अमेठी जिले की सीमा में दाखिल होते ही जगदीशपुर में सड़क किनारे खड़ी सेल, गेल, भेल, इंडो गल्फ जैसी बड़ी कंपनियों की इमारतें इलाके के औद्योगिकीकरण के साथ गांधी परिवार की विकास की गढ़ी इबारतों का बखूबी अहसास कराती हैं।
पर सड़क से नीचे उतरते ही उतेलवा व कमरौली ग्रामसभा क्षेत्र में 20-25 साल पहले आबाद हुए औद्योगिक क्षेत्र का उजाड़पन रंग-बिरंगे कैलेंडर के पीछे छिपी खुरदरी असलियत को साफ बयां कर देता है।
करीब 60 फीसदी उद्योग बंद हो चले हैं, कई कंपनियां नीलाम हो चुकी हैं। नियम-कानूनों के विपरीत औद्योगिक क्षेत्र में नर्सिंग होम व शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बन गए हैं।
वीआईपी क्षेत्र होने का हुआ नुकसान
इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन फैजाबाद के पूर्व डिवीजनल चेयरमैन व कमरौली स्थित एक बिस्कुट फैक्ट्री के मालिक शाहनवाज अहमद कहते हैं कि वीआईपी क्षेत्र के होने के कारण हमको नुकसान ही हुआ।
न सांसद ने कभी दुखड़ा सुनने में दिलचस्पी ली और न प्रदेश की गैरकांग्रेसी सरकारों ने कोई सहयोग किया।
राहुल गांधी कभी कुमार मंगलम बिड़ला तो कभी बिल गेट्स के साथ दौरै कर इलाके की उन्नति का बड़ा खाका तो खींचते हैं, लेकिन जिस विकास से स्थानीय लोगों की हालत सुधर सकती है, उस पर ध्यान ही नहीं दिया गया।
नौकरी मिलती नहीं, तो फिर फायदा क्या
इंडस्ट्रियल क्षेत्र में चाय की दुकान चलाने वाले नौजवान संतोष कुमार कहते हैं कि बड़ी-बड़ी योजनाओं का क्या फायदा?
अमेठी के लोगों को तो उनमें नौकरी बमुश्किल ही मिलती है। अमेठी में राहुल से नाराजगी के ये स्वर केवल बदहाल औद्योगिक क्षेत्र में ही सुनने को नहीं मिलते।
टुकड़ा-टुकड़ा गुस्सा अगर संगठित हो गया तो राहुल को कोई विरोधी नहीं बल्कि पिछले चुनाव में खुद की खींची गई लकीर (3,70,198 वोटों से जीत) एक बड़ी चुनौती साबित होगी।
करेंगे चुनाव बहिष्कार
अमेठी विधानसभा क्षेत्र के अमटाही के अशोक मिश्रा बताते हैं कि गांव के बगल में मालती नदी पर पुल की मांग संजय गांधी के जमाने से की जा रही है।
हर चुनाव के समय आश्वासन ही मिलता है। अब पानी नाक के ऊपर पहुंच गया है। ऐसे ही सुर अमेठी क्षेत्र के करौंदी गांव में सुनाई देते हैं। खस्ताहाल सड़क से आजिज लोगों ने पिछले लोकसभा चुनाव में ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ का नारा दिया था।
राहुल के लोगों ने चुनाव बाद रोड बनवाने का आश्वासन देकर माहौल को शांत करा दिया। गांव के हरिश्चंद्र श्रीवास्तव बताते हैं कि चुनाव बाद सड़क बनवाना तो दूर, कोई अर्जी लेने वाला तक नहीं मिला।
पास के ही करनाईपुर गांव के लोग बेबसी के साथ कहते हैं, ‘जहर भरा पानी कइसे पीया जाय।’ दरअसल इस गांव में बरसों से फ्लोराइडयुक्त पानी नलों से आ रहा है। न उसे पीया जा सकता है न दाल पकाई जा सकती है।
ककवा रेलवे लाइन पर पुल की मांग को लेकर ओवरब्रिज निर्माण मोर्चा बनाने वाले वकील प्रभात पांडेय कहते हैं कि इसके प्रति सांसद और राज्य सरकार दोनों का रवैया उदासीन है। विरोध में करीब 150 बूथों पर चुनाव का बहिष्कार होगा।
'सिर्फ शोहरत के लिए विरोध'
पीसीसी सदस्य मुन्ना सिंह त्रिशुंडी कहते हैं राहुल को अमेठी से हराने का ख्वाब देखना खामख्याली के सिवा कुछ नहीं हो सकता।
जो भी लोग राहुल के खिलाफ लड़ने का इरादा बना रहे हैं, उनका मकसद कांग्रेस को हराना नहीं बल्कि शोहरत हासिल करना है।
पूरे क्षेत्र में कुछ लोगों को किन्हीं कारणों से नाराजगी हो सकती है पर अमेठी में गैर कांग्रेसी को जिताने का मतलब सब जानते हैं।
पहले 1977 में जनता पार्टी और फिर 1998 में भाजपा को जिताकर देख चुके हैं कि उनके जमाने में अमेठी का कितना विकास हुआ।
सब जानते हैं कि गांधी परिवार के आने के पहले अमेठी में क्या था और आज क्या-क्या है।
आप की हलचल
इस बीच केजरीवाल फैक्टर अमेठी तक पहुंच गया है। आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास ने तो अपनी दावेदारी की घोषणा से पहले ही अमेठी में डेरा डाल दिया है।
गांव-गांव जाकर जनसंपर्क कर रहे हैं और गांधी परिवार द्वारा कराए गए विकास को थोथा और अव्यावहारिक बता रहे हैं।
माहौल के लिए ‘कवितागीरी’ भी कर रहे हैं। आप से जुड़े पूर्व सभासद श्यामल विश्वास कहते हैं कि हमें हर तबके से रिस्पॉन्स मिल रहा है, जल्द ही हम हर चौराहे पर सवाल खड़ा कर देंगे।
सतर्क कांग्रेस
छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर लोगों की नाराजगी और विरोधी दलों की सक्रियता को लेकर कांग्रेस भी इस बीच सतर्क हुई है।
उपेक्षित और भाजपा की तरफ कदम बढ़ा रहे सुल्तानपुर के सांसद संजय सिंह को पुचकारना और फिर असम से राज्यसभा भेजा जाना विरोधियों को लेकर उपजी बेचैनी का नतीजा माना जा रहा है।
संगठन को भी सक्रिय कर गांव-गांव भेजा जा रहा है। तनिक भी प्रभाव वाले स्थानीय लोगों को संगठन से लेकर केंद्रीय मंत्रालयों की समितियों में समायोजित किया गया है।
'टा-टा, बाय-बाय से नहीं चलेगा काम'
किसानों व गरीबों के सवाल पर जब-तब गौरीगंज प्रशासन की नाक में दम कर देने वाली किसान नेता रीता सिंह कहती हैं, राहुल गांधी का रवैया समझ में ही नहीं आता।
चंद लोगों को छोड़ अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से ही नहीं मिलते, आम लोगों से क्या मिलेंगे?
अगर कोई उनसे मिलकर क्षेत्र का दुखड़ा सुनाने की ज्यादा हील-हुज्जत करता है तो उनके लोग पुलिस से कहकर उस पर मुकदमा करवा देते हैं। बकौल रीता इस बार टा-टा, बाय-बाय से काम नहीं चलेगा।
'छाप नहीं छोड़ पाए राहुल'
वकील व वरिष्ठ पत्रकार राज खन्ना कहते हैं कि पिछले 5 साल में राहुल गांधी अमेठी के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से न भावनात्मक रिश्ता बना पाए और न ही अपनी कोई छाप छोड़ पाए।
ज्यादा नाराजगी उनकी कार्यशैली को लेकर है। विकास योजनाओं में स्थानीय हितों को प्राथमिकता न मिलने और बुनियादी सवालों की अनदेखी लोगों को झल्लाने को मजबूर करती है।
राहुल का अमेठी के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से कोई जीवंत संवाद नहीं होता। यहां आने पर केवल स्वयं सहायता समूह के लोगों से बात करते हैं।
विकास के नाम पर कभी कुमार मंगलम बिड़ला, कभी किसी और के साथ किसी मेगा प्रोजेक्ट की शुरुआत तो कर जाते हैं, पर स्थानीय लोगों का उससे कोई भला नहीं होता।
अगर राज्य सरकारों ने अमेठी के हकों और हितों की अनदेखी की है तो राहुल उन सरकारों से लड़ते हुए भी नहीं दिखे। ऐसे में लोग उनमें नायकत्व नहीं देख पाते।
इस सबके बावजूद वे भारतीय राजनीति की अहम शख्सियत हैं। अगले लोकसभा चुनाव में फिर जीत जाएंगे मार्जिन भले ही कम हो जाए।