राजधानी को सीसीटीवी कैमरों से लैस कर सर्विलांस सिटी बनाने का सपना चूर होता दिख रहा है। न तो चप्पे-चप्पे की निगहबानी हो पा रही है और न ही अपराधी ही पकड़ में आ रहे हैं। व्यापारियों की ओर से चौराहों-गलियों और बाजारों में लगवाए गए 5000 सीसीटीवी कैमरों में से आधे से ज्यादा खराब पड़े हैं तो कई चोरों ने उड़ा दिए।
जो लगे हैं, वे भी ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। फिलहाल राजधानी मॉडर्न कंट्रोलरूम के महज 280 कैमरों के भरोसे है। राजधानी में कानून व्यवस्था पर नजर रखने और अपराधियों की धर-पकड़ के लिए सीसीटीवी कैमरे लगवाने की योजना तत्कालीन एसएसपी यशस्वी यादव ने बनाई थी। इसके तहत 70 प्रमुख चौराहों पर 280 कैमरे लगवाए गए। वहीं लगभग 5000 कैमरे व्यापारियों के सहयोग से लगने थे।
पुलिस अफसरों और व्यापारियों की बैठक में तय हुआ था कि बाजार की सुरक्षा के लिए वह खुद कैमरे लगवाएंगे। इन कैमरों का संचालन संबंधित थाना या चौकी में बने कंट्रोलरूम से होना था। ट्रांस गोमती के कुछ संवेदनशील इलाकों में लगे 200 सीसीटीवी कैमरे की फीडिंग सीधे मॉडर्न कंट्रोलरूम को भेजी जाती थी। हालांकि, कुछ ही दिन में सर्विलांस की यह योजना ध्वस्त हो गई।
व्यापारियों की तरफ से लगाए गए सस्ते कैमरे चंद महीने में ही बंद हो गए। कई जगह के सीसीटीवी कैमरे चोर उखाड़ ले गए। वर्तमान में गिने-चुने कैमरे ही काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी परफार्मेंस बहुत खराब है।
किसी वारदात में काम नहीं आए कैमरे
कैमरे चाहे व्यापारियों के हों या मॉडर्न कंट्रोलरूम के, किसी भी वारदात का खुलासा करने में इनकी भूमिका नहीं रही। कई बार कैमरों में बदमाशों की फोटो स्पष्ट रूप से पाई गई, लेकिन पुलिस बदमाशों का पता नहीं लगा सकी। गोमतीनगर में शनिवार शाम पत्रकारपुरम चौराहा पर 45 मिनट के भीतर चेन व पर्स लूट की चार वारदातों में कैमरे कुछ नहीं पकड़ सके।
आशियाना में युवक की हत्या कर नाले में शव फेंकने के मामले में सीसीटीवी फुटेज मिली, लेकिन बदमाश की तस्वीर इतनी धुंधली थी कि पहचान नहीं हो सकी। वाहन चोरी के एकाध मामलों में जरूर पुलिस को सफलता मिली।
कैसरबाग में एटीएम वैन से एक करोड़ तीन लाख रुपये की लूट, डालीगंज में एटीएम बूथ पर ट्रिपल मर्डर कर 50 लाख रुपये लूटने, अमीनाबाद में लॉ स्टूडेंट गौरी श्रीवास्तव की हत्या में भी सीसीटीवी फुटेज मिले लेकिन पुलिस कोई तीर नहीं मार सकी।
कैसरबाग की वारदात का खुलासा आज भी सवालों के घेरे में है। गौरी के हत्यारे को पुलिस ने मोबाइल सर्विलांस और इंटरनेट लॉग की डिटेल के जरिये पकड़ा। डालीगंज कांड को अंजाम देने वाले बदमाश आज तक पकड़े नहीं जा सके हैं।
मॉडर्न कंट्रोलरूम और दृष्टि प्रोजेक्ट के तहत लगाए गए कैमरे खास हैं। सीओ राघवेंद्र सिंह ने बताया कि 70 कैमरे पीटीजेड (पैन, टिल्ट, जूम) हैं, जो रात को भी बिलकुल साफ तस्वीरें देते हैं। इन कैमरों को कंट्रोलरूम में बैठे-बैठे ही 360 डिग्री तक घुमाकर किसी भी जगह पर फोकस किया जा सकता है।
ये कैमरे ऊपर-नीचे भी हो जाते हैं। 500 मीटर की दूरी तक की फोटो इन कैमरों से जूम कर एकदम स्पष्ट मिल जाती है। इसके अलाव 170 कैमरे फिक्स हैं। इनका फोकस एक ही जगह पर रहता है। 40 कैमरे आटोमेटिक नंबर प्लेट रिकग्नीशन (एएनपीआर) तकनीकी के हैं। रात के अंधेरे में भी इन कैमरों से वाहनों की नंबर प्लेट पर लिखे अक्षर और नंबर साफ पढ़े जा सकते हैं। इन्हीं कैमरों से ट्रैफिक पुलिस ई-चालान कर रही है।
रात की तस्वीरें किसी काम की नहीं
व्यापारियों के कैमरे काफी सस्ते और लोकल कंपनियों के थे। इनका रिजॉल्यूशन काफी कम होने से इनसे रात में ली गई तस्वीरें ये कैमरे रात में अंधे हो किसी काम की नहीं होती हैं। तापमान बढ़ने पर इनमें तकनीकी दिक्कत होने लगती है।
विशेषज्ञों की मानें तो सस्ते कैमरे लंबे समय तक उपयोग के लिए नहीं है। इन कैमरों की वारंटी भी नहीं है, इसलिए एक बार खराब होने पर व्यापारी इनकी मरम्मत में रुचि नहीं लेते।
सीसीटीवी कैमरे लगाकर उनका कंट्रोल थाना या चौकियों के हवाले कर दिया गया। इन चौकियों में पावर बैकअप का कोई इंतजाम नहीं। बिजली चली जाए या फिर किसी अन्य वजह से लाइन में खराबी आ जाए तो सभी सीसीटीवी कैमरों की बत्ती भी गुल हो जाती है। साथ ही इस बीच की रिकॉर्डिंग भी संभव नहीं। ऐसे में इस दौरान कोई घटना हो भी जाए तो कैमरे में कैद नहीं हो सकती।
इसलिए लगे थे सीसीटीवी
•कानून व्यवस्था, धरना-प्रदर्शन और आंदोलन, त्योहार, मेला-उत्सव व अन्य कार्यक्रमों में उपद्रवी की निगरानी
•चेन लुटेरों, वाहन चोरों सहित अन्य वारदातों में शामिल बदमाशों की पहचान कर उनकी धरपकड़
•ई-चालान, ट्रैफिक संचालन, नो पार्किंग और वन-वे व्यवस्था सहित यातायात नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई