विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजने के बाद कई वरिष्ठ नेताओं ने दलबदल का सहारा लिया था। इनमें कई प्रमुख नेताओं ने भाजपा को डूबती नाव बताकर सपा में शामिल हुए थे। इन दलबदलुओं की वजह से सपा शीर्ष नेतृत्व को भी लगा था कि इनकी वोट की ताकत सत्ता की सीढ़ी बनेगी। उसने इनके चक्कर में पार्टी के वफादारों को भी दरकिनार कर दिया, लेकिन बृहस्पतिवार को चुनाव नतीजों ने सपा ही नहीं दलबदलुओं के मंसूबों पर भी पानी फेर दिया। इसी तरह अन्य दलों से भाजपा का दामन थामने वालों में से कुछ ने तो सियासी वैतरणी पार कर ली है, लेकिन कुछ बीच राह में फंस गए हैं। पेश है बदबदलुओं की स्थिति बयां करती रिपोर्ट :
स्वामी प्रसाद : खुद हारे, अपनों को लगाया किनारे
बसपा से भाजपा होते हुए सपा में पहुंचे पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य को हार का सामना करना पड़ा। सियासी रणनीति के तहत स्वामी प्रसाद ने चुनाव से ठीक पहले न सिर्फ पार्टी बदली, बल्कि अपनी परंपरागत सीट पडरौना छोड़कर फाजिलनगर से चुनाव मैदान में उतरे। यहां उन्हें भाजपा के सुरेंद्र कुमार कुशवाहा ने पराजित किया। स्वामी की हार में सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष इलियास अंसारी का बागी होना मुख्य वजह माना जा रहा है। स्वामी के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने वाले कई नेताओं को टिकट तो दिया गया, लेकिन नामांकन के बाद उन्हें मैदान से वापस होना पड़ा। प्रयागराज पश्चिम में अमरनाथ मौर्य, जौनपुर में तेज बहादुर मौर्य, अयोध्या के बीकापुर से बलराम मौर्य और मिर्जापुर के मझंवा से दामोदर मौर्य इनमें मुख्य हैं। इसी तरह बांदा में भी सपा ने पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद को टिकट दिया, लेकिन दूसरे दिन बदल दिया।
धर्म सिंह सैनी : काम न आया सियासी गठजोड़
भाजपा सरकार में आयुष मंत्री रहे धर्म सिंह सैनी भी चुनाव से ठीक पहले सपा में शामिल हुए थे। उन्हें भरोसा था कि सजातीय वोटबैंक के साथ दलितों, मुस्लिमों व अन्य पिछड़ी जातियों का गठजोड़ सियासी ताकत देगा। लेकिन तमाम प्रयास के बाद भी उन्हें भाजपा के मुकेश चौधरी से हार का सामना करना पड़ा। सैनी की हार के पीछे सपा के पुराने नेताओं की बेरुखी मानी जा रही है। क्योंकि वे सब लगातार क्षेत्र में रहकर चुनाव लड़ने का सपना देख रहे थे, लेकिन अचानक सैनी को सपा ने टिकट दे दिया।
दारा सिंह : सीट और दल बदलने का मिला फायदा
पूर्व मंत्री दारा सिंह चौहान भी चुनाव से ठीक पहले सपा में शामिल हुए थे। मधुबन से भाजपा के टिकट पर जीत कर 2017 में मंत्री बनने वाले चौहान ने 2022 में दल के साथ सीट भी बदली थी। इस बार वे मधुबन के बजाय घोसी से मैदान में उतरे थे और वे जीते भी।
भाजपा छोड़ने वालों की नैया डूबी
माधुरी वर्मा : बसपा छोड़कर सपा में आई नानपारा विधायक माधुरी वर्मा हार गईं।
ब्रजेश प्रजापति : बांदा के तिंदवारी से भाजपा विधायक रहे ब्रजेश पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के खास हैं। वे इस बार सपा से तिंदवारी से मैदान में थे, लेकिन भाजपा उम्मीदवार से हार गए।
भगवती प्रसाद सागर : कानपुर के बिल्हौर से भाजपा विधायक रहे भगवती प्रसाद भी स्वामी प्रसाद के साथ सपा में शामिल हुए थे। सपा ने उन्हें घाटमपुर से मैदान में उतारा, पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
रोशनलाल वर्मा : तिलहर से भाजपा विधायक रोशनलाल भी ऐन मौके पर सपा में शामिल होकर चुनाव लड़ा। उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इन्हें दलबदल का मिला फायदा
लालजी वर्मा : बसपा के कद्दावर नेता लालजी वर्मा ने इस बार सपा के टिकट से कटेहरी से चुनाव लड़ा और जीते भी।
रामअचल राजभर : बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामअचल को सपा ने उनकी परंपरागत सीट अकबरपुर से ही मैदान में उतारा और वे जीते।
असलम अली : 2017 में बसपा के धौलाना विधायक रहे। इस बार सपा के टिकट पर मैदान में उतरे और भाजपा से पराजित हुए।
असमल अली राइनी- 2017 में बसपा से विधायक बने राइनी इस बार सपा के टिकट पर श्रावस्ती से मैदान में उतरे और भाजपा से पराजित हुए।
सुषमा पटेल- वर्ष 2017 में बसपा के टिकट पर मुंगराबादशाहपुर से विधायक बनी सुषमा पटेल ने सपा में शामिल होने के बाद सीट बदल दी। वह मड़ियाहू से चुनाव मैदान में उतरींऔर हार गईं।
हरगोविंद भार्गव - सीतापुर के सिधौली विधानसभा सीट से भाजपा विधायक रहे हरगोविंद इस चुनाव में इसी सीट से सपा के टिकट से मैदान में उतरे और भाजपा से पराजित हुए।
हाकिमलाल बिंद- बसपा से हंडिया से विधायक रहे हाकिमलाल बिंद इस बार से सपा से मैदान में आए और विजयी रहे।
विनय शंकर तिवारी - चिल्लूपार से बसपा से विधायक रहे विनयशंकर तिवारी ने सपा में शामिल होकर ब्राह्मणवोटबैंक साथ लाने का दावा किया। वह अपनी परंपरागत सीट चिल्लूपार से ही मैदान में उतरे और हार गए।
अपना दल
चौधरी अमर सिंह- सिद्धांर्थनगर के सोहरतगढ़ से अपना दल विधायक चौधरी अमर सिंह ने भी सपा में शामिल हुए, लेकिन टिकट को लेकर विवाद हुआ तो आजाद समाज पार्टी से मैदान में उतरे और हार गए।
डा. आरके वर्मा - विश्वनाथगंज से अपना दल विधायक डा आरके वर्मा ने सपा में शामिल होने के बाद रानीगंज से मैदान में उतरे और पराजित हुए।
दूसरे दलों से भाजपा में आने वालों की स्थिति
हरिओम यादव- सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव समधी और सपा से सिरसागंज विधायक रहे हरिओम यादव इस चुनाव में भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे और पराजय का सामना करना पड़ा।
नितिन अग्रवाल- हरदोई के सपा विधायक रहे नितिन अग्रवाल विधानसभा उपाध्यक्ष चुनाव के समय भाजपा के पाले में गए। उन्हें उपाध्यक्ष पद मिला। इस चुनाव में भाजपा केटिकट पर मैदान में उतरे और विजयी रहे।
रामवीर उपाध्याय- बसपा के कद्दावर नेता पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय ऐन मौके पर भाजपा में शामिल हुए और सादाबाद से मैदान में उतरे। इन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
मनोज प्रजापति- सपा नेता मनोज प्रजापति टिकट नहीं मिलने पर भाजपा का दामन थाम कर मैदान में उतरे और विजेता रहे।
नरेश सैनी- बेहट से कांग्रेस विधायक रहे नरेश सैनी इस बार भाजपा के टिकट से मैदान में रहे। इन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
राकेश सचान- पूर्व सांसद राकेश सचान चुनाव से पहले सपा छोड़ भाजपा के टिकट पर भोगनीपुर से मैदान में उतरे और विजयी रहे.
अदिति सिंह- रायबरेली से कांग्रेस विधायक अदिति सिंह इस चुनाव में भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरीं और विजयी रहीं।
राकेश सिंह- कांग्रेस के टिकट पर हरचंदपुर से विधायक रहे इस बार भाजपा के टिकट पर मैदान में थे। इन्हेँ भी हार का सामना करना पड़ा।
अनिल सिंह - पुरवां से बसपा के विधायक रहे अनिल सिंह इस बार भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे और विजयी रहे।