संयोग ही है कि ये उपचुनाव तमाम नए और बनते-बिगड़ते समीकरणों के बीच हुए हैं। इसके चलते इनके नतीजे प्रदेश की आगे की सियासत के सरोकारों से जुड़ गए हैं।
कोराना काल के दौरान विपक्षी दलों का सत्तापक्ष पर हमला तथा सरकार का प्रवासी मजदूरों को रोजगार से लेकर लोगों की चिकित्सा के इंतजाम तथा लोगों की सेवा के लिए किए गए कामों के दावे भी नतीजों की कसौटी पर हैं।
कुछ घटनाओं को लेकर विपक्ष की तरफ से ब्राह्मणों की उपेक्षा व उत्पीड़न को लेकर सरकार की घेराबंदी तथा हाथरस जैसी घटनाओं के सहारे विपक्ष, खास तौर से कांग्रेस व भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर की पार्टी का सरकार को कठघरे में खड़ा करना तथा कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर उठाए गए सवालों का जनता में असर भी इन नतीजों से सामने आएगा।
पता चलेगा कि कांग्रेस के सड़कों पर संघर्ष तथा राहुल गांधी व प्रियंका गांधी वाड्रा की यूपी में सक्रियता का जनता में कुछ असर हुआ है या नहीं।
उपचुनाव के पहले प्रदेश में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम हुए। मसलन, राज्यसभा चुनाव में नौ सदस्य निर्वाचित कराने की ताकत होते हुए भी भाजपा का सिर्फ आठ उम्मीदवार उतारना। बसपा का आश्चर्यजनक तरीके से एक उम्मीदवार का पर्चा भरवाना तथा सपा का बसपा विधायकों में तोड़फोड़ कराना।
मायावती का सपा को हराने के लिए पहले भाजपा के समर्थन का एलान और फिर उस पर सफाई प्रदेश में नए सियासी रिश्तों तथा समीकरणों के संकेत दे गया। इसका असर उपचुनाव के मतदान में दिखा भी। इस लिहाज से भी उपचुनाव के नतीजे अहम होंगे।