आज कहानी उन सूरमाओं की जो दर्शक दीर्घा में बैठा दिए गए। कहानी उन योद्धाओं की जो मैदान को इस उम्मीद में तैयार करते रहे कि एक दिन तो इसी में ताल ठोकना है। कुछ तो मैदान के सारे कंकड़-रोड़े दूर करने में जी-जान से जुटे रहे कि अपने लाडले को उतारना है।
सोचे थे कि बेटे-बेटी का भविष्य संवर जाएगा। पर, जब ताल ठोकने की बारी आई तो कोई और टिकट मार ले गया। टिकट से महरूम हुए तो चुनावी शोर से भी दूर हो गए। खुद को कोस रहे हैं कि कैसे हवा का रुख भांपने में चूक गए। तो कुछ की मौकापरस्ती ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया। अमित मुद्गल की रिपोर्ट...
मेरठ : कुरैशी व अखलाक का कुनबा बाहर
मेरठ की बात करें तो यहां मुकाबला हर बार ही कड़ा रहा है। अरसे बाद ऐसा हो रहा है जब पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी न खुद और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य चुनावी मैदान में है। पिछले चुनाव में याकूब कुरैशी के पुत्र इमरान सरधना विधानसभा सीट से चुनावी रण में उतरे थे, तो मेरठ दक्षिण सीट से याकूब ने खुद ताल ठोकी थी। दोनों बसपा से लड़े थे, दोनों ही चुनाव हार गए थे। इस बार इमरान मेरठ दक्षिण से तैयारी कर रहे थे, पर ऐन मौके पर उनका टिकट कट गया।
मेरठ में उनका राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी परिवार है, हाजी शाहिद अखलाक का। सांसद और मेयर रह चुके शाहिद एवं उनका परिवार भी चुनाव मैदान से दूर है। चुनाव से ऐन पहले उन्होंने बसपा में शामिल होने की बात कही। वे निकले तो थे बसपा पदाधिकारियों से मुलाकात करने, पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात कर आए। बसपा में बात बिगड़ गई और सपा में बनी नहीं। फिलहाल चुनावी रण से यह परिवार भी बाहर है।