नवंबर माह में अफीम की खेती शुरु होती है। इसके लिए किसानों को लाइसेंस के लिए जिला अफीम अधिकारी के यहां आवेदन करना होता है। अक्सर उन्हीं किसानों को लाइसेंस मिलते हैं या नवीनीकरण होते हैं जिन्होंने पहले खेती की है।
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इसके लिए नवंबर माह में खेत को 3 से 4 बार अच्छी तरह से जोता जाता है। इसके बाद गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट डाली जाती है। फिर नवंबर के अंत या दिसंबर माह की शुरुआत में अफीम के दानों की बोवाई होती है। जिले में इसे पोस्ता का दाना कहते है। 100 दिन में अफीम का पौधा तैयार होता है। जो करीब एक से सवा मीटर लंबा होता है। पौधे के ऊपर अफीम का फल लगता है। जिसे विभाग डोडा व किसान घरिया कहते हैं।
मार्च महीने में इसी डोडे में चीरा लगाया जाता है। चीरे से दूध निकलकर उसी डोडे पर जम जाता है। जिसे चाकू से निकाल कर एकत्र किया जाता है। यही अफीम होती है। यह अफीम विभाग के पास जमा करती पड़ती है। अफीम में मार्फीन की निर्धारित मात्रा जरूर होनी चाहिए। इतना ही नहीं जिन किसानों को लगता है कि अफीम की मात्रा सही नहीं होगी वह अपने खड़ी फसल को खेतों में ही जुतवा देने का आवेदन करते हैं। विभाग के अधिकारी मौके पर जाकर खेत जुतवा देते हैं।