बिल क्लिन्टन
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क्लिन्टन की नवाज शरीफ से दो टूक
जून के दूसरे सप्ताह से भारतीय सैनिकों को जो 'मोमेनटम' मिला, वो जुलाई के अंत तक जारी रहा। आखिरकार नवाज शरीफ को युद्ध विराम के लिए अमेरिका की शरण में जाना पड़ा। अमरीका के स्वतंत्रता दिवस यानी 4 जुलाई, 1999 के शरीफ के अनुरोध पर क्लिन्टन और उनकी बहुत अप्रिय परिस्थितियों में मुलाकात हुई। उस मुलाकात में मौजूद क्लिन्टन के दक्षिण एशियाई मामलों के सहयोगी ब्रूस राइडिल ने अपने एक पेपर 'अमरिकाज डिप्लोमेसी एंड 1999 कारगिल समिट' में लिखा, 'एक मौका ऐसा आया जब नवाज ने क्लिन्टन से कहा कि वो उनसे अकेले में मिलना चाहते हैं। क्लिन्टन ने रुखेपन से कहा ये संभव नहीं है। ब्रूस यहां नोट्स ले रहे हैं। मैं चाहता हूं कि इस बैठक में हमारे बीच जो बातचीत हो रही है, उसका दस्तावेज के तौर पर रिकॉर्ड रखा जाए।"
राइडिल ने अपने पेपर में लिखा है, "क्लिन्टन ने कहा मैंने आपसे पहले ही कहा था कि अगर आप बिना शर्त अपने सैनिक नहीं हटाना चाहते, तो यहां न आएं। अगर आप ऐसा नहीं करते तो मेरे पास एक बयान का मसौदा पहले से ही तैयार है जिसमें कारगिल संकट के लिए सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान को ही दोषी ठहराया जाएगा। ये सुनते ही नवाज शरीफ के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं।"
उस पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य तारिक फातिमी ने 'फ्रॉम कारगिल टू कू' पुस्तक की लेखिका नसीम जेहरा को बताया कि 'जब शरीफ क्लिन्टन से मिल कर बाहर निकले तो उनका चेहरा निचुड़ चुका था। उनकी बातों से हमें लगा कि उनमें विरोध करने की कोई ताकत नहीं बची थी।' उधर शरीफ क्लिन्टन से बात कर रहे थे, टीवी पर टाइगर हिल पर भारत के कब्जे की खबर 'फ्लैश' हो रही थी। ब्रेक के दौरान नवाज शरीफ ने मुशर्रफ को फोन कर पूछा कि क्या ये खबर सही है? मुशर्रफ ने इसका खंडन नहीं किया।