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मरीज ही नहीं, मुर्दे भी कर रहे हैं डॉक्टरों का इंतजार

Wed, 14 May 2014 05:12 PM IST
मनीष कुमार सिंह/ अमर उजाला, लखनऊ
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पहले ट्रॉमा सेंटर में भर्ती के लिए जुगाड़, इलाज के लिए सिफारिश यहां तक कि पोस्टमार्टम के लिए भी जुगाड़, ये है केजीएमयू की मरचरी का हाल। देखें खास रिपोर्ट
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बेटे की मौत के बाद रोते-रोते मां की आंखें पथरा गई थीं। मां बार-बार बेटे का चेहरा आखिरी बार देखने के लिए मरचरी के अंदर बने शवगृह की ओर दौड़ जाती। हर कोई यही कह रहा था ‘डॉक्टर साहब’ आएंगे तभी पोस्टमार्टम होगा।

लेकिन डॉक्टर साहब अपने तय समय पर ड्यूटी पर नहीं पहुंचे। संवेदनहीनता और लापरवाही का ये नजारा केजीएमयू की मरचरी का है। यहां रोजाना लगभग बीस शव पोस्टमार्टम के लिए पहुंचते हैं लेकिन जिन डॉक्टरों की वहां ड्यूटी लगती है वो अक्सर तीन से चार घंटे देरी से पहुंचते हैं।
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जमीन पर पड़े शवों के बीच अपने परिवारीजन को पहचानना और फिर डॉक्टरों का इंतजार करना लोगों की नियति बन गई है।

शव रखने के अलग से पैसे

हर धर्म में मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर को सम्मान से देखा जाता है, उसका अंतिम संस्कार किया जाता है लेकिन जब आप केजीएमयू की मरचरी पहुंचेगे तो अपनों की बेकदरी से दिल टूट जाएगा।

सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले शैलेंद्र के बड़े भाई कृष्णा ठाकुर भी सोमवार को इसी पीड़ा को झेल रहे थे। मरचरी के शवगृह में कई शवों के बीच उनके भी लाडले का शव पड़ा था। उसकी पहचान के लिए एक पर्ची उसके अंगूठे में बंधी हुई थी।

उन्हें इंतजार था कि कब डॉक्टर आएं और पोस्टमार्टम शुरू हो। इस इंतजार के बीच उन्हें शैलेंद्र की डेड बॉडी को शवगृह के अंदर रखने के लिए 60 रुपये चुकाने पड़े। पोस्टमार्टम के बाद डेड बॉडी को सही से बांधने के रेट (300 रुपये) भी उन्हें बता दिए गए थे।

कृष्णा का दर्द था कि जब कमाने वाला ही घर से चला गया तो पैसा कहां से आएगा। लेकिन कर्मचारियों की संवेदना इतनी मर चुकी थी कि बिना नोटों की झलक दिखाए उनसे कोई काम नहीं ले सकता था।

पीड़ितों की कहानी

केस वन: पारा निवासी शैलेंद्र कुमार (35) की रविवार रात को सड़क हादसे में मौत हो गई। पुलिस ने शव को उसी रात 1.30 बजे मरचरी पहुंचा दिया। पूरी रात परिवारीजन वहीं बाहर बिलखते रहे।

सुबह हुई तो आस बंधी कि अब पोस्टमार्टम जल्दी हो जाएगा। ‘डॉक्टर साहब’ नहीं आए। परिवारीजन कभी मरचरी के बाहर तो कभी अंदर चक्कर लगाते रहे।

केस टू: आजादनगर चिल्लावां निवासी इरफान (18) को रविवार रात दस बजे नादरगंज चौराहे के पास गाड़ी ने टक्कर मार दी थी। उसकी मौके पर ही मौत हो गई थी।

पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए सुबह मरचरी पहुंचा दिया। परिवार के लोग सुबह ही वहां पहुंच गए थे लेकिन डॉक्टर का इंतजार उनकी पीड़ा को बढ़ा रहा था। कर्मचारी कहते रहे कि डॉक्टर आते ही होंगे।

पीड़ितों को भगा दिया डॉक्टर ने

सोमवार को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्पताल के डॉ. आरके गौतम और डॉ. मोहम्मद अतहर की पोस्टमार्टम ड्यूटी लगी थी। मरचरी में 10 शव रखे थे और बाहर उनके परिवारवालों की भीड़ लगी थी।

नियमानुसार सुबह नौ बजे दोनों डॉक्टरों को पहुंचना था लेकिन दोपहर 12.30 बजे तक डॉ. गौतम और डॉ. अतहर ड्यूटी पर नहीं पहुंचे। मरचरी के बाहर आंसू लिए लोग डॉक्टरों का इंतजार कर रहे थे।

जब डॉक्टर करीब साढ़े बारह बजे ड्यूटी पर पहुंचे तो जल्दी पोस्टमार्टम के लिए कमरे के बाहर भीड़ लग गई। देर से आए डॉक्टर साहब का पारा भीड़ देखते ही चढ़ गया। पहले ही अपनों को खो चुकने की पीड़ा से बेहाल लोगों को उन्होंने अपने कक्ष से भगा दिया।

तीन पहिए के हैं स्ट्रेचर

कई दिन पुराने शवों को खराब होने से बचाने के लिए मरचरी में बारह डोर फ्रीजर हैं। पांच साल पहले लगाए गए डीप फ्रीजर मेंटेनेंस न होने के कारण एक-एक कर खराब हो गए। अब दो ही डीप फ्रीजर काम कर रहे हैं। शवों को डीप फ्रीजर में रखने की जगह एक हॉल में रखा जा रहा है।

कमरे को भी ठंडा रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी। पंखे काम नहीं कर रहे थे और वहां फैली बदबू के कारण सांस लेना दूभर हो रहा था। हालत ये थी कि रात को यदि कोई शव रखना हो तो खराब लाइटों के कारण अंदर जाने की हिम्मत कोई जुटा नहीं पाएगा।

एक पुलिसकर्मी ने बताया कि शवों को जमीन पर रखने का नियम नहीं है। जमीन से लगभग दो फीट ऊंचे पत्थर के चबूतरे पर शवों को रखना चाहिए। ऐसा इसलिए किया जाता है कि मरने वाले का सम्मान बरकरार रहे।

मरचरी की बदहाली का आलम ये है कि शव को उठाने के लिए जो स्ट्रेचर है उसमें तीन ही पहिए हैं। जब अमर उजाला फोटोग्राफर ने उसकी फोटो की तो कर्मचारियों ने स्ट्रेचर को कमरे में बंद कर दिया। इसके बाद परिवारवाले अपने हाथों पर शवों को अंदर ले जाते रहे। हालत ये थी कि कुछ स्ट्रेचर मरचरी के गेट पर ही टूटे पड़े थे।

पोस्टमार्टम के लिए भी रिश्वत

मुठ्ठी गर्म करो तो बिना पोस्टमार्टम ही मिलेगा शव मरचरी में तैनात कर्मचारी चाह लें तो बिना पोस्टमार्टम के भी डेडबॉडी वापस मिलने की व्यवस्था है।

सोमवार को एक ऐसी ही डेड बॉडी को बिना पोस्टमार्टम के ही उसे परिवारवालों को सौंप दिया गया। रविवार रात को ढाई बजे मरचरी पहुंचे एक वृद्ध की डेड बॉडी को बिना पोस्टमार्टम के ही देने का खुलासा हुआ।

सुबह करीब पौने ग्यारह बजे मरचरी पहुंचे परिवारवालों को एक कर्मचारी ने फ्रीजर में रखी डेडबॉडी को बिना पोस्टमार्टम के ही दे दिया। नियमानुसार बिना पोस्टमार्टम के डेडबॉडी को वापस नहीं दिया जा सकता।

जबकि कर्मचारी ने सादे कागज पर परिवारीजनों से लिखवा लिया कि ‘हम बिना पीएम के शव प्राप्त कर रहे हैं’ और उसे डेडबॉडी वापस दे दी।

जुगाड़ बिना काम नहीं

पहले ट्रॉमा सेंटर में भर्ती के लिए जुगाड़, फिर इलाज के लिए सिफारिश और इलाज में लापरवाही से मौत के बाद पोस्टमार्टम के लिए भी पौव्वा लगाना पड़ा।

ट्रॉमा सेंटर में मौत के बाद सर्वेश यादव नाम के एक मरीज को कुछ ऐसा ही दंश झेलना पड़ा। सर्वेश के रिश्तेदार सतीश चंद्र टीटू ने बताया कि दुर्घटना में घायल सर्वेश यादव (32) की शनिवार दोपहर तीन बजे इलाज में मौत हो गई थी।

शाम को चार बजे उसकी डेड बॉडी को मरचरी पहुंचा दिया गया था। वहां तैनात कर्मचारियों ने शाम होने का हवाला देकर पोस्टमार्टम करने से इनकार कर दिया। सतीश ने बताया कि रविवार सुबह जब वो पोस्टमार्टम हाउस पर पहुंचे तो सिफारिश वालों का पहले पोस्टमार्टम शुरू कर दिया ‌गया।

दोपहर को लगभग तीन बजे के बाद उनका पोस्टमार्टम सिफारिश के बाद किया गया। इस बीच परिवारवालों ने डॉक्टरों और कर्मचारियों से बात की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

कफन भी नहीं होता नसीब
पोस्टमार्टम हाउस में शवों की पहचान उनके पैर के अंगूठे में फंसे नाम के पर्चे से होती है। शव गृह में लाइन से पड़ी इन डेड बॉडी पर मक्खियां भिनभिना रही थीं। उन्हें ढंकने के लिए कफन तक नहीं था। जिनके परिवारवाले पहुंच गए थे, उन्होंने से खुद चादर डाल दी थी कुछ अपनों के लिए एक चादर का इंतजाम करने में जुटे थे।

अधिकारियों का ये है कहना

मामले पर सिविल अस्पताल के सीएमएस डॉक्टर एसके हसन का कहना है कि मरचरी में ड्यूटी पर तैनात दोनों डॉक्टर मरीज को देख रहे थे इसलिए देरी हो गई थी। मुझे इसकी सूचना मिली थी।

सूचना के बाद तुरंत मैने डॉक्टरों को ड्यूटी पर पहुंचने का आदेश दिया था। अगर चिकित्सकों के देर से पहुंचने की वजह से पोस्टमार्टम में परेशानी हुई तो आगे से ऐसा न हो इसका पूरा ध्यान रखा जाएगा।

डॉक्टरों की देरी से आने पर ही सीएमओ डॉ. एसएनएस का कहना है कि मरचरी में देर से चिकित्सकों के पहुंचने की सूचना नहीं है। अगर ऐसा हो रहा है तो ये गंभीर मामला है और इसमें कोई लापरवाही नहीं बरती जाएगी।

मरचरी में जो भी समस्याएं और परेशानियां हैं उसे ठीक करा लिया जाएगा। अगर पैसे की वसूली हो रही है तो औचक निरीक्षण कर इसे पकड़ा जाएगा।
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खत्म करेंगे दिक्कतें

मरचरी में समस्याओं की जानकारी अमर उजाला से मिली है। मैं इस मामले को गंभीरता से लूंगा और सभी अव्यवस्थाओं को जल्द से जल्द ठीक कराया जाएगा।

मरचरी में शवों को लेकर जो भी समस्या है उसको लेकर बातचीत की जाएगी। डॉक्टरों की देरी को लेकर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से बात की जाएगी।
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