शीलू बलात्कार केस 11 दिसंबर 2011 की रात को हुआ। शीलू बलात्कार केस इसलिए चर्चाओं में आया क्योंकि आरोपी उस पार्टी का विधायक था जिसकी सरकार सूबे में थी। घटना को बिंदुवार इस तरह से समझिए...
*11 दिसंबर २०१० की रात को 17 साल की एक लड़की के साथ बांदा के नरैनी से बसपा विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी के आवास पर सामूहिक दुराचार हुआ। दुराचार के समय विधायक आवास पर मौजूद थे।
*दुराचार के बाद किशोरी ने विधायक आवास में ही एक महिला के कमरे में शरण ली, जिसने उसके खून से लथपथ कपड़े बदलवाए। बसपा विधायक को बचाने में जुटी पुलिस ने किशोरी व उसके परिवार के सदस्यों के आरोपों को दरकिनार कर मामले को हल्का बनाने की पुरजोर कोशिश की।
*विधायक के यहां से किशोरी पर आरोप लगाया गया कि वह एक मोबाइल फोन चोरी कर भाग गई है। इतना ही नहीं पुलिस ने शीलू के खिलाफ महज आरोप पर चोरी की धारा में मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
*शीलू को जब जेल भेजा गया तब भी उसे ब्लीडिंग हो रही थी। आरोपियों को बचाने के लिए पुलिस ने पहले शीलू को वयस्क बताते हुए उसे शारीरिक संबंध का आदी बताया।
सौंपी गई सीबीसीआईडी को जांच
*मामले के तूल पकडऩे पर राज्य सरकार ने दिसंबर माह के अंत में मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी थी। दो जनवरी को विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी को बसपा से निलंबित कर दिया गया।
*13 जनवरी 2011 को विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी व दो अन्य आरोपियों को जेल भेजा गया। विधायक का परिवार उनके बचाव में आया और मेडिकल आधार पर दुराचार के आरोप को नकारा। परिवार ने कहा विधायक दुराचार करने में सक्षम नहीं।
*इस बीच पुलिस ने शीलू को नाबालिग बताते हुए मेडिकल सर्टीफिकेट तैयार कराया। सीबीसीआईडी की जांच में दुराचार होने की पुष्टि विधायक के परिवार की कुछ महिलाओं के बयान से हुई।
*सीबीसीआईडी की जांच में चोरी का आरोप प्रमाणित नहीं हो सका। जिले के कप्तान समेत अन्य पुलिस अफसरों के खिलाफ जेल में जाकर पीडि़त किशोरी को धमकी दिए जाने के आरोप सामने आए।
*15 जनवरी को सीबीसीआईडी ने जांच में अंतिम रिपोर्ट अदालत में दाखिल कर दी। इस रिपोर्ट पर अदालत के आदेश के बाद शीलू को जेल से रिहा कर दिया गया।
मिली शीलू को सुरक्षा
*१६ जनवरी को शीलू व उसके परिवार के सदस्यों को सुरक्षा प्रदान की गई। सीबीसीआईडी ने अपनी रिपोर्ट में जिले के पुलिस अधिकारियों की भूमिका असहयोगात्मक बताई।
*तमाम आरोपों के बाद भी ऊंची पहुंच रखने वाले बांदा के तत्कालीन एसपी अनिल कुमार दास के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। बाद में अनिल कुमार दास को सीबीसीआईडी में ही तैनात कर दिया गया।
*१३ सितंबर को राज्य सरकार ने भी मामले की सीबीआई जांच के लिए सहमति जताई। १६ सितंबर २०११ सीबीआई ने मामले को दर्ज किया। सीबीआई ने इस मामले में एमएलए पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी व उनके चार साथियों पर अलग-अलग मामले दर्ज किए।
*सीबीआई ने भी अपनी पड़ताल में सीबीसीआईडी की जांच को सही पाया। २१ फरवरी २०१३ को सीबीआई लखनऊ की एक सक्षम अदालत में पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी और उनके चार सहयोगियों, वीरेंद्र कुमार शुक्ला, रघुवंश मणि द्विवेदी, रामनरेश द्विवेदी और राजेंद्र कुमार शुक्ला के खिलाफ अलग-अलग आरोपपत्र दाखिल किए।
*मार्च २०१३ अदालत में सुनवाई शुरू हुई। ५ जून २०१५ अदालत ने सुनाया फैसला। फैसले में विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी को मुख्य दोषी मानते हुए 10 साल की सजा सुनाई।