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बैगा बच्चों की बीमारी पर खुलासा: 64 सैंपल में 25 खसरा पॉजिटिव, 12 मरीजों में खसरा-मलेरिया दोनों; कई खामियां भी

सार

बालाघाट में बैगा आदिवासी बच्चों में बीमारी और मौतों के बाद एनजेओआरटी की रिपोर्ट ने स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर कमियां उजागर की हैं। रिपोर्ट में 196 मामलों में 156 बच्चे 10 साल से कम उम्र के मिले। जांच में खसरा, मलेरिया, दोनों संक्रमण और गंभीर कुपोषण के मामले सामने आए।
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बालाघाट की रिपोर्ट ने उठाए बड़े सवाल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बैगा आदिवासी बच्चों की मौत और बुखार-रैश के मामलों की जांच के लिए केंद्र से पहुंची राष्ट्रीय संयुक्त आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम (एनजेओआरटी) की विस्तृत रिपोर्ट में बालाघाट जिले की बीमारी निगरानी व्यवस्था की कई गंभीर कमियां सामने आई हैं। 18 मई से 17 अगस्त के बीच की जांच के आधार पर तैयार रिपोर्ट में सर्विलांस, प्रयोगशाला, टीकाकरण और पोषण कार्यक्रमों के बीच आंकड़े जुटाने, रिपोर्ट करने और साझा करने में बड़ी खामियां दर्ज की गई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जिला सर्विलांस यूनिट में कर्मचारियों की कमी है।

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जिला एपिडेमियोलॉजिस्ट का महत्वपूर्ण पद खाली है, जिले में जिला पब्लिक हेल्थ लैबोरेटरी नहीं है और माइक्रोबायोलॉजिस्ट का पद भी रिक्त है। सबसे अधिक प्रभावित गांव में एक साल से ज्यादा समय से आशा कार्यकर्ता नहीं होने की बात भी सामने आई है। टीम के अनुसार, इन कमियों का असर सक्रिय रूप से मरीजों की पहचान करने, समुदाय को बीमारी के प्रति जागरूक करने और मरीजों के फॉलोअप पर पड़ रहा है। अब मध्यप्रदेश रुरल हेल्थ मिशन की डायरेक्टर ने एनजेओआरटी का अंतिम जांच प्रतिवेदन आवश्यक कार्रवाई के लिए कलेक्टर को भेजा है।

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196 मामलों में 156 बच्चे 10 साल से कम उम्र के
एनजेओआरटी की जांच में दर्ज 196 मामलों में 156 मरीज 10 साल से कम उम्र के थे। यानी करीब 80 प्रतिशत मामले इसी आयु वर्ग के रहे। इनमें 108 बच्चे 0 से 5 वर्ष और 48 बच्चे 6 से 10 वर्ष की उम्र के थे। उम्र के हिसाब से एक वर्ष से कम उम्र के 12 बच्चे और 1 से 5 वर्ष के 96 बच्चे प्रभावित हुए। मामलों में 101 लड़कियां और 95 लड़के शामिल थे। इनमें 25 वर्ष से अधिक उम्र की 11 युवतियां भी थीं। मरीजों में 173 को सर्दी-बुखार, 52 को मलेरिया और 51 में शरीर पर दाने दर्ज किए गए। दो मरीजों में मुंह में घाव भी मिले। ये मामले जिले के 31 गांवों से सामने आए। सबसे ज्यादा मामले कुंडेकासा में 32, बोंदारी में 27, कोरका में 22, गथिया में 18 और घुम्मर में 15 दर्ज किए गए।

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64 सैंपल में 25 खसरा पॉजिटिव, सात में मिला डी-8 जीनोटाइप
रिपोर्ट के अनुसार 64 नमूनों की जांच में 25 खसरा पॉजिटिव मिले। एनसीडीसी की ओर से जांचे गए 10 गले के नमूनों में सात में खसरे की पुष्टि हुई और इन सभी सात नमूनों का जीनोटाइप डी-8 मिला। वहीं, 32 मरीजों की मलेरिया जांच में 27 पॉजिटिव पाए गए। सबसे अहम बात यह रही कि 12 मरीजों में खसरा और मलेरिया दोनों संक्रमण एक साथ मिले। इसके अलावा दो डेंगू, एक चिकनगुनिया और दो एंटरोवायरस पॉजिटिव नमूने भी मिले। वहीं इन्फ्लुएंजा, कोविड-19, जापानी इंसेफेलाइटिस, चांदीपुरा और वेस्ट नाइल वायरस की जांच निगेटिव रही। इससे प्रभावित बच्चों में केवल एक ही संक्रमण का पैटर्न नहीं होने की बात सामने आई।

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तीन बच्चों की मौत की समीक्षा में गंभीर कुपोषण भी सामने आया
एनजेओआरटी ने तीन बच्चों की मौत की विस्तृत समीक्षा की। तीनों की उम्र पांच वर्ष से कम थी। इनमें एक बच्चे की मलेरिया जांच पॉजिटिव थी और उसकी मौत घर पर हुई। दूसरे बच्चे की अस्पताल पहुंचने से पहले मौत हो गई, जबकि तीसरे बच्चे की अस्पताल में मौत हुई। मृत बच्चों में से एक की बांह की ऊपरी परिधि यानी एमयूएसी सिर्फ 9.3 सेंटीमीटर थी। उसका वजन-लंबाई अनुपात भी -3 एसडी से कम था। रिपोर्ट में इसे गंभीर कुपोषण के संकेत के तौर पर दर्ज किया गया। यानी मौत के मामलों की पड़ताल में संक्रमण के साथ बच्चों की पोषण स्थिति भी महत्वपूर्ण कारक के रूप में सामने आई।

बिरसा में 604 बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण की श्रेणी में
रिपोर्ट में बिरसा की पोषण स्थिति के आंकड़े भी सामने आए हैं। 357 आंगनवाड़ी केंद्रों में 2,589 बच्चे एसएएम और एमएएम श्रेणी में दर्ज थे। इनमें 604 बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण यानी सीवियर एक्यूट मालन्यूट्रिशन (एसएएम) की श्रेणी में थे। कुछ क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर मिली। सोंगुड्डा सेक्टर में एसएएम का स्तर 34.9 प्रतिशत, डाबरी में 30.5 प्रतिशत और कचनारी-02 में 26.2 प्रतिशत दर्ज किया गया। मैदानी आकलन में करीब 20 से 25 प्रतिशत देखे गए घरों में बच्चों में अत्यधिक दुबलापन या गंभीर कुपोषण की स्थिति भी देखी गई।

2,882 लोगों की स्क्रीनिंग में भी मिले सैकड़ों संदिग्ध मामले
प्रभावित क्षेत्र में सामुदायिक स्तर पर 2,882 लोगों की स्क्रीनिंग की गई। इनमें 102 लोगों में बुखार के साथ दाने, 769 में बुखार या खांसी-जुकाम, 241 में मलेरिया, 120 में दस्त और 160 लोगों में त्वचा संबंधी समस्या दर्ज हुई। कुंडेकासा में बनाए गए अस्थायी उपचार केंद्र में रोजाना करीब 70 मरीज तक पहुंचे। एनजेओआरटी ने प्रभावित क्षेत्रों में बुखार और दाने के मामलों की दैनिक निगरानी, घर-घर सक्रिय केस खोज, मलेरिया की तत्काल जांच और इलाज तथा गंभीर कुपोषित बच्चों की पहचान जारी रखने की सिफारिश की है।

टीकाकरण के आंकड़ों में भी सामने आया बड़ा अंतर
रिपोर्ट में अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच का एमआर टीकाकरण कवरेज भी दर्ज है। इस दौरान बैहर में एमआर-1 कवरेज 51 प्रतिशत और एमआर-2 49 प्रतिशत रहा। बिरसा में यह क्रमश: 64.8 और 65 प्रतिशत था। अप्रैल से जुलाई 2026 के आंकड़ों में सुधार दिखाई दिया। बिरसा में एमआर-1 कवरेज 70.4 प्रतिशत और पूर्ण टीकाकरण 70.2 प्रतिशत रहा। बैहर में एमआर-1 कवरेज 87.1 प्रतिशत और पूर्ण टीकाकरण 79.3 प्रतिशत दर्ज हुआ। एनजेओआरटी ने छूटे बच्चों की पहचान कर एमआर टीकाकरण पूरा कराने और विटामिन-ए की खुराक सुनिश्चित करने की सिफारिश की है।

न साझा डेटाबेस, न जिला पब्लिक हेल्थ लैब
रिपोर्ट में जिले की बीमारी निगरानी व्यवस्था की कमियां भी दर्ज की गई हैं। जिला सर्विलांस यूनिट सीमित स्टाफ के साथ काम कर रही है और डेटा मैनेजर पर काफी निर्भर है। जिला एपिडेमियोलॉजिस्ट का पद खाली है। जिला पब्लिक हेल्थ लैब नहीं है और माइक्रोबायोलॉजिस्ट का पद भी रिक्त है। जिला सर्विलांस अधिकारी की जिम्मेदारी भी स्पष्ट रूप से व्यवस्थित नहीं मिली। रिपोर्ट के अनुसार सर्विलांस, लैब, टीकाकरण, मलेरिया, पोषण और मृत्यु से जुड़े आंकड़ों के लिए जिले में कोई साझा डेटाबेस नहीं था।
अलग-अलग प्रयोगशालाओं से आई रिपोर्टों को मरीज और सैंपल आईडी के आधार पर मिलान करने में भी परेशानी हुई। टीम ने माना कि मानव संसाधन की ये कमियां सामान्य बीमारी निगरानी के साथ-साथ आउटब्रेक की स्थिति में तत्काल प्रतिक्रिया की क्षमता को भी प्रभावित कर रही हैं।

सबसे प्रभावित गांव में एक साल से नहीं है आशा कार्यकर्ता
रिपोर्ट में सबसे अधिक प्रभावित गांवों में से एक में एक साल से ज्यादा समय से आशा कार्यकर्ता नहीं होने की बात भी दर्ज है। एनजेओआरटी ने इसे सक्रिय केस खोज, समुदाय को जागरूक करने और मरीजों के फॉलोअप के लिहाज से महत्वपूर्ण कमी बताया है। बिरसा ब्लॉक में भी कई स्वीकृत पदों पर अतिरिक्त प्रभार के जरिए काम चलने की बात सामने आई है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष संकेत देता है कि बालाघाट में सामने आए मामलों को केवल किसी एक बीमारी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। खसरा और मलेरिया के सह-संक्रमण के साथ कुपोषण, एनीमिया, श्वसन संबंधी लक्षण और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी सामने आईं। ऐसे में एनजेओआरटी ने बीमारी की निगरानी, टीकाकरण, पोषण, प्रयोगशाला जांच और डेटा प्रबंधन को एक साथ मजबूत करने पर जोर दिया है। केंद्र की जांच से भी मौतों के पीछे एकल संक्रमण के बजाय कई चिकित्सकीय कारकों की मौजूदगी की बात सामने आई है।

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पूर्व विधायक ने वित्तीय और सामाजिक ऑडिट की मांग की

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पूर्व विधायक और कांग्रेस नेता पारस सकलेचा ने बालाघाट में बैगा समुदाय के 41 बच्चों की कुपोषण से मौत को शासन-प्रशासन की लापरवाही और भ्रष्टाचार का परिणाम बताया। उन्होंने बैगा परिवारों की संख्या घटने और कुपोषण के बावजूद 2018-19 से 2025-26 तक 3,410 करोड़ रुपये के बजट प्रावधान पर सवाल उठाए। सकलेचा ने आरोप लगाया कि आहार अनुदान को महिला की व्यक्तिगत आय मानकर करीब पांच लाख बैगा महिलाओं को लाड़ली बहना योजना से अपात्र किया गया, जबकि दोनों योजनाओं के उद्देश्य अलग हैं। उन्होंने बैगा बच्चों की मौत की उच्चस्तरीय जांच और बजट उपयोग का वित्तीय व सामाजिक ऑडिट कराने की मांग की।

कलेक्टर बोले- मुझे अभी जानकारी नहीं
मामले में प्रशासनिक स्तर पर भी सवाल उठ रहे हैं। 16 सितंबर को मध्यप्रदेश नेशनल हेल्थ मिशन की डायरेक्टर की ओर से कमियां दूर करने के लिए राष्ट्रीय टीम की जांच रिपोर्ट कलेक्टर को भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, बालाघाट कलेक्टर कुमार सत्यम ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि उन्हें अभी इस संबंध में जानकारी नहीं है और वह रिपोर्ट देखने के बाद ही बता पाएंगे। बालाघाट में बैगा बच्चों की बीमारी और मौतों को लेकर सामने आई एनजेओआरटी रिपोर्ट में संक्रमण, कुपोषण, टीकाकरण, स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता, प्रयोगशाला जांच और डेटा प्रबंधन से जुड़ी कई परतें सामने आई हैं। ऐसे में बीमारी की निगरानी और दूरदराज के गांवों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच मजबूत करना जांच रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशों में शामिल है।

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