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क्या धरती पर तबाही से पहले उल्कापिंड का पता लगाया जा सकता है?

Wed, 22 Apr 2020 08:59 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अगर किसी रोज हमारी धरती से कोई क्षुद्र ग्रह या उल्कापिंड टकरा जाए, तो क्या होगा? क्या ऐसी किसी आफत को आने से रोका जा सकता है? क्योंकि उल्कापिंड या धूमकेतु अगर पृथ्वी से टकराया तो भारी तबाही मच सकती है। ब्रह्मांड में बहुत से उल्कापिंड, धूमकेतु और क्षुद्र ग्रह तैर रहे हैं। ये बेकाबू हैं और किसी भी ग्रह के गुरुत्वाकर्षण के दायरे में आने पर उससे टकराकर खत्म हो जाते हैं। ऐसा टकराव भारी तबाही ला सकता है।

हमारी धरती ने इसका एक सबूत 1908 में साइबेरिया के टुंगुस्का में देखा था। जब एक क्षुद्र ग्रह धरती से टकराने से पहले जलकर नष्ट हो गया था। इसकी वजह से करीब 100 मीटर बडा आग का गोला बना था। इसकी चपेट में आकर 8 करोड पेड नष्ट हो गए थे। ऐसी किसी तबाही से बचाने के लिए दुनिया के कई वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। वे किसी एस्टेरॉयड के धरती से टकराने का पूर्वानुमान लगाकर, उससे निपटने के उपाय तलाश रहे हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
बोत्सवाना के जंगलों में खोज
ऐसी ही एक टीम हाल ही में अफ्रीकी देश बोत्सवाना गई थी। इस टीम ने लगातार पांच दिनों तक जंगलों में मशक्कत की। कांटेदार झाडियों और घास की मोटी परत के बीच ये वैज्ञानिक एक खास चीज तलाश रहे थे। उन्हें मोटे तौर पर तो इस बात का अंदाजा था कि उन्हें 200 वर्ग किलोमीटर के दायरे में किस जगह पर उसे खोजना है। लेकिन, उस एस्टेरॉयड के टुकडे बहुत ही छोटे थे। इसलिए उसे ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा था। किसी को क्या पता कि क्षुद्र ग्रह के वो टुकडे कहीं दब गए हों? या हवा में उड गए हों? तभी अचानक वैज्ञानिकों की नजर एक काले, धूल भरे पत्थर पर पडी। ये हमारी धरती का नहीं था। ये बाहर से आया था।

एक महीने पहले खगोलविदों की एक टीम ने पूर्वानुमान लगाया था कि एक क्षुद्र ग्रह धरती से आकर उसी जगह टकराएगा। इसका नाम 2018 एलए रखा गया था। ये रात के वक्त बोत्सवाना के जंगलों में गिरा था। धरती के वातावरण में आकर ये जल गया था और इसके टुकडे बिखर गए थे। इस क्षुद्र ग्रह के टुकडे मिलने से खगोलविदों की एक बात सही साबित हुई। और हमारे इतिहास में ऐसा केवल दूसरी बार हुआ था कि किसी क्षुद्र ग्रह को वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में देखा और फिर उसके टुकडे धरती पर मिले।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लोगों को सूचित करना होगा आसान?
जिस टीम ने इस टुकडे को खोजा, उसे ये उम्मीद है कि दूरबीनों की मदद से एक दिन ऐसी घटना के प्रति लोगों को आगाह किया जा सकेगा। अगर खतरा गंभीर होगा, टकराने वाला कोई धूमकेतु या उल्कापिंड बडे आकार का होगा, तो ये चेतावनी दुनिया को बडी तबाही से बचा लेगी। जब 2018 एलए नाम का ये क्षुद्र ग्रह अंतरिक्ष में तैर रहा था, तो इसे कैटालिना स्काई सर्वे नाम की संस्था की दूरबीन ने देखा था। ये प्रोजेक्ट नासा की मदद से चलाया जा रहा है। इस क्षुद्र ग्रह को एटलस यानी एस्टेरॉयड टेरेस्ट्रियल इम्पैक्ट लास्ट एलर्ट सिस्टम की दूरबीन ने भी देखा था।

एटलस सिस्टम अमरीका की हवाई यूनिवर्सिटी का है। ये दूरबीनों का ऐसा सिस्टम है, जिसका मकसद धरती की तरफ आ रहे बडे-बडे उल्कापिंडों या क्षुद्र ग्रहों से आगाह करना है। एटलस सिस्टम की स्थापना जॉन टोनरी ने की है, जो एक खगोलविद हैं। उन्हें इस सिस्टम की स्थापना करने की प्रेरणा उन चर्चाओं से मिली थी, जिनमें ये कहा जा रहा था कि किसी उल्कापिंड या धूमकेतु के धरती से टकराने की संभावना बहुत ही कम है। शायद हजार दो हजार साल में कभी एक बार ऐसा हो सकता है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : NASA
तब गई थी सिर्फ 1 शख्स की जान
टोनरी कहते हैं कि, "मुझे इन बातों से हैरानी होती थी। लोग बडे यकीन के साथ ऐसे दावे करते थे। जबकि हमारी धरती से किसी क्षुद्र ग्रह के टकराने की सबसे हालिया घटना करीब 100 साल पहले हुई थी।"

टोनरी का इशारा साइबेरिया के टुंगुस्का में एस्टेरॉयड के जलने की तरफ था। जिसमें 8 करोड से ज्यादा पेड तबाह हो गए थे। ये एक वीरान इलाका था। सोचिए, अगर वो क्षुद्र ग्रह किसी बडी आबादी वाले इलाके के ऊपर वातावरण में जला होता तो? हम इसकी कल्पना मात्र से ही सिहर उठते हैं कि तब कितनी बडी तबाही मची होगी। हालांकि 1908 में साइबेरिया की घटना में केवल एक व्यक्ति की जान गई थी।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
टोनरी के एटलस सिस्टम के तहत अब तक दो दूरबीनें लगाई गई हैं। दोनों ही अमरीका के हवाई में हैं। हालांकि टोनरी बहुत जल्द दक्षिण अफ्रीका में एक दूरबीन लगाने वाले हैं, ताकि धरती के दक्षिणी गोलार्ध के आसमान के ऊपर भी निगरानी की जा सके। जल्द ही एक चौथी दूरबीन लगाने के लिए भी पैसा जुटाया जाएगा। जब एटलस सिस्टम पूरी तरह काम करने लगेगा, तो टोनरी को उम्मीद है कि हमें किसी भी संभावित खतरे की जानकारी पहले से मिल जाएगी। हमें इतना वक्त मिल जाएगा कि हम लोगों को टकराने वाली संभावित जगह से हटा सकें।

बोत्सवाना में एस्टेरॉयड के जो टुकड़े मिले, उनकी मदद से हमें आज ये यकीन है कि एटलस सिस्टम से ऐसे किसी खतरे का सही-सही अंदाजा लगाया जा सकता है। 2018 एलए नाम का ये क्षुद्र ग्रह किस जगह टकराएगा, इसका सटीक अंदाजा लगाना बडी उपलब्धि है। क्योंकि, ये बहुत छोटा सा, केवल दो मीटर का चट्टान का टुकडा मात्र था।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
एटलस सिस्टम कैसे करेगा काम
ब्रिटेन की साउथैम्पटन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर क्लीमेंस रंफ कहते हैं कि 'एटलस सिस्टम बहुत अच्छी पहल है। रोजाना कोई न कोई एस्टेरॉयड हमारी नजर से बच जाता है।' धरती के इर्द-गिर्द सारा आसमान ऐसी बेअंदाज चट्टानों से भरा हुआ है। एटलस का काम ऐसे टुकडों का पता लगाना है, जो हमारी धरती के लिए खतरा बन सकते हैं।

जॉन टोनरी ने बताया कि उनकी टीम ने केवल एक रात की निगरानी से दस लाख टुकडों में से 2018 एलए को खोज निकाला था। आसमान में लगातर आतिशबाजी होती रहती है। उल्कापिंड जलते रहते हैं। धूमकेतु तैरते हैं। तारे आपस में टकराकर जलते हैं। इनमें से दस या बीस ही एटलस सिस्टम की निगरानी के दायरे से बाहर हैं। ये सारी खतरनाक हों, ये जरूरी नहीं है। ऐसे में कोई क्षुद्र ग्रह अगर धरती की तरफ बढता दिखाई देता है, तो एटलस की दूरबीनें चेतावनी दे देती हैं। इस चेतावनी को एटलस की वेबसाइट पर डाल दिया जाता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
नासा जैसे संस्थानों में काम कर रहे खगोलविद या इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के माइनर प्लानेट सेंटर में भी इस चेतावनी को पढ लिया जाता है। इससे उन्हें तुरंत आने वाले खतरे के बारे में पता चल जाता है। फिर वो धरती की तरफ आ रहे एस्टेरॉयड की निगरानी शुरू कर देते हैं। और खगोलविद इस बात का भी अंदाजा लगाने लगते हैं कि वो धरती पर कहां टकरा सकता है।

क्लीमेंस रंफ कहते हैं कि कुछ बडे आकार के क्षुद्र ग्रह सूरज की कक्षा में नियमित रूप से तैरते रहते हैं। हो सकता है कि वो धरती के रास्ते में पड जाएं, या न भी पडें। ऐसे क्षुद्र ग्रहों के टकराने या न टकराने की भविष्यवाणी करना आसान है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
इंसानों को कैसा बचाया जा सकेगा
लेकिन, हर खगोलीय चट्टान का मिजाज अच्छा हो, ये नहीं कहा जा सकता। कई तो ऊटपटांग कक्षा में भी घूम रहे होते हैं। वो अचानक से आकर धरती से टकरा सकते हैं। ऐसे खतरों से इंसान को बचाने में एटलस जैसे सिस्टम काफी कारगर साबित हो सकते हैं।

एरिजोना यूनिवर्सिटी की एलेसांड्रा स्प्रिंगमैन कहती हैं कि अगर कोई उल्कापिंड रडार की पकड में आ जाता है, तो आप उससे धरती को खतरे का अनुमान लगा सकते हैं। ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारी धरती के वातावरण में प्रवेश के बाद वो कितना खतरनाक होगा। कोई भी क्षुद्र ग्रह जितना बडा और भारी होगा, उससे हमें उतना ही ज्यादा खतरा होगा। लेकिन, अगर कोई ऐसा धूमकेतु, उल्कापिंड या क्षुद्र ग्रह हो, जो हजारों-लाखों लोगों के लिए खतरा बनने वाला हो, तो क्या होगा? अगर इससे इतना कचरा धरती पर गिरने की आशंका हो कि पृथ्वी की जलवायु पर लंबे वक्त के लिए असर पडे, तो क्या होगा?
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मोटे तौर पर ये मान लीजिए कि हम ऐसे किसी क्षुद्र ग्रह का पता पहले से लगा लेंगे। हमें इससे बचने के लिए थोडा वक्त मिल जाएगा।

एलेसांड्रा स्प्रिंगमैन कहतीं है कि इस तरह के एस्टेरॉयड से बचने के लिए कोई अंतरिक्ष यान इसकी तरफ भेजा जा सकता है, जो इससे टकराकर अंतरिक्ष में ही खत्म कर दे। या उसका रास्ता बदल देगा। अगर समय कम हो, तो कोई बम भी इस क्षुद्र ग्रह पर फेंका जा सकता है। अगर, हम ऐसे किसी खतरे को धरती से दूर रख पाए, तो इसका पूरा श्रेय उन वैज्ञानिकों को जाएगा, जो हमें ये बताएंगे कि कोई उल्का पिंड कितना बडा है और कितनी तेजी से धरती की तरफ बढ रहा है। और इससे हमें कितना बडा खतरा है।
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