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ओंकारेश्वर: श्राद्ध पक्ष में गया शिला तीर्थ पर उमड़ी आस्था, पितरों के तर्पण के लिए पहुंच रहे श्रद्धालु

Fri, 02 Oct 2026 10:50 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर

सार

श्राद्ध पक्ष में ओंकारेश्वर के गया शिला तीर्थ पर पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ रही है। नर्मदा तट पर लोग धार्मिक विधि-विधान से पूर्वजों का स्मरण कर आत्मशांति और मोक्ष की कामना कर रहे हैं। धार्मिक मान्यता के कारण दूर-दराज से भी परिवार यहां पहुंच रहे हैं।
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ओेंकारेश्वर की गया शिला तीर्थ पर पिंडदान करने पहुंचे लोग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में श्राद्ध पक्ष के दौरान पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव देखने को मिल रहा है। अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मशांति और मोक्ष की कामना लेकर श्रद्धालु नर्मदा तट पर पहुंच रहे हैं। ओंकारेश्वर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन गया शिला तीर्थ इन दिनों पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। सुबह से ही यहां श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। लोग अपने पूर्वजों का स्मरण कर धार्मिक विधि-विधान के साथ तर्पण और पिंडदान कर रहे हैं।
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श्राद्ध पक्ष को भारतीय धार्मिक परंपरा में पितरों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान परिवार अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों को याद करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से उन्हें पुण्य प्राप्त होता है तथा उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। इसी धार्मिक आस्था के चलते ओंकारेश्वर के गया शीला तीर्थ पर इन दिनों श्रद्धालुओं की गतिविधियां बढ़ गई हैं।

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महाभारत काल से जुड़ी मान्यता
गया शिला तीर्थ को लेकर स्थानीय स्तर पर प्रचलित धार्मिक मान्यता इसे महाभारत काल से जोड़ती है। मान्यता है कि इस पवित्र गया शिला की स्थापना पांडव पुत्र भीम द्वारा की गई थी। इसी वजह से धार्मिक दृष्टि से इस स्थान को विशेष महत्व दिया जाता है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में गया शिला को पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। श्रद्धालुओं की आस्था है कि जिस प्रकार गया धाम में पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है, उसी प्रकार ओंकारेश्वर स्थित गया शिला तीर्थ पर किए गए तर्पण और पिंडदान से भी पितरों को पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। हालांकि इन धार्मिक मान्यताओं का आधार आस्था और परंपरा है, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए इनका भावनात्मक और आध्यात्मिक महत्व गहरा है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में अनेक परिवार गया शीला पहुंचकर अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं।

मंत्रोच्चार के बीच तर्पण और पिंडदान
गया शिला तीर्थ पर सुबह के समय धार्मिक वातावरण दिखाई देता है। श्रद्धालु नर्मदा तट पर पहुंचकर स्नान, पूजन आदि के बाद पुरोहितों के मार्गदर्शन में पितरों के निमित्त तर्पण करते हैं। परिवार के सदस्य धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होते हैं और अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं। मंत्रोच्चार के बीच होने वाले इन धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान नर्मदा तट का वातावरण आध्यात्मिक हो उठता है। श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मशांति के साथ-साथ परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना भी करते हैं।

नर्मदा तट से जुड़ी आस्था
ओंकारेश्वर की पहचान केवल भगवान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के कारण ही नहीं, बल्कि मां नर्मदा की पवित्र धारा के कारण भी देशभर में है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए नर्मदा स्नान, पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है।
गया शीला तीर्थ का धार्मिक महत्व भी नर्मदा तट से जुड़कर और अधिक व्यापक हो जाता है। पितरों के निमित्त तर्पण करने वाले श्रद्धालु नर्मदा के पावन तट को साक्षी मानकर धार्मिक कर्म करते हैं। उनके लिए यह केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर होता है। 
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दूर-दराज से पहुंच रहे श्रद्धालु
श्राद्ध पक्ष के दौरान ओंकारेश्वर आने वाले श्रद्धालुओं में गया शिला तीर्थ पहुंचने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। आसपास के गांवों और कस्बों के अलावा दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु भी यहां अपने पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान कराने पहुंच रहे हैं। कई परिवार ऐसे भी हैं जो अपने पूर्वजों की स्मृति में विशेष धार्मिक कर्म कराने के लिए पहले से यहां पहुंचते हैं। कुछ लोग परिवार के बुजुर्गों के साथ आते हैं, ताकि नई पीढ़ी भी पितृ परंपरा और धार्मिक संस्कारों से परिचित हो सकें।
 
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