मैनपुरी जिले की करहल सीट से सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव चुनाव लड़ रहे हैं तो जसवंतनगर से प्रसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव। दोनों का चुनाव चिह्न साइकिल है। अखिलेश का पहला तो शिवपाल का सातवां विधानसभा चुनाव है। शिवपाल को सपा गठबंधन में कम सीटें मिलने की टीस भी उनके समर्थकों में साफ दिखती है। हालांकि, कौन सबसे ज्यादा वोट पाएगा, इस सवाल पर शिवपाल सिंह यादव कहते हैं, मेरी तो इच्छा है कि अखिलेश को जसवंतनगर से ज्यादा वोट मिले। इसलिए मैं खुद वहां चुनाव प्रचार कर रहा हूं।
मुलायम के गढ़ में गूंज रहा बेरोजगारी का सवाल
आगरा एक्सप्रेसवे से मैनपुरी के लिए नीचे उतरने पर पहला कस्बा पड़ता है करहल। करहल बाजार में प्रवेश करने से लेकर जैन कॉलेज तक मकानों पर लगे झंडे और लाल टोपी पहने लोग ये एहसास कराने के लिए काफी हैं कि इसे मुलायम सिंह का गढ़ क्यों कहा जाता है। कस्बे में मुस्लिम के साथ जैन एवं वैश्य आबादी भी है। यही वजह है कि करहल सीट पर सपा का तो कब्जा रहा, पर कस्बे में सपा का ही रंग गाढ़ा हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
कस्बे में इंटर कॉलेज से आगे बढ़ने पर कपड़े की दुकान पर सपा का चुनावी गाना बज रहा था- ‘काम होगा, काम होगा, 22 में काम होगा...।’ गाना सुनकर यहां का मिजाज समझने के लिए हम दुकान में दाखिल हो गए। यह दुकान है रानीपुर गांव के गुड्डू बाथम की। स्नातक तक पढ़े गुड्डू कहते हैं, हमारा परिवार तो भाजपा को वोट देता रहा है। पर, इस बार सपा को देगा। क्यों? इस सवाल पर वह कहते हैं, पढ़ाई के बाद रोजगार चाहिए। अखिलेश का रोजगार पर वादा लोगों को पसंद आ रहा है। यहीं मिले नगला मुकुंद निवासी रघुवीर यादव कहते हैं, मेरे गांव में तो सपा का ही जोर है। क्षेत्र में कैसा मिजाज है, इस सवाल पर समसपुर के गुड्डू कहते हैं, यहां सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी है। यहां से आगे बढ़ते ही बघेल आबादी वाले दोस्तपुर गांव में लोगों के बोल बदल जाते हैं। यहां मिले धीरज कहते हैं, हम तो भाजपा के साथ हैं। हम चाहते हैं कि मोदी-योगी की जोड़ी बनी रहे।
मुलायम सिंह भी पहुंचे, बड़े नेताओं ने भी डाल रखा है डेरा
करहल से अखिलेश यादव के मैदान में उतरने की वजह से लंबे समय बाद सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव भी यहां पहुंचे। बृहस्पतिवार को उन्होंने कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित किया, तो बेटे के लिए सीट छोड़ने वाले सोबरन सिंह की पीठ थपथपाई। सोबरन को उम्मीद है कि सरकार बनी तो उन्हें भी तोहफा मिलना तय है। यहां शिवपाल भी प्रचार कर चुके हैं। दूसरे भी कई बड़े नेता यहां डेरा डाले हुए हैं। इस सीट की स्थिति पर गौर करें तो यादव, मुस्लिम, शाक्य और बघेल आबादी के साथ क्षत्रिय भी हैं। कांग्रेस ने प्रत्याशी नहीं उतारा है। बसपा से कुलदीप नरायन चुनाव लड़ रहे हैं।
बदला-बदला सा है जसवंतनगर का नजारा
जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र का नजारा बदला-बदला सा है। जसवंत नगर ब्लॉक के सिसहाट में हम पहुंचे तो यहां भी एक दुकान पर गाना बज रहा था-जादू है, नशा है, मदहोशियां हैं...। तभी जनसंपर्क करते हुए शिवपाल के बेटे आदित्य यादव अंकुर पहुंचते हैं। यह देख दुकानदार देवेंद्र सिंह कहते हैं, यहां तो जादू शिवपाल का है। पहले इस इलाके में दूसरी पार्टियों के झंडे दिखते थे। मनीष पतरे के सपा में आने के बाद माहौल एकदम बदल गया। कुछ ऐसी ही बातें गड़ी रामधन और गोपालपुर के युवा भी हमें बताते हैं। बीच से आवाज आई, चचा तो साथ थे ही, अब अंकुर ने भी जिम्मेदारी संभाल ली है। अंकुर किसी के पैर छूते हैं तो किसी को गले लगाते हैं। बिलासपुर में भी ऐसा ही नजारा रहता है। शिवपाल से लगाव के सवाल पर एक बुजुर्ग कहते हैं, मेरेे बेटे की शिवपाल ने ही नौकरी लगवाई।
चुनाव लड़ने के लिए नेग
हम ताखा ब्लॉक में भरतिया कोठी के पास से निकले तो वहां शिवपाल का काफिला पहुंच जाता है। लोग उनका गर्मजोशी से स्वागत करते हैं। शिवपाल कहते हैं, जब तक जिंदा रहूंगा, किसी के नाम और सम्मान पर आंच नहीं आने दूंगा। सभा खत्म हुई तो कुछ लोग आगे बढ़ते हैं। लोग शिवपाल के हाथ में रुपये भी रखने लगे। इन्हीं में से एक राजित यादव से हमने पूछा तो वे कहते हैं-ये हमारी तरफ से नेग है। नेता ने हमारे लिए बहुत किया। वे चुनाव के दौरान आए हैं तो हम खाली हाथ कैसे लौटाएं। यहां से काफिला उमरखेड़ा पहुंचता है। यहां शिवपाल कहते हैं, हम चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। हमें तो जनता चुनाव लड़ा रही है। सभा खत्म होने के बाद राजेश और प्रेम बहादुर शर्त लगाते हुए दिखे। शर्त इस बात पर लगाई जा रही थी कि चाचा को ज्यादा वोट मिलेंगे या भतीजे को। हमने जब उनसे सवाल किए तो वे कहते हैं, इस बार मनीष पतरे भी साथ हैं। शिवपाल के द्वार पर किसी भी बिरादरी का व्यक्ति पहुंच जाए तो वे उसे निराश नहीं होने देते हैं। उदयपुरा के बेचन वर्मा कहते हैं, शिवपाल हर जाति व धर्म के लोगों को समान सम्मान देते हैं। इसीलिए इलाके के मतदाताओं और करहल के मतदाताओं में प्रतिस्पर्धा है कि किसका नेता ज्यादा वोट पाएगा। इन लोगों से जब हमने भाजपा और अन्य प्रत्याशियों के बारे में बात की तो उन्होंने कहा, भाजपा से आए विवेक शाक्य नए हैं। उन्हें और बसपा के बृजेंद्र प्रताप सिंह को परंपरागत वोटोंेे का सहारा है।