कछुओं से जुड़ी मान्यताएं और भोजन में इस्तेमाल ही उसकी जान का दुश्मन बन गई हैं। इसलिए बड़े पैमाने पर उसकी तस्करी होती है। कछुए को नवंबर-दिसंबर में पकड़ा जाता है और फरवरी के आखिरी व मार्च की शुरुआत में तस्करी की जाती है।
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दरअसल, कछुए के लिए नवंबर-दिसंबर से लगभग तीन महीने का हाइबरनेशन पीरियड शुरू होता है। इस दौरान कछुए खाना-पीना बंद कर देते हैं और सुस्त हो जाते हैं।
नतीजतन, फरवरी के आखिरी और मार्च की शुरुआत तक उन्हें पकड़कर स्टोर करना और बाहर भेजना बेहद आसान होता है। इसलिए पूरे उत्तर भारत, खासतौर पर यूपी और बिहार में इन दिनों कछुए की तस्करी बढ़ जाती है।
टर्टल सर्वाइवल एलायन्स (टीएसए) के टर्टल रेस्क्यू स्पेशलिस्ट डॉ. शैलेंद्र सिंह बताते हैं कि दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में कछुए की अच्छी कीमत मिलती है। वहां काला कांडा कछुआ के लिए 30 हजार रुपये तक मिल जाते हैं। इसे एक खास संप्रदाय के लोग खूब पालते हैं। जबकि यह कछुआ पूर्वांचल व तराई क्षेत्र से महज 100 से 200 रुपये में कलेक्ट किया जाता है।
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दुर्लभ तिलकधारी कछुओं की है ज्यादा डिमांड
कछुआ
- फोटो : amar ujala
वहीं, गांव-देहात और जंगलों से महज 100 से 500 रुपये में खरीदा जाने वाला कछुआ प्रजाति विशेष के हिसाब से बांग्लादेश में 2000 से 10,000 रुपये में आसानी से बिक जाता है। उन्होंने बताया, दुर्लभ तिलकधारी कछुओं की एक-एक पीस के लिए सवा लाख रुपये तक मिल जाते हैं।
डॉ. शैलेंद्र के मुताबिक, दिसंबर 2016 से अब तक एसटीएफ व अन्य एजेंसियों ने करीब 15 हजार कछुए बरामद किए। इनमें से करीब 6,300 कछुए अमेठी के आसपास से बरामद किए गए।
टर्टल रेस्क्यू क्षेत्र में काम कर रहीं अरुणिमा सिंह के मुताबिक, कछुए की तस्करी भोजन के लिए, यौन क्षमता बढ़ाने वाली दवाओं के निर्माण और पालने के लिए की जाती है। भोजन व दवाओं के लिए सूबे में साल, काली ढोढ़, भूतकाथा, हल्दी काथा, पहाड़ी त्रिकुटी, कटहावा, मोरपंखी, सुंदरी, कोरी पचेड़ा, ब्राह्मणी, पचेड़ा और पार्वती कछुआ का इस्तेमाल होता है।
इसके अलावा पूर्वी एशियाई देशों में स्योतर व भारतीय काला कछुआ का भी डिमांड है। उन्हें 300 से 500 रुपये प्रति किलो खरीदा जाता है। वहीं, स्टार टर्टल समेत कुछ चुनिंदा प्रजातियां पाली जाती हैं।
उत्तर भारत के तराई इलाकों में पाए जाने वाले काला कांठा की तस्करी महानगरों के अलावा विदेशों में बहुत बढ़ गई है। इसका इस्तेमाल लोग पालने के लिए करते हैं। इसके लिए लोग 30 से 50 हजार रुपये तक दाम चुकाते हैं। जानकारों की मानें तो 95 फीसदी लोग इसे अनजाने में खरीदते और पालते हैं, क्योंकि इसे पालना अपराध की श्रेणी में आता है।
गोमती में बचीं कछुए की महज 8 से 10 प्रजातियां
एक सर्वे के मुताबिक गोमती में कछुए की महज 8 से 10 प्रजातियां ही बची हैं। पहले 12 से 15 प्रजातियां पाई जाती थीं। वर्ष 2003 में कछुए की ढोर प्रजाति पूरी तरह से गायब हो चुकी है। कछुए को जलतंत्र का गिद्ध माना जाता है। इनसे नदियों व तालाबों का जैविक प्रदूषण दूर रहता है।
कछुए को लेकर होंगे 23 को होंगे जागरूकता कार्यक्रम
वन विभाग और टीएसए की ओर से कुकरैल में कछुओं के बारे में जानकारी देने के लिए प्रजेंटेशन, नुक्कड़ नाटक, महत्व बताती यात्रा व क्विज प्रतियोगिता का आयोजन 23 मई किया जाएगा। वहीं, लखनऊ जू में कछुआ बाड़े के पास जानकारी कैंप लगाए जाने की तैयारी है।