पारसनाथ यादव, शाहिद मंजूर और राममूर्ति वर्मा प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।
तीनों क्रमश: जौनपुर, मेरठ और अंबेडकर नगर से चुनाव लड़े। तीनों ही तीसरे नंबर पर रहे। वे अपने विधानसभा क्षेत्रों में भी पहले या दूसरे नंबर की लड़ाई नहीं लड़ सके।
मुख्य मुकाबले से बाहर रहने वालों में सिर्फ यही मंत्री नहीं हैं, चुनावी अखाड़े में उतरे अधिकतर मंत्री और विधायक लड़खड़ाते नजर आए।
आठ विधायक थे मैदान में
सपा ने व्यूह रचना करते समय विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय, तीन कैबिनेट और चार राज्यमंत्रियों तथा आठ विधायकों को चुनाव में उतारा था।
माता प्रसाद डुमरियागंज से प्रत्याशी थे। यहां भाजपा जीती, बसपा नंबर दो पर रही और पांडेय नंबर तीन पर। वह इसी सीट में पड़ने वाले इटवा क्षेत्र से विधायक हैं। वहां बसपा प्रत्याशी उनसे ऊपर रहा।
जौनपुर लोकसभा सीट पर पारसनाथ यादव चुनाव लड़े। वह मलहनी से विधायक हैं। वह दोनों ही जगह तीसरे नंबर पर रहे। मेरठ से चुनाव लड़े शाहिद मंजूर भी अपने किठौर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा और बसपा से पीछे रहे।
अंबेडकर नगर से चुनावी जंग में उतरे राममूर्ति वर्मा भी लोकसभा सीट के साथ ही अकबरपुर विधानसभा सीट पर तीसरे नंबर पर चले गए।
राज्यमंत्रियों का हाल और बुरा
लखनऊ उत्तर से विधायक और लखनऊ सीट से चुनाव लडे़ राज्यमंत्री अभिषेक मिश्रा तो अपने विधानसभा क्षेत्र में 14,466 वोट ही प्राप्त कर सके।
राज्यमंत्री कैलाश चौरसिया मिर्जापुर से विधायक हैं और वाराणसी से चुनाव लड़ रहे थे।
उनके विधानसभा क्षेत्र में सपा नंबर चार पर रही। इसी तरह मिर्जापुर के प्रत्याशी सुरेन्द्र पटेल के सेवापुरी (वाराणसी) क्षेत्र में सपा प्रत्याशी को मात्र 21,769 वोट मिले।
कैसरगंज से चुनाव लड़े राज्यमंत्री पंडित सिंह के गोंडा विधानसभा क्षेत्र में सपा प्रत्याशी नंबर दो पर तो रही लेकिन भाजपा से 30 हजार वोटों से पीछे रहीं।
विधायक भी पिछड़े
चुनाव लड़ने वाले विधायकों में नंदिता शुक्ला (गोंडा), राजमती निषाद (गोरखपुर), गुलाम मोहम्मद (बागपत), जफर आलम (अलीगढ़), रामेश्वर सिंह (फर्रुखाबाद), मित्रसेन यादव (फैजाबाद), बेचई सरोज (लालगंज) व राधेश्याम सिंह (कुशीनगर) भी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सके। सभी अपने विधानसभा क्षेत्रों में पीछे रहे।
अखिलेश सरकार से भरोसा डिगा
यदि मंत्रियों, विधायकों के प्रदर्शन को जनमत माना जाए तो अखिलेश सरकार से प्रदेश के लोगों का भरोसा डिगा है।
दो साल पहले प्रदेश की जनता ने सपा को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए जनादेश दिया था। तीन दर्जन विधानसभा क्षेत्रों को छोड़कर सभी निर्वाचित सपा विधायकों के क्षेत्रों में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है।
भंग हो सकती हैं इकाइयां
ऐसा माना जा रहा है कि अप्रत्याशित नतीजों के बाद सपा की प्रदेश और जिला इकाइयों को भंग किया जा सकता है।
कई जिलों से संगठन के पदाधिकारियों की शिकायतें भी मिली हैं। उनकी जांच कराई जा रही है। बहुत संभव है कि कुछ नेताओं पर अनुशासनहीनता और भितरघात के कारण गाज भी गिर जाए।
ये नेता भी निशाने पर
चुनाव परिणामों के बाद वे नेता भी निशाने पर हैं जिन्हें मंत्री का दर्जा दिया गया है। ऐसे तमाम लोगों के खिलाफ शिकायत है कि उन्होंने चुनाव में दी गई जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से नहीं निभाया।
चुनाव के दौरान भी ये माननीय लखनऊ में डेरा डाले रहे। इनमें से कई को प्रत्याशियों ने अपने क्षेत्रों में प्रचार के लिए न भेजने का आग्रह भी पार्टी नेतृत्व से किया था।