यूपी की रामपुर और मुरादाबाद ऐसी सीटें हैं जहां मुस्लिम वोटर ही जीत-हार तय करते हैं। दोनों जगह भाजपा के सांसद चुने गए।
यही नहीं कम से कम आठ और ऐसी सीटें हैं जहां के नतीजों में मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाता है लेकिन इन सीटों से मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीत सके।
मुस्लिम वोटों के बंटवारे और हिंदू मतों के कुछ हद तक ध्रुवीकरण के चलते ऐसा हुआ।
देश के इतिहास में यह पहला मौका है जब 18 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले सूबे से देश की सबसे बड़ी पंचायत में मुस्लिम नुमाइंदगी शून्य रहेगी।
वोटों के बंटवारे से भाजपा की राह हुई आसान
यूपी में ढाई दर्जन संसदीय सीटों पर मुस्लिम वोट 18 फीसदी तो एक दर्जन पर 35 फीसदी से ज्यादा है।
इनमें से दो को छोड़कर बाकी सभी सीटें भाजपा ने जीती हैं। 35 और 40 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटरों वाले क्षेत्रों में भी कमल खिला।
यही वजह है कि 2004 में 11 और 2009 में सात मुस्लिम सांसद देने वाले यूपी से इस बार मुसलमानों का प्रतिनिधित्व शून्य है। इसकी वजह मुस्लिम वोटों के बंटवारे या रणनीतिक मतदान में उनकी चूक को माना जा रहा है।
मुस्लिम बहुल सीटों पर कई-कई मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे। आपसी प्रतिष्ठा की लड़ाई में मुस्लिम वोटों के बंटवारे से भाजपा की राह आसान हो गई।
एक नजर मुस्लिम बहुल सीटों पर
रामपुर
संसदीय क्षेत्र में मुस्लिमों की आबादी 50 फीसदी से ज्यादा है। यहां से सपा, कांग्रेस और बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारे। उनके बीच वोटों का बंटवारा हुआ।
दूसरी तरफ सवर्ण, पिछड़े और दलितों का एक वर्ग भाजपा के पक्ष में लामबंद दिखा। नतीजा भाजपा की जीत केरूप में सामने आया।
मुरादाबाद
यहां भी मुस्लिमों की तादाद करीब 45 फीसदी है। यहां सपा, बसपा, कांग्रेस और पीस पार्टी के मुस्लिम उम्मीदवारों के बीच वोटों के बंटवारे के चलते भाजपा सीट निकालने में कामयाब रही।
मुस्लिम सपा को दिए वोट, तो जीती भाजपा
अमरोहा
यहां मुस्लिम आबादी 35 से 40 प्रतिशत के बीच है। सपा-बसपा दोनों दलों ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारे। मुसलमानों का रुझान सपा में पक्ष में दिखा। काउंटर पोलराइजेशन हुआ और भाजपा बड़े मार्जिन से चुनाव जीत गई।
नगीना
मुस्लिम वोट लगभग 36 से 40 फीसदी है जबकि दलित आबादी लगभग 22 फीसदी। यहां बसपा प्रत्याशी के पक्ष में मुस्लिमों का रुझान होता तो भाजपा हार जाती लेकिन मुस्लिमों ने सपा के पक्ष में लामबंदी की।
सपा को सेक्यूलर या दूसरी जातियों केवोट नहीं मिले। वे भाजपा की तरफ चले गए। लिहाजा भाजपा जीत गई।
सहारनपुर में कांग्रेस को चुना मुस्लिमों ने
सहारनपुर
मुस्लिम आबादी लगभग 40 प्रतिशत, कांग्रेस, सपा से मुस्लिम प्रत्याशी। मुस्लिमों का अधिकतम झुकाव कांग्रेस की तरफ रहा। काउंटर पोलराइजेशन में भाजपा जीती।
मुजफ्फरनगर
35 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम। बसपा के एकमात्र मुस्लिम प्रत्याशी फिर भी मुस्लिम मतों का एक हिस्सा सपा के पक्ष में गया। हिंदुओं के काफी हद तक ध्रुवीकरण ने भाजपा की बड़ी जीत का रास्ता खोला।
इन सीटों पर ऐसे मिली भाजपा की जीत
बिजनौर
महज सपा से मुस्लिम प्रत्याशी था। मुस्लिम वोटों का मामूली विभाजन हुआ। काउंटर पोलराइजेशन से भाजपा की बड़ी जीत का प्लेटफॉर्म तैयार हुआ।
श्रावस्ती
मुस्लिम आबादी 35 प्रतिशत से ज्यादा है। सपा और पीस पार्टी ने दो बाहुबली मुस्लिम प्रत्याशी उतारे। मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ। वहीं काउंटर पोलराइजेश ने भाजपा की राह आसान कर दी।
मेरठ
30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। सपा और बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों के बीच वोटों का बंटवारा और प्रतिक्रियात्मक ध्रुवीकरण हुआ। नतीजा, भाजपा की बड़ी जीत।
मुस्लिम वोटों का बंटवारा बड़ी वजह
मुस्लिम वोटों का बंटना ही वह सबसे बड़ी वजह रही जिससे सूबे से संसद में उनकी नुमाइंदगी खत्म हो गई।
इस बार भाजपा की लहर थी। लोग कांग्रेस की हुकूमत में भ्रष्टाचार, महंगाई से बेहद नाराज थे। इसलिए करीब 20 फीसदी मुस्लिमों ने भी भाजपा उम्मीदवारों को वोट दिया।
सहारनपुर में भाजपा प्रत्याशी की जीत में मुस्लिमों का भी योगदान है। मोदी चुनाव के दौरान किए गए वादे पूरे करेंगे।
मुफ्ती अहमद फराज कासमी, दारूल उलूम वक्फ देवबंद
अकेले दम पर जीतना संभव नहीं
मुस्लिम प्रत्याशियों के न जीतने की वजह मुसलमान वोटों का बंटवारा और सेक्युलर वोटों का भाजपा की तरफ शिफ्ट होना है।
यूपी में चार-पांच सीटों को छोड़कर मुसलमान अपने दम पर कहीं से चुनाव जीतने की स्थिति नहीं है।
जिन सीटों पर मुसलमानों की तादाद ज्यादा है, वहां कई मुस्लिम उम्मीदवार होने से वोटों का बंटवारा हुआ।
- जफरयाब जिलानी, कार्यकारिणी सदस्य, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
सबको साथ लेकर चलेंगे मोदी
मुसलमान लीडरशिप ने कभी अवाम की तरफ ध्यान नहीं दिया, उन्होंने अपने हितों को साधा। 55 साल कांग्रेस की हुकूमत रही, उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश ही नहीं की।
भाजपा का खौफ दिखाकर सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया। यही वजह है कि भाजपा तो जीती लेकिन मुसलमान नहीं जीते।
इस चुनाव में हमने मुसलमानों को समझाया कि मोदी से डरने की जरूरत नहीं है। मोदी सबको साथ लेकर चलेंगे और भविष्य में मुस्लिम प्रत्याशी भी उतारेंगे।
- मुफ्ती शमूम अहमद कासमी, भाजपा से जुड़े एवं अन्ना की कोर कमेटी के पूर्व सदस्य