यूपी के चुनावी रण में जहां तमाम जातियों का शोर मच रहा है, वहीं सवर्ण खामोशी से चुनावी परिदृश्य का आकलन कर रहे हैं। समीकरणों की बिसात पर ये बिरादरियां किसी भी उम्मीदवार या पार्टी का खेल बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखती हैं। अतीत में झांकें तो ऐसे कई उदाहरण है जब सवर्ण जातियों ने किंग मेकर की भूमिका निभाई। इस चुनाव में भी इन जातियों की अहम भूमिका है और सभी दलों की निगाहें इस तरफ हैं।
उत्तर प्रदेश की बात करें तो सवर्ण मतदाताओं की आबादी 26 फीसदी से ज्यादा है। इनमें सबसे ज्यादा 11 फीसदी से अधिक ब्राह्मण वोटर हैं। 9 फीसदी से ज्यादा क्षत्रिय मतदाता हैं। वैश्य मतदाता 6 प्रतिशत से अधिक और कायस्थ करीब 2 फीसदी हैं। शहरी सीटों पर वैश्य मतदाताओं की मौजूदगी ज्यादा है। ग्रामीण परिवेश में ब्राह्मण, क्षत्रिय, त्यागी, कायस्थ आदि मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है।
पश्चिमी यूपी के चुनावी बिसात को देखें तो दलों ने जिस तरह से सवर्ण प्रत्याशी उतारे उससे इनकी अहमियत स्पष्ट रूप से सामने आती है। मेरठ शहर सीट पर भाजपा ने इस बार ब्राह्मण पर दांव खेला है, तो कांग्रेस ने भी ब्राह्मण को ही यहां से उम्मीदवार बनाया है। इस सीट पर पहले भी भाजपा की ओर से बड़ा चेहरा डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी चुनाव लड़ते रहे हैं। सरधना सीट पर इस बार तगड़ा मुकाबला है। यहां भी भाजपा ने मौजूदा विधायक संगीत सोम को ही चुनावी मैदान में उतारा है। उधर, बसपा ने कई सीटों पर इसी तरह का दांव चला है। मेरठ की कैंट और बागपत की बड़ौत सीट पर ब्राह्मण उम्मीदवार को उतारा गया है।
धौलाना सीट पर भी भाजपा ने ठाकुर पर दांव लगाया है। साहिबाबाद से तो भाजपा और रालोद-सपा गठबंधन यानी दोनों ने ही ब्राह्मण पर दांव खेला है। मोदीनगर सीट पर भी बसपा, गठबंधन और भाजपा तीनों का सवर्णों पर दांव है। कौल, अनूपशहर आदि सीटों पर भी भाजपा ने यही फॉर्मूला इस्तेमाल किया है।
खुद दर्ज कराते रहे हैं अपनी अहमियत
इन जिलों में काफी है संख्या
प्रदेश में गाजियाबाद, हमीरपुर, गौतमबुद्धनगर, प्रतापगढ़, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, फतेहपुर, बलरामपुर, गोंडा ठाकुरों की मौजूदगी अच्छी खासी है। वहीं, ब्राह्मणों की जिन जिलों में अच्छी खासी संख्या है, उनकी संख्या 24 से ज्यादा है। शामली, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, हापुड़, बुलंदशहर, अलीगढ़, मुरादाबाद, मेरठ, बरेली, बागपत, आगरा, अमरोहा, गौतमबुद्धनगर सहित कई जिलों में सवर्णों की तादाद काफी है। पहले चरण के चुनाव की बात करें तो सवर्ण इन सीटों पर किसी का भी परिणाम बदल सकते हैं।
पिछले चुनाव में दिखे भाजपा के साथ
बसपा और सपा कर रही पूरा प्रयास
बसपा और सपा सवर्णों को रिझाने के लिए भरपूर कोशिश कर रही हैं। खास तौर पर बसपा तो वर्ष 2007 के चुनाव में सवर्णों के दम पर ही सत्ता के शिखर तक पहुंची। सोशल इंजीनियरिंग के उसी फॉर्मूले को इस बार भी बसपा आजमाना चाह रही है। सपा ने भी भगवान परशुराम की मूर्ति के बहाने सवर्णों में खास तौर से ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश की है।