शैलेंद्र कुमार ने तहरीर में आरोप लगाया है कि पुलिसवाले एडवोकेट जनरल/ सीएससी कार्यालय में जाने की बात दर्ज करवाकर कोर्ट में दाखिल हुए थे। काकोरी थाने की 320/25 एफआईआर का भी जिक्र किया। जांच में पता चला कि वह केस हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए लिस्ट में ही नहीं था। इसके बाद पुलिसवाले एडवोकेट जनरल/ सीएससी कार्यालय न जाकर अधिवक्ता गुफरान के चैंबर तक पहुंच गए।
इन धाराओं में दर्ज की गई एफआईआर
बीएनएस की धारा 329(3) आपराधिक अतिचार और गृह-अतिचार से संबंधित है। इसमें गलत इरादे (अपराध करने, किसी को डराने या अपमानित करने) से किसी की संपत्ति में गैरकानूनी प्रवेश या वहां बने रहना शामिल है। उपधारा (3) के लिए तीन महीने तक की कैद या 5,000 रुपये तक जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। धारा 351(3) आपराधिक धमकी से संबंधित है। यह मृत्यु, गंभीर चोट, आग से संपत्ति नष्ट करने या आजीवन कारावास/मृत्युदंड जैसे गंभीर अपराधों की धमकी देने पर लागू होती है। ऐसे में सात वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकता है।
धारा 352 शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान से संबंधित है। यदि कोई व्यक्ति किसी को जानबूझकर इस इरादे से अपमानित करता है कि वह व्यक्ति क्रोधित होकर सार्वजनिक शांति भंग करे या कोई अन्य अपराध करे। इसमें दो वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।धारा 217 लोक सेवक को गलत जानकारी देने से संबंधित है, ताकि वह कानूनी शक्तियों का इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने या परेशान करने के लिए करे। ऐसा करने वाले व्यक्ति को एक वर्ष तक की कैद, 10,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। धारा 318 धोखाधड़ी से संबंधित है। इसका उपखंड (2) बताता है कि जो कोई भी बेईमानी से किसी को धोखा देकर संपत्ति की डिलीवरी के लिए प्रेरित करता है, उसे तीन वर्ष तक की कैद या जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं।
हाईकोर्ट के अंदर या परिसर में पुलिस को प्रवेश के लिए आमतौर पर संबंधित अदालत के रजिस्ट्रार या न्यायिक अधिकारी से अनुमति लेनी होती है। खासकर अगर कोई तलाशी, गिरफ्तारी या किसी व्यक्ति को कोर्ट के सामने पेश करना हो। दरअसल, हाईकोर्ट एक संवेदनशील जगह है और वहां प्रवेश के सख्त नियम होते हैं। ऐसे में न्यायालय की अनुमति या वारंट आवश्यक है।
परिसर के बाहर से पकड़ने में चूके
दरअसल, महिला की लोकेशन मिलने पर पुलिसकर्मी हाईकोर्ट के बाहर पहुंचे थे। इससे पहले कि महिला को पुलिसकर्मी पकड़ पाते वह भीतर दाखिल हो गई। महिला को पकड़ने के लिए पुलिसकर्मियों ने नियम का ध्यान नहीं रखा और अधिवक्ता के चैंबर से पकड़ने के प्रयास में निलंबित कर दिए गए। पुलिसकर्मी अगर महिला के परिसर से बाहर निकलने का इंतजार करते तो शायद इतना हंगामा नहीं होता।