यूपी में कभी विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके घड़ियाल आज सफल संरक्षण का घंटा बजा रहे हैं। लखनऊ स्थित कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र ने ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसकी गूंज अब देश ही नहीं, विदेश के कई चिड़ियाघरों तक सुनाई दे रही है।
कुकरैल में जन्म लेने वाले घड़ियालों को ढाई वर्ष तक विशेष देखरेख में रखा जाता है, जिसके बाद उन्हें गंगा, घाघरा, चंबल, गेरुआ और गंडक जैसी नदियों में छोड़ा जाता है। इससे नदियों का पारिस्थितिक संतुलन मजबूत हो रहा है और जैव विविधता को नई ऊर्जा मिल रही है। इसके अलावा दुधवा, कतर्नियाघाट, हस्तिनापुर और महाराजगंज की नदियों में भी घड़ियाल फल-फूल रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह के अनुसार, राज्य ईको-पर्यटन का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है और दुर्लभ घड़ियालों को देखने देश-विदेश से पर्यटक आ रहे हैं। कुकरैल केंद्र में म्यूजियम और इंटरप्रिटेशन सेंटर जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं, जहां हर साल लगभग दो लाख घरेलू और सैकड़ों विदेशी पर्यटक पहुंच रहे हैं। सनातन परंपरा में देवी गंगा के वाहन मकर के रूप में पूजनीय यह जीव आज उत्तर प्रदेश के प्रयासों से वैश्विक पटल पर नई जिंदगी पा चुका है।