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उत्तराखंड में दस प्रतिशत स्कूली बच्चे ‘निरक्षर’

Fri, 16 Jan 2015 01:48 PM IST
आफताब अजमत/अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के स्कूलों में अध्ययनरत कक्षा एक से आठवीं तक के दस फीसदी बच्चे निरक्षर हैं। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) की ताजा रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
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13 जनवरी को दिल्ली में जारी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014 में प्रथम संस्था ने प्रदेश के 301 प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूलों (सरकारी और निजी) में शिक्षा के स्तर का जायजा लिया तो पता चला कि कक्षा एक से आठ तक के सैकड़ों बच्चों को शब्द तो दूर अक्षरों की भी पहचान नहीं है।

सर्वेक्षण में करीब पांच हजार बच्चे शामिल किए गए थे। यह संस्था प्रतिवर्ष देशभर के स्कूलों में सर्वेक्षण करती है।

इतने बच्चे नहीं जानते अक्षर

एक- 30.2कक्षा- प्रतिशत
दो- 17.6
तीन- 11.1
चार- 6.1
पांच- 4.5
छह- 2.1
सात- 1.4
आठ- 1.0

यह तथ्य आए सामने
- आठवीं तक के 10.7 प्रतिशत बच्चे शब्द नहीं जानते, कक्षा दो के 50.4 प्रतिशत बच्चे कक्षा एक का पाठ नहीं पढ़ पाते
- आठवीं तक के आठ प्रतिशत बच्चे एक से नौ तक के अंक नहीं पहचान पाते, इन अंकों को पहचानने वाले बच्चों का प्रतिशत सिर्फ 19 है
- आठवीं तक के सिर्फ 24 प्रतिशत बच्चे भाग के सवाल हल कर सकते हैं
- आठवीं तक के 13 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी के बड़े अक्षर भी नहीं पढ़ पाते

निजी स्कूल भी बदहाल
सरकारी स्कूलों से मुंह मोड़ निजी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने वाले अभिभावकों के लिए भी संस्था का सर्वे चौंकाने वाला है। सर्वे में प्रदेश के निजी स्कूल भी शामिल किए गए थे, लेकिन इन स्कूलों के बच्चे तो कुछ मामलों में सरकारी स्कूलों के बच्चों से भी पिछड़े नजर आए।
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निजी स्कूलों के कक्षा चार के बच्चों को कक्षा एक का पाठ पढ़ने को कहा गया तो 85.5 प्रतिशत बच्चे नाकाम रहे, जबकि सरकारी स्कूलों में ऐसे बच्चे 54.7 प्रतिशत ही थे। इसी तरह कक्षा दो का पाठ न पढ़ पाने वाले बच्चे निजी स्कूलों में 75 प्रतिशत रहे। सरकारी स्कूलों के 52 प्रतिशत बच्चे ही ऐसा नहीं कर सके थे।

हालांकि, अक्षर और शब्द पढ़ने में निजी स्कूल आगे रहे। निजी स्कूलों के कक्षा दो के 93.2 प्रतिशत बच्चे अक्षर पढ़ सकते हैं, सरकारी में यह प्रतिशत 72.8 था। कक्षा तीन के शब्द पढ़ पाने वाले बच्चे निजी स्कूलों में 82.6 प्रतिशत, जबकि सरकारी में 58 प्रतिशत ही रहे।

शिक्षा का स्तर कई पहलुओं से तय होता है। सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि बच्चा जिस परिवार से आता है, वहां निरक्षरता होने से उसे घर में पढ़ाई का माहौल नहीं मिल पाता। शिक्षा का अधिकार अधिनियम आने के बाद आठवीं तक बच्चे को फेल न करने की बाध्यता हो गई है। इससे बच्चों के साथ शिक्षक भी गंभीर नहीं रह गए हैं। सुधार के लिए समय-समय पर आधिकारिक निरीक्षण हो, बच्चों का ज्ञान परखा जाए। शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए तो हालात सुधरेंगे।
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- एनएस राणा, पूर्व अतिरिक्त शिक्षा निदेशक, गढ़वाल मंडल
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