाल किया गया या बॉलीवुड की फिल्म में दिखाया गया। यही वजह है कि हमारे पास ऑर्डर की भरमार रहती है, लेकिन अब हमारा ज्यादा जोर सेनाओं के लिए तलवार निर्यात करने पर है।
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देहरादून में इस हस्तशिल्प उद्योग का इतिहास कोई 71 साल पुराना है। 1943 में भारतीय सेना के लिये गोरखा खुखरी बनाने के लिये देहरादून में विंडलास स्टीलक्राफ्ट्स की स्थापना की गई थी। तब से लेकर आज यहां 400 तरह की तलवारें और 2000 तरह के हेलमेट बनाए जाते हैं।
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यहां के हाथ की कारीगरी वाले लड़ाकू पोशाकों, कवच, ढाल, खुखरी, जूते, तलवारों की मूठ और म्यानों की भी विदेशों में भारी मांग है। ये साजो-सामान प्राचीन रोम और यूनान के काल से लेकर, मध्यकालीन यूरोप के नाइट्स, अमरीकी गृहयुद्ध से लेकर नाज़ी और प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध तक के हूबहू नमूने या रिप्लिका तैयार किए जाते हैं।
ऑस्कर अवॉर्ड से नवाजी गई फिल्म 'ग्लैडिएटर', 'रिटर्न ऑफ द ममी" और 'लार्ड ऑफ़ द रिंग्स' जैसी हॉलीवुड फिल्मों के लिए हेलमेट और तलवारें भी देहरादून की इस कंपनी में ही बनाए गए हैं। इसके लिए उनके पास अंतरराष्ट्रीय लाइसेंस भी है।