मेधा पाटकर ने कहा, 'सीएम शिवराज सिंह चौहान बक्सवाहा के 2.5 लाख पेड़ों की जगह 10 लाख पेड़ लगाने की बात कर रहे हैं। मैं उनसे कहना चाहती हूं कि वे पहले नर्मदा घाटी में आएं और बताएं कि 664 करोड़ के पेड़ कहां गए? नर्मदा में जितने पेड़ बर्बाद हुए उससे तीन गुना पेड़ लगाने की बात हुई थी, आज वे पेड़ कहां हैं? वहीं, राज्य सरकार ने किसानों को 20 हजार हेक्टेयेर जमीन देने की घोषणा की थी, वह आज तक पूरी क्यों नहीं हुई? आज कोई 100 पेड़ लगाता है तो उसमें से 10 तो जीवित नहीं रहते फिर 10 लाख पेड़ कैसे जीवित रहेंगे?
शिवराज के रोज एक पौधा लगाने के संकल्प पर यह कहा
सीएम शिवराज सिंह चौहान के हर दिन एक पेड़ लगाने के संकल्प पर मेधा पाटकर ने कहा कि आज शिवराज भले ही रोज एक पौधा लगा रहे हो लेकिन आज के नेताओं की जो उपभोगवादी जीवन प्रणाली है वो एक दिन में दस से ज्यादा पेड़ खा जाती है।
बकस्वाहा के जंगल में कई तरह के पेड़ है। यहां सागौन, बबूल, केम, पीपल, तेंदू, जामुन, बहेड़ा और अर्जुन समेत कई दुर्लभ प्रजाति के पेड़ मौजूद हैं। ये पेड़ और इनसे मिलने वाली लकड़ियां यहां के लोगों की आजीविका है। 2017 में जियोलॉजी एंड माइनिंग मध्य प्रदेश और रियो टिंटो कंपनी की रिर्पोट में बताया गया था कि यहां पर बहुतायत में वन्य जीवों का निवास है। इसमें मोर, हिरण, नीलगाय, बंदर, खरगोश, रिजवा, जंगली सुअर, लोमड़ी, भालू, चिंकारा, वन बिल्ली आदि पाए जाते है।
बताया जाता है कि बकस्वाहा जंगल के अलावा पन्ना में भी हीरे के भंडार मौजूद हैं। यहां करीब 22 लाख कैरेट हीरे हैं। जबकि बकस्वाहा के जंगल में इससे कहीं ज्यादा 3 करोड़ 42 लाख कैरेट हीरे का भंडार मौजूद है। इसकी अनुमानित कीमत करीब 60 हजार करोड़ रुपये है।
लाखों वन्य जीवों पर पड़ेगा असर
इससे इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास पर भी असर पड़ेगा। कंपनी को इन पेड़ों को काटने की भी अनुमति के बाद ही पर्यावरणविदो ने एनजीटी का दरवाजा खटखटाया था। माना जा रहा है कि अगर यह प्रोजेक्ट सफल रहा तो यह एशिया की सबसे बड़ी हीरा खदान बन सकती है। हालांकि इस परियोजना से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को लेकर चिंताएं पूरे देश में पर्यावरणविदों द्वारा उठाई जा रही हैं।
विकास के नाम पर पर्यावरण हो रहा बर्बाद
बक्सवाहा जंगल बचाओ अभियान के सदस्यों ने अमर उजाला से कहा, इस प्रोजेक्ट से करीब 17 गांव प्रभावित होंगे। बुंदेलखंड की पथरीली माटी में से एक-एक कंकड़ बीनकर हमारे पूर्वजों ने इसे खेती लायक बनाया। ऐसे में दो लाख पेड़ों की कटाई ठीक नहीं है। बात सिर्फ दो लाख पेड़ों की नहीं है उन जंगलो में रहने वाले हजारों पशु-पक्षियों की भी है। इसके अलावा बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे के लिए दो लाख पेड़ और केन-बेतवा लिंक परियोजना से 23 लाख पेड़ प्रभावित होंगे। यदि बुंदेलखंड में पर्यावरण का इसी तरह दोहन होता रहा तो हमारी आने वाली नस्लें बर्बाद हो जाएंगी।
गुरुवार को राष्ट्रीय हरित अधिकरण भोपाल ने छतरपुर जिले के बक्सवाहा में संरक्षित वन क्षेत्र में 2.15 लाख से ज्यादा पेड़ों को काटने के संबंध में लगी दो याचिकाओं सुनवाई की। इन याचिकाओं पर एनजीटी ने निर्देश दिया कि वन विभाग की अनुमति के बगैर एक भी पेड़ न काटा जाए। अधिकरण ने वन संरक्षण कानून 1980 का पालन कराने, टीएन गोधावर्मन कमेटी की गाइडलाइन का अनुसरण करने और भारतीय वन अधिनियम 1927 के नियमों के तहत कार्रवाई करने के लिए भी कहा है। इस मामले पर सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा गया है। अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी।