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देखिए देश में अनोखा चमत्कारी मंदिर, जहां जाने से पूरी होती है पुत्र की मनोकामना

Wed, 12 Apr 2017 09:18 AM IST
amarujala.com- Written by: खुशबू गोयल
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देश में हनुमान का अनोखा मंदिर
हनुमान जयंती पर हम आपको बता रहे हैं ऐसे चमत्कारी मंदिर के बारे में, जिससे जुड़ी एक मान्यता काफी प्रसिद्ध है। यहां जाने से पुत्र की मनोकामना पूरी होती है।
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देश में हनुमान का अनोखा मंदिर
यूं तो अमृतसर विशेष रूप से स्वर्ण मंदिर, जलियांवाला बाग और वाघा बॉर्डर के लिए मशहूर है, पर यहां का बड़ा हनुमान मंदिर भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यहां हर साल लंगूरों का मेला लगता है और देश विदेश से बच्चे लंगूर बनने के लिए आते हैं।
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देश में हनुमान का अनोखा मंदिर
ये है मान्यता: इस अति प्राचीन मंदिर में स्थापित श्री हनुमान जी की मूर्ति बैठी हुई मुद्रा में है जैसे हनुमान जी विश्राम की मुद्रा में बैठे हों। माना जाता है कि यह मंदिर उस पवित्र धरती पर बना हुआ है, जहां रामायण काल में भगवान राम की सेना और लव-कुश के मध्य हुए युद्ध के समय हनुमान जी को वट वृक्ष के साथ बांध दिया गया था, क्योंकि श्री हनुमान जी लव-कुश से अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छुड़वाने के लिए आगे बढ़े थे।

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देश में हनुमान का अनोखा मंदिर
इसलिए बनते हैं बच्चे लंगूर: कहा जाता है कि जिन महिलाओं को पुत्र प्राप्ति नहीं होती, वे इस मंदिर में आकर पूरी श्रद्धा से मन्नत मांगती हैं कि उनको पुत्र प्राप्ति होने पर बच्चों को श्री हनुमान का लंगूर बनाया जाएगा। मन्नत पूरी होने पर सैंकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे लड़के विशेष प्रकार का लाल रंग का जरी वाला चोला पहनते हैं और हाथ में छड़ी लिए हुए मंदिर के अंदर-बाहर मैदान में अपने सगे-संबंधियों के साथ नाचते हुए घूमते रहते हैं।
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देश में हनुमान का अनोखा मंदिर
मंदिर के पुजारी नारायण के अनुसार, लंगूर बनने के लिए आने वालों को कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है। जैसे पूजा में मिठाई, नारियल, 2 पुष्प हार अर्पित करना, पुजारी जी से आशीर्वाद लेकर वर्दी धारण करना, फिर ढोल की ताल पर नाचना और प्रतिदिन दो समय माथा टेकने मंदिर में आना। बीमार होने पर मंदिर से भभूति ग्रहण करेगा। इसके अलावा लंगूर बनने वाला 10 दिन तक सुई धागे का काम और कैंची नहीं चला सकता।
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देश में हनुमान का अनोखा मंदिर
पुजारी नारायण के अनुसार, लंगूर बनने वाले बच्चे को 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करना होता है। लंगूर को मंदिर में माथा टिकाने के लिए वही व्यक्ति ला सकता है जिसका बच्चे के साथ खून का रिश्ता है। यहां हर साल लगने वाला मेला कार्तिक महीने के पहले नवरात्र से शुरू होकर 10 दिन चलता है और मंदिर में वह वट वृक्ष आज भी विद्यमान है।
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