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मिलिए खंडवा के नए सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल से: केले की खेती करने वाला पहुंचा संसद तक... कॉलेज की चौखट से दिल्ली तक का सफर

Tue, 02 Nov 2021 04:56 PM IST
रवींद्र भजनी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

खंडवा के नए सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने 1987 में अभाविप से शुरू की छात्र राजनीति। जिला पंचायत के अध्यक्ष रहे। अब तक चुनाव प्रबंधन ही देखते थे। पार्टी ने उन पर भरोसा दिखाया और खंडवा लोकसभा सीट के उपचुनावों में उम्मीदवार बनाया। 
 
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खंडवा के नए सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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बुरहानपुर का छोटा सा गांव है बोहोड़ा, जहां से निकले कार्यकर्ता ने दिल्ली में दस्तक दी। नाम है ज्ञानेश्वर पाटिल, जो अब मप्र की खंडवा संसदीय सीट से सांसद हैं। कुछ माह पहले तक यह नाम राजनीति में नया था लेकिन अब सबकी जुबां पर है। भाजपा में एक नए संदेश और नई परंपरा के साथ इस नाम की आमद हुई है। आइये जानते हैं आखिर कौन है ज्ञानेश्वर पाटिल। कैसे चुनाव प्रबंधन संभालने वाला कार्यकर्ता चुनाव लड़ा और सांसद बनने का सफर तय किया। पाटिल के सहारे भाजपा ने क्या संदेश दिया और राजनीति क्या करवट लेगी?
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दरअसल, ज्ञानेश्वर पाटिल बुरहानपुर क्षेत्र के बोहोड़ा गांव के निवासी हैं। राजनीति से जुड़े जरूर रहे लेकिन बड़े चुनाव की आस नहीं रखी। इनके पिता का नाम है नत्थूजी पाटिल। बीकॉम से स्नातक हैं। 27 जनवरी 1969 को जन्मे ज्ञानेश्वर केले के सप्लायर व ट्रांसपोर्टर हैं। कृषि ही उनका मुख्य पेशा है। जब छात्र जीवन में थे तो राजनति की ओर झुकाव हुआ। 1987 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए। कॉलेजों में अभाविप के बैनर तले आंदोलन किए और धीरे धीरे अभाविप से निकलकर भारतीय जनता युवा मोर्चा में आ गए।

1995 से 1998 तक भाजयुमो खंडवा के जिला महामंत्री रहे। 1998 से 2001 तक भाजयुमो प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य रहे। 2001 में भाजपा पंचायत राज प्रकोष्ठ प्रदेश महामंत्री के पद पर रहे। इतना कुछ होने के बाद भी बड़ा पद ज्ञानेश्वर पाटिल को नहीं मिल सका था। संगठन के आसपास ही उनकी राजनीति चल रही थी। मन में ख्वाब तो कई थे लेकिन संगठन के अनुशासन से बंधे होने के कारण ख्वाब मन में ही रहे और मर्यादित ढंग से अपनी बात रखते गए।
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इसी बीच, 2000 से 2005 तक जिला पंचायत अध्यक्ष पूर्व निमाड़ खंडवा रहे। बाद में बुरहानपुर जिला बना और जिला पंचायत की सीट आरक्षित हुई तो ज्ञानेश्वर की पत्नी जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं। इस लिहाज से दो बार पाटिल जिला पंचायत अध्यक्ष जैसे अहम पद पर काबिज हुए। 2012 से 2014 तक प्रदेश भाजपा किसान मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष रहे। 

नंदू भैया के इर्दगिर्द ही रही पाटिल की राजनीति
ज्ञानेश्वर पाटिल की राजनीति दिवंगत सांसद नंदकुमार सिंह चौहान के इर्दगिर्द ही रही और चौहान का चुनावी प्रबंधन ज्ञानेश्वर पाटिल ही देखते थे। कई बार उन्हें चुनाव संचालक की जिम्मेदारी दी गई और नंदू भैया के खास समर्थकों में पाटिल का नाम लिया जाने लगा। 1998  व २००४ के लोकसभा चुनाव संचालन की जिम्मेदारी पाटिल ने संभाली। 2014 में लोकसभा चुनाव प्रबंधन समिति में सक्रिय भूमिका में रहे। 1998 में शाहपुर विधानसभा चुनाव सह संचालक रहे। 2019 में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के आकोला जिले में पांच विधानसभा के चुनाव प्रभारी रहे। 

पार्टी में बढ़ेगा कद मगर चुनौती भी
खंडवा से चुनाव जीतने के बाद ज्ञानेश्वर पाटिल का भाजपा में कद बढ़ना तय है। अब तक खंडवा संसदीय सीट तक सीमित रहने वाले पाटिल दिल्ली तक पहुंचे हैं। लिहाजा, अब प्रदेश व केंद्रीय नेतृत्व तक उनकी पहुंच होगी। नंदकुमार सिंह चौहान के बाद खंडवा सीट से भाजपा के पास कोई ऐसा नाम भी नहीं था, जिससे पार्टी नया संदेश भी दे सके और सीट भी बचा ले लेकिन पाटिल के रूप में नया चेहरा पार्टी को मिला है। हालांकि, पाटिल के सामने चुनौती रहेगी कि कैसे खुद का मुकाम स्थापित किया जाए क्योंकि उपचुनाव में सरकार की साख का सवाल रहता है। ऐसे में 2021 का उपचुनाव जीतकर पाटिल दिल्ली तो पहुंच गए लेकिन 2024 का निर्णय हाईकमान के हाथ में रहेगा और इसका निर्धारण पाटिल की छवि और कार्यशैली से होगा।
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