आलमबाग निवासी व्यापारी देवा (बदला नाम) करीब 10 साल पहले एचआईवी पॉजिटिव हो गए। पत्नी की जांच कराई तो वह भी पॉजीटिव मिलीं। वह बताते हैं, मुझे लगा कि जिंदगी तबाह हो गई। इसी बीच एक नर्सिंग कर्मचारी से मुलाकात हुई। वह केजीएमयू ले आया। यहां डॉक्टर ने हम दोनों की जांच की।
कुछ दवाएं दीं। हर माह केजीएमयू के एआरटी सेंटर पर आता हूं। इस दौरान पत्नी गर्भवती हुई। प्रसव के बाद बच्चे की जांच हुई तो वह निगेटिव है। बच्चे के निगेटिव होने से पूरा परिवार खुश है। हम अपना कारोबार कर रहे हैं। हम दोनों नियमित दवाइयां लेते हैं।
क्योंकि हमें पता है कि दवा छोड़ने का मतलब जिंदगी खत्म होना है। इतना जरूर है कि किसी भी व्यक्ति के एचआईवी पॉजिटिव होने पर उसे डॉक्टर के पास ले जाते हैं और उन्हें सलाह देते हैं कि दवाएं नहीं छोड़ना। क्योंकि दवा खाने में लापरवाही होने पर दवा बेअसर हो जाएगी।
उन्नाव निवासी सूरज कुमार (बदला नाम) बताते हैं कि कुछ समय के लिए गुजरात गया था। वहां एक महिला से संबंध हो गए। करीब सालभर बाद मुझे पथरी हो गई। ऑपरेशन से पहले जांच हुई। इस दौरान उसके एचआईवी पॉजिटिव होने की जानकारी मिली। हालांकि डॉक्टर ने पथरी निकाल दी। यह घटना 2005 की है।
हमने खुद के पॉजिटिव होने की बात छिपाई नहीं बल्कि परिवार के लोगों को बता दी। पूरा परिवार तनाव में था। कुछ रिश्तेदारों को पता चला कि वे घर से बाहर रहने की सलाह देने लगे। इस बीच प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक और उसका बड़ा भाई उसे लेकर केजीएमयू आए।
यहां डॉक्टर ने बताया कि नियमित दवाएं खाते रहें तो मौत नजदीक नहीं आएगी। मैंने केजीएमयू में आने वाली एक एचआईवी पॉजिटिव महिला से शादी भी कर ली है। अब हम दोनों अपना जनरल स्टोर की दुकान चला रहे हैं।
मुफ्त है एचआईवी का इलाज
एआरटी सेंटर पर सभी जांचें, दवाएं मुफ्त दी जाती है। हर मरीज की काउंसलिंग भी की जाती है। यहां करीब 400 से ज्यादा ऐसे मरीज हैं, जो करीब 10 साल से नियमित जुड़े हुए हैं।
केजीएमयू में अब वायरल लोड जांच शुरू हो गई है। सालभर से यह जांच की जा रही है। इससे एचआईवी पॉजिटिव मरीजों की स्थिति के बारे में जानकारी मिलती रहती है। इससे मरीज पर दवा काम कर रही है या नहीं, इसकी भी जानकारी मिल जाती है। फिर मरीजों की स्थिति के अनुसार उनकी दवाएं घटाई या बढ़ाई जाती हैं।
आमतौर पर मरीजों को मल्टी ड्रग थेरेपी दी जाती है। इसमें तीन दवाएं होती हैं। ये दवाएं भी मुफ्त मिलती हैं। एचआईवी पॉजिटिव मरीजों में प्रतिरक्षण प्रणाली मजबूत रखने की जरूरत होती है। इसके लिए नियमित रूप से दवाओं के साथ ही खानपान पर ध्यान रखना पड़ता है।
केजीएमयू के डॉ. डी हिमांशु ने बताया कि ह्यूमन इम्यूनोडेफिसिएंसी वायरस (एचआईवी) मुख्य रूप से प्रतिरक्षा प्रणाली को निशाना बनाता है। इससे डब्ल्यूबीसी की सीडी फोर प्लस कोशिकाएं प्रभावित होती हैं, जो खून के प्रति घन मिलीमीटर हिस्से में मौजूद रहती हैं। जैसे-जैसे वायरस आगे बढ़ता है ये संख्या गिरती जाती है।
आमतौर पर स्वस्थ व्यक्ति की प्रतिरोध प्रणाली में खून के प्रति घन मिलीमीटर में 600 से 1200 कोशिकाएं होती है। ये लगातार घटने लगे और करीब दो सौ के आसपास पहुंच जाती है तो माना जाता है कि संबंधित एड्स से ग्रसित हो गया है।
डॉ. डी हिमांशु बताते हैं एचआईवी और एड्स को लेकर लोगों में भ्रम रहता है। जब कोई व्यक्ति संक्रमण का शिकार होता है तो वह एचआईवी पॉजिटिव होता है। एचआईवी वायरस का इलाज नहीं किए जाने पर शरीर में इंफेक्शन बढ़ने लगते हैं और वह एक्वायर्ड इम्यूनो डिफिशिएंसी सिंड्रोम (एड्स) हो जाता है।
चूंकि एचआईवी पॉजिटिव की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। इसलिए उसे नियमित दवाएं और खानपान का ध्यान रखना पड़ता है। यदि पीड़ित अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बचा ले जाता है तो वह एड्स रोगी होने से बच जाता है।
एचआईवी मरीजों में इन बीमारियों का खतरा
एचआईवी पॉजिटिव मरीजों में टीबी का खतरा 30 गुना अधिक होता है। इसी तरह एचआईवी से ग्रस्त लोगों में प्रतिरक्षा प्रणाली का कैंसर का भी खतरा रहता है। इससे रीढ़ से लेकर दिमाग तक प्रभावित होता है। सीडी फोर प्लस कोशिकाओं की संख्या दो सौ से कम होने पर न्यूमोसिस्टिस न्यूमोनिया संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
एक स्थान पर खड़े होकर सांस लेने, गले मिलने, हाथ मिलाने, एक बर्तन में खाना खाने, एक ही नल से नहाने, तौलिया या पकड़े शेयर करने, टॉयलेट प्रयोग करने आदि से एचआईवी नहीं फैलता है।
इससे तेजी से फैलता है एचआईवी
केजीएमयू के परामर्शदाता डॉ. सौरभ पालीवाल बताते हैं कि किसी एचआईवी पॉजिटिव पुरुष या महिला के साथ संबंध बनाने से एचआईवी का संक्रमण तेजी से फैलता है।
एचआईवी पॉजिटिव का खून कि सी दूसरे में चढ़ाने, स्तनपान करने, संक्रमित व्यक्ति की इस्तेमाल की गई सुई के इस्तेमाल करने, शरीर में किसी कटी हुई जगह पर संक्रमित द्रव्य के छूने, एचआईवी संक्रमित महिला की संतान गर्भ और जन्म के समय (असुरक्षित प्रसव) या फिर स्तनपान के जरिये उस रोग का शिकार होने से हो सकता है।