पीयू के स्टूडेंट्स काउंसिल चुनाव में सोई (स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया) के नेतृत्व वाले पैनल की जीत शिअद के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। राजधानी चंडीगढ़ के इस बड़े संस्थान के छात्र संघ पर शिअद के स्टूडेंट्स विंग का कब्जा पार्टी के लगातार बढ़ते जनाधार का संकेत कहा जा रहा है।
सियासी माहिरों का मानना है कि आने वाले दिनों में पंजाब की सियासत में इसका असर निश्चित रूप से देखने को मिलेगा । शिअद अध्यक्ष व पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने इस जीत को युवाओं में सोई के प्रति बढ़ते रुझान की स्पष्ट झलक करार दिया है।
उन्होंने इस जीत का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे जहां संगठन व इसके कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा है, वहीं उन्हें एक नई जिम्मेदारी भी मिली है। उन्होंने कहा कि नव-नियुक्त पदाधिकारी उसी विजन के साथ छात्र भलाई के लिए जुटेंगे, जिसकी उन्होंने चुनाव के दौरान घोषणा की थी।
सुखबीर को विरोधियों पर हमले का हथियार मिला
सोई के राष्ट्रीय संयोजक और पंजाब यूथ डेवलपमेंट बोर्ड के चेयरमैन परमबंस सिंह बंटी रोमाना ने इस जीत को सुखबीर बादल की युवाओं के प्रति सोच का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि वह शिअद अध्यक्ष की सकारात्मक सोच को छात्रों के बीच लेकर गए, जिसे स्टूडेंट्स ने स्वीकार किया। यह जीत उसका सबूत है।
वहीं, विरोधियों ने केवल नकारात्मक प्रचार किया। इस वजह से उन्हें छात्रों ने नकार दिया। इसके साथ ही उन्होंने सोई नेताओं व कार्यकर्ताओं की मेहनत को इस जीत के लिए अहम बताया। विजयी पैनल वीरवार को दिल्ली में शिअद अध्यक्ष से मुलाकात करेगा।
बहरहाल, ड्रग्स के मुद्दे पर लगातार शिअद पर हो रहे सियासी हमलों के बीच युवा वर्ग से संबंधित इस चुनाव की जीत ने पार्टी को अपने सियासी विरोधियों पर हमला करने का हथियार दे दिया है।
सुखबीर पहले ही कहते आए हैं कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पंजाब के युवाओं के खिलाफ नशे को लेकर गलत प्रचार कर रहे हैं। अब इस जीत को पंजाब में भुनाने की पूरी कोशिश शिअद आने वाले समय में करेगा।
पीयू में शिअद का दबदबा बनेगा
छात्र काउंसिल चुनाव में सोई की जीत से अब पीयू कैंपस में सीधे तौर पर शिरोमणि अकाली दल का दबदबा बनेगा। पीयू पर शुरू से ही पंजाब हक जताता रहा है। पंजाब सरकार को हर साल पीयू को बजट का 20 करोड़ रुपया देना होता है। सोई नेताओं के काउंसिल में आने से पीयू को पंजाब से बजट का हिस्सा आसानी से मिल सकेगा। सोई के छात्र नेताओं को भी इस जीत से अकाली दल में और तव्वजो मिलने लगेगी।
पुसू और सोपू का वजूद खतरे में
पीयू छात्र राजनीति में राजनीतिक दलों का सीधे तौर पर हस्तक्षेप कभी नहीं रहा। पीयू में हमेशा सोपू और पुसू छात्र संगठनों का ही दबदबा रहा है। लेकिन अब कैंपस के कई संगठन वजूद बचाने में जुटे हैं। सोपू की हालत तो इतनी खस्ता है कि इस बार संगठन ने चुनाव ही नहीं लड़ा। दोनों पार्टियों के बड़े नेताओं ने राष्ट्र स्तर की राजनीतिक पार्टियों से हाथ मिलाकर राजनीति में कॅरियर बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं।
सोपू के बड़े नेता वीरेंद्र सिंह ढिल्लों और मनोज लुबाना ने 2012 में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कैंपस दौरे पर सोपू को छोड़ एनएसयूआई ज्वाइन की थी। 2013 छात्र काउंसिल चुनाव में पहली बार एनएसयूआई ने जीत हासिल की। ढिल्लों और लुबाना ने एनएसयूआई को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई।
बड़े दलों की प्रतिष्ठा का सवाल बनी पीयू की राजनीति
दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू) छात्र संगठन चुनावों की तरह ही अब पीयू कैंपस की छात्र राजनीति को बड़े राजनीतिक दलों ने प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था। इस चुनाव में प्रमुख राजनीतिक दलों अपने संगठनों को जीताने के लिए खूब पैसा और पसीना बहाया। 2013 और 14 में एनएसयूआई ने छात्र काउंसिल चुनाव जीतकर अपनी उपस्थित दर्ज कराई थी।
इसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), शिरोमणि अकाली दल की सोई, इंडियन नेशनल लोक दल की इनसो जैसे संगठनों ने भी पीयू कैंपस में जीत के लिए अपने स्टार प्रचार उतारे। पीयू छात्र काउंसिल में पहली बार पंजाब की शिरोमणि अकाली दल की छात्र इकाई सोई (स्टूडेंट आर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया) ने जीत हासिल कर कांग्रेस और एबीवीपी को पटखनी दी है।
पिछले करीब 5 से 7 वर्षों से शिरोमणि अकाली दल पीयू की छात्र राजनीति में पैठ बनाने की कोशिश में जुटा था। 2014 के छात्र काउंसिल चुनाव में सोई ने दूसरे छात्र संगठनों को कड़ी चुनौती दी थी। लेकिन इस बार सोई पीयू कैंपस में परचम लहराने में सफल हो गई।
पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल खुद पीयू छात्र काउंसिल चुनाव में काफी रुचि ले रहे थे। सोई की जीत के लिए दूसरे छात्र संगठनों के नेताओं को तोड़कर सोई में मिलाया गया। सोई की जीत में बंटी रमाणा, विक्की मिड्डूखेड़ा और रॉबिन बराड़ किंग मेकर बने।