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स्पीक एशिया के जालसाजों के दिमाग की उपज थी 3700 करोड़ की महाठगी

Wed, 15 Feb 2017 11:48 PM IST
सैयद यासिर रजा/अमरउजाला, लखनऊ
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डेमो
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स्पीक एशिया का नाम सुनते ही लोगों के पुराने जख्म ताजा हो जाते हैं। 2011 में यह कंपनी 2200 करोड़ रुपये लेकर चंपत हो गई थी। कई के घर बिके और कई ने आत्महत्या कर ली।
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अब 3700 करोड़ के जालसाज पकड़े गए तो उनके भी तार स्पीक एशिया के लोगों से जुड़ने लगे। जांच में एसटीएफ को पता चला कि स्पीक एशिया से जुड़े लोगों के ही दिमाग की उपज थी एब्लेज इंफो सलूशन और सोशल ट्रेड बिज डॉट काम।

एसटीएफ को इस बारे में सुराग हाथ लगे तो एक टीम मुंबई रवाना कर दी गई जो वहां पूर्व में स्पीक एशिया से जुड़े लोगों से पूछताछ करेगी। नोएडा में बेस बनाकर एब्लेज ने सोशल ट्रेड बिज वेबसाइट के जरिये न सिर्फ देश के बल्कि खाड़ी देशों के लोगों को भी घर बैठे पैसे कमाने का ऑफर दिया।
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शुरू में 600 लोग जुड़े। छह महीने में यह संख्या डेढ़ लाख पार कर गई। फिर तो बड़ी तेजी से लोग इससे जुड़ते चले गए। शुरुआत में हर दिन इस कंपनी से 10 से 12 हजार लोग जुड़ रहे थे, जो साढ़े पांच हजार से लेकर 55 हजार रुपये तक निवेश कर रहे थे।

जब एसटीएफ को शिकायत मिली और कंपनी पकड़ में आई तो इस ऑनलाइन फ्रॉड के जाल में साढ़े छह लाख लोग फंस चुके थे। जालसाजों का लक्ष्य 10 लाख सदस्य बनाना था। उसके बाद विदेश भाग जाने का प्लान था।

हर जिले में बना था वॉट्सएप ग्रुप

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साढ़े छह लाख लोगों के पैसे लूटने वाली कंपनी ने सरकारी महकमे की हीलाहवाली का भी जमकर फायदा उठाया। मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स में कंपनी रजिस्टर्ड की गई।

विभाग का काम होता है कि  कंपनी किस मकसद से खोली जा रही है, कितने लोगों का शेयर है और इसका मुख्य मालिक कौन है, इसकी जानकारी करे। रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी को कंपनी के बाबत पूरी जानकारी देनी होती है, जो नहीं दी गई।

एक शिकायत पर आरबीआई ने कंपनी के काम के तौर तरीके में खामियां पाते हुए रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी को अक्टूबर में केस ट्रांसफर कर दिया था, लेकिन वहां कोई एक्शन नहीं लिया गया।

बैंकों में कॉर्पोरेट खातों की केवाईसी कई चरणों में होती है, लेकिन मिलीभगत के चलते यह केवाईसी भी पूरी नहीं कराई गई। इन विभागों को भी जांच के दायरे में शामिल किया जा सकता है।

एब्लेज की ओर से जो भी जिले का पहला निवेशक होता था उसकी जिम्मेदारी वाट्स एप ग्रुप बनाने की होती थी। इसके बाद कंपनी से जुड़ी जानकारी, कब सर्वे आएगा, कब पेमेंट आएगा, इस पर दी जाती थी।

भंडाफोड़ के बाद ऐसे वाट्स एप ग्रुप से जुड़े लोगों को पुलिस को कुछ भी न बताने की नसीहत दी जाने लगी। धमकी भी दी गई कि अगर किसी ने पुलिस को कुछ बताया तो उसका सारा पैसा डूब जाएगा। कंपनी के सही होने का भरोसा भी वाट्स एप ग्रुप पर दिलाया जा रहा है और जल्द ही सब ठीक होने की बात कही जा रही है।

करोड़ों में होता था ट्रांजक्शन

demo pic - फोटो : अमर उजाला
एसटीएफ के मुताबिक, एब्लेज कंपनी के खिलाफ हैदराबाद में एक और एफआईआर दर्ज हो गई है। हैदराबाद के साईबराबाद में पहले से दो एफआईआर दर्ज है। इस मामले में कई सरकारी एजेंसियों की लापरवाही भी सामने आई है। इसमें बैंक भी शामिल हैं।

दस लाख से अधिक के भुगतान पर स्वत: ईमेल जनरेट हो कर बैंक के उच्चाधिकारियों तक पहुंच जाता है। ऐसे ट्रांजेक्शन को ससपीशियस ट्रांजेक्शन रिपोर्ट कहते हैं। कई बार संबंधित बैंकों की टीमें मुंबई से भी आईं लेकिन जांच के नाम पर खाना पूरी करके चली गईं।

बैंक कर्मियों की लापरवाही या मिलीभगत सबसे अधिक रही। एसटीएफ के एसएसपी अमित पाठक ने बताया कि पिछले बैलेंस शीट में जिन कंपनियों को भुगतान किया गया उनकी जब डिटेल निकलवाई गई तो पता चला कि जिस कंपनी को भुगतान किया गया है, उसका पता कहीं पंचर की दुकान, कहीं कपड़े की दुकान और कहीं घर था।

पूछताछ में पता चला कि खाता खुलवाने के लिए एक हजार से दो हजार रुपये तक महीने दिए जाते थे। खाता एब्लेज कंपनी का सीए ऑपरेट करता था। एक बिचौलिया भी था जो हर ट्रांजेक्शन का डेढ़ प्रतिशत कमीशन लेता था। एक-एक ट्रांजक्शन करोड़ों में होता था।
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साढ़े चार करोड़ का दिखाया नुकसान

डेमो - फोटो : demo pic
पिछले वित्त वर्ष में कंपनी के मालिक अनुभव मित्तल ने साढ़े चार करोड़ का घाटा दिखाया था। कंपनी ने अपना बिजनेस साढ़े 30 करोड़ का दिखाया जबकि आमदनी 26 करोड़ थी।

एसटीएफ और आयकर टीम अभी सिर्फ पिछले बैलेंस शीट के आधार पर कार्रवाई कर रही है। इसमें कई बड़े बैंक अधिकारी फंसते नजर आ रहे हैं।एसटीएफ के सूत्रों की मानें तो अनुभव और उसके साथियों के तीन मुख्य वाट्स एप ग्रुप थे।

इसमें सबसे कम लोग थिंक टैंक में थे, जो कंपनी से जुड़ी पॉलिसी तय करते थे। दूसरा ग्रुप डायमंड क्लब था जिसमें एक दर्जन से अधिक लोग शामिल थे। उसका तीसरा ग्रुप गोल्डेन क्लब था। इसमें भी कई लोग जुड़े थे।
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