मूल रूप से इटावा के निवासी कवि कुमार मनोज खुद हिंदी काव्य मंचों पर कई वर्षों से सक्रिय हैं। इसके अलावा वे युवा कवियों को भी आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। पिछले साल से उन्होंने राजधानी के सरोजनीनगर में युवा कवियों को मंच देने के उद्देश्य से प्रशस्ति स्टूडियो की स्थापना की।
इस स्टूडियो में वरिष्ठ रचनाकारों के साथ ही नवांकुरों को भरपूर मौका मिलता है। उनके लिए काव्य समारोहों का आयोजन किया जाता है जिसकी रिकॉर्डिंग स्टूडियों में की जाती है और फिर उनके वीडियो को यू-ट्यूब पर डाला जाता है। कुमार मनोज बताते हैं कि उनके यू-ट्यूब चैनल के सब्सक्राइबर्स की संख्या कई लाख पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि मुझे काफी समय से यह महसूस हो रहा था कि युवा रचनाकारों में काफी प्रतिभा है और उसे आगे बढ़ाना चाहिए।
नार्वे में पिछले 40 सालों से स्पाइल दर्पण और वैश्विका पत्रिका का संपादन कर रहे लखनऊ निवासी वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में विदेशों में हिंदी का पठन-पाठन बढ़ा है और हिंदी साहित्य ने भी विकास की राह पकड़ी है। शरद आलोक का पिछले दिनों कोरोना काल में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘लॉकडाउन’ काफी चर्चा में रहा।
इस दौरान उन्होंने डिजिटल मंच पर हिंदी सेवियों को इकट्ठा कर बहुत से आयोजन कराए जिनकी देश-विदेश में चर्चा रही। एक नाटककार, कवि और लेखक के रूप में कई दशकों से सक्रिय शरद आलोक को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अलावा कई प्रदेशों के प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है तो वहीं नार्वे साहित्य का हिंदी में और हिंदी साहित्य का नार्वेजियन भाषा में अनुवाद कर उन्होंने दो देशों के साहित्य के बीच पुल का काम किया है। शरद आलोक का कहना है कि विदेशों में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है।