भोपाल एम्स में 14.27 रुपये की ट्यूब 943.49 रुपये में खरीदी गई। इसी तरह 125 से अधिक दवाओं और 200 से ज्यादा सर्जिकल आइटम की दरें 500 से 6500 प्रतिशत तक अधिक पाई गईं। यह खुलासा भोपाल एम्स की समिति की रिपोर्ट में हुआ हैं। हद तो यह है कि संस्थान की खरीदी का बजट 145 करोड़ से बढ़कर 245 करोड़ रुपये पहुंच गया, लेकिन एक साल से ज्यादा समय बाद भी अधिक दरों पर सप्लाई दवा और सर्जिकल आइटम को लेकर ना तो कोई कार्रवाई हुई और ना ही अधिक भुगतान की वसूली की गई। हद तो यह है कि खरीदी अधिक दरों पर लगातार जारी हैं। सवाल यह है कि मरीजों के पैसे और सरकारी बजट पर बोझ डालने वाली इन दरों पर कार्रवाई कब होगी? एम्स प्रबंधन अब टेंडर करने और अमृत से खरीद सीमित करने की बात कह रहा है, जबकि मंत्रालय के अधिकारी कार्रवाई पर मौन साधे हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट निजी अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल सामग्री की कीमतों तथा मरीजों को अस्पताल से ही दवाएं खरीदने के लिए बाध्य किए जाने से जुड़े सवालों पर सुनवाई कर चुका है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से भी विचार करने को कहा गया है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन आने वाले एम्स भोपाल की आंतरिक रिपोर्ट में ही अमृत फार्मेसी से सरकारी सप्लाई की दरों और संस्थान के अन्य अनुबंधित रेट के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। तुलनात्मक रिपोर्ट में 200 सेंटीमीटर हाई प्रेशर एक्सटेंशन ट्यूब का उदाहरण सबसे बड़ा अंतर दिखाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इसकी एक अन्य अनुबंधित दर 14.27 रुपये थी, जबकि अमृत फार्मेसी की सप्लाई दर 943.49 रुपये दर्ज की गई। दोनों दरों में 929.22 रुपये का अंतर है। इस आधार पर अमृत की सप्लाई दर तुलनात्मक दर से करीब 66 गुना और लगभग 6512 प्रतिशत अधिक थी। रिपोर्ट में टेरलिप्रेसिन इंजेक्शन, जेंटामाइसिन इंजेक्शन, एसाइक्लोविर, आयरन सुक्रोज और सर्जरी में इस्तेमाल होने वाली मेडिकल सामग्री सहित कई अन्य आइटम की दरों में भी बड़ा अंतर सामने आया।
शिकायतों के बाद गठित हुई थी समिति
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दवाओं और मेडिकल सामग्री की कीमतों को लेकर शिकायतें सामने आने के बाद एम्स भोपाल के तत्कालीन निदेशक प्रो. डॉ. अजय सिंह के निर्देश पर तुलनात्मक जांच की प्रक्रिया शुरू हुई। 15 अप्रैल 2025 को समिति गठित की गई और 31 मई 2025 की रिपोर्ट में अमृत की सप्लाई दरों की तुलना एम्स के अन्य सप्लायरों के रेट कॉन्ट्रैक्ट से की गई। रिपोर्ट में कई आइटम की दरों में बड़ा अंतर सामने आने के बाद सवाल उठा कि क्या अधिक दरों पर हुई खरीद की वित्तीय समीक्षा की गई और क्या संबंधित सप्लायर या अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई। रिपोर्ट केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों को भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई, लेकिन इस संबंध में कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
145 करोड़ से बजट 245 करोड़ पहुंचा
भोपाल एम्स की की स्थायी वित्त समिति (एसएफसी) की बैठक में खरीदी के बजट के अचानक बढ़ने को नोटिस किया गया, लेकिन उसके कारणों पर कोई जांच नहीं की। जनवरी 2026 को आयोजित स्थायी वित्त समिति की बैठक में नोटिस किया गया कि भोपाल एम्स का खरीदी का बजट वर्ष 2022-23 में 145 करोड़ रुपए था, जो 2024-25 में अचानक बढ़कर 245 करोड़ रुपए पहुंच गया है। समिति ने भोपाल एम्स के अधिकारियों को खर्चे को कम करने की सलाह दी। वहीं, रिपोर्ट में भी चिंता जताई गई की अधिक दरों पर दवाओं और मेडिकल सामग्री की खरीद से आयुष्मान भारत योजना के निर्धारित पैकेज पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। बीपीएल मरीजों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराने के लिए निर्धारित बजट पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई थी।
अब रेट कॉन्ट्रैक्ट कर रहे, अमृत से खरीद सीमित: एमएस
एम्स भोपाल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विकास गुप्ता ने कहा कि उनके पद संभालने के बाद केंद्र सरकार की ओर से इस संबंध में कोई पत्र नहीं मिला है। इसके बावजूद अमृत फार्मेसी को एल-1 दरों पर दवा और मेडिकल सामग्री की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है। उन्होंने बताया कि एम्स अपने रेट कॉन्ट्रैक्ट भी कर रहा है और अमृत से केवल आपात स्थिति में ही सामग्री लेने की व्यवस्था रखी जाएगी।
पूर्व एमएस ने वर्तमान अधिकारी से बात करने को कहा
इस मामले में तत्कालीन मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. शशांक पोरवाल से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि अब वह इस पद पर नहीं हैं और इस संबंध में वर्तमान मेडिकल सुपरिंटेंडेंट से बात की जाए। वहीं, इस मामले में अमृत फार्मेसी के एमपी इंचार्ज नरेंद्र धाकड़ ने कहा कि उनको रिपोर्ट के बारे में जानकारी नहीं है। वह रिपोर्ट देखने के बाद ही कुछ कह पाएंगे।
मंत्रालय से नहीं मिला जवाब
मामले में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव विजय नेहरा को आधिकारिक ई-मेल के माध्यम से सवाल भेजकर रिपोर्ट पर हुई कार्रवाई और जिम्मेदारी तय करने की स्थिति पूछी गई। खबर लिखे जाने तक उनकी ओर से जवाब नहीं मिला। जवाब मिलने पर उसे भी शामिल किया जाएगा।