शुक्र मनाइए कि सूबे में नेपाल की तीव्रता वाला भूकंप नहीं आया, वरना घनी आबादी और बड़ी-बड़ी इमारतों वाले शहरों में जन-धन का बड़ा नुकसान हो सकता था। वजह, आपदा प्रबंधन की जमीनी स्तर पर जिम्मेदारी निभाने वाले जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को कागजी बनाकर छोड़ दिया गया है।
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इसके लिए आज तक अधिकारियों, विशेषज्ञों व जरूरी कर्मचारियों की व्यवस्था के बारे में सोचा तक नहीं गया। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भी ज्यादातर उधार व कांट्रैक्ट के स्टाफ के भरोसे चल रहा है।
बताते चलें, केंद्र सरकार ने गुजरात के भुज व महाराष्ट्र के लातूर में आए भयानक भूकंप व 2004 की सुनामी में जन-धन की व्यापक हानि के बाद 2005 में आपदा प्रबंध अधिनियम (डीएम एक्ट- 2005) बनाया था।
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एक्ट की धारा-14 में राज्य प्रबंध प्राधिकरण व धारा-25 में जिला प्रबंधन प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान है। एक्ट की धारा 16 में राज्य प्राधिकरण व धारा 29 में जिला प्राधिकरण के लिए अधिकारियों व कर्मचारियों की नियुक्ति का प्रावधान है।
जिला प्रबंधन को दी गई बड़ी जिम्मेदारी
राज्य को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह इन प्राधिकरणों को जरूरी अधिकारी, परामर्शदाता व कर्मचारी उपलब्ध कराए। जिला प्राधिकरण की ही जिम्मेदारी है कि वह जिले की आपदा की संवेदनशीलता को देखते हुए आपदा प्रबंधन योजना बनाए। आपदा की दशा में विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय करे और इसे जमीनी स्तर पर लागू कराए।
विशेषज्ञ बताते हैं कि राष्ट्रीय व राज्य प्राधिकरण तो दिशा-निर्देश, सुझाव व वित्तीय सहयोग देने वाले तंत्र हैं। वास्तव में जमीनी काम तो जिला प्रबंधन प्राधिकरणों को ही करना होता है। यदि जिला प्रबंध प्राधिकरण को जरूरी संसाधन नहीं दिए जा रहे हैं तो यह मुसीबत का मुंह फैलाकर इंतजार करने जैसा है।
वास्तव में जमीनी स्तर पर अभी भी आपदा प्रबंधन का मतलब, आपदा के बाद दिशा-निर्देश जारी करने और फिर तात्कालिक राहत व बचाव कार्यों तक सीमित है।
पहले से ही आपदा से बचाव की योजना बनाने और दैवी आपदा आने पर उससे निपटने का तंत्र विकसित करने की पहल का अभी भी इंतजार ही है। कुंभ व अन्य बड़े आयोजनों के साथ बाढ़ जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए डिजास्टर रेस्पांस फोर्स की बात होती रही है, लेकिन यह भी अब तक आगे बढ़ नहीं पाई है।
...लेकिन यहां पर तो सबकुछ सिर्फ कागजी
जानकार बताते हैं कि जिलों में डीएम की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंध प्राधिकरण का कागजी तौर पर गठन किया गया है। इसमें जिला पंचायत अध्यक्ष के साथ जिलों के बड़े-बड़े अधिकारी भी शामिल हैं। हर जिले में अपर जिलाधिकारी को प्राधिकरण का पदेन मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) बनाया जाता है।
ये एडीएम अपने अधीन काम करने वाले कर्मियों में से ही किसी को इससे जुड़े कागजी कार्यवाही का काम सौंप देता है। एक्ट में प्रावधान के बावजूद इस अहम जिम्मेदारी के लिए एडीएम को न तो कोई अतिरिक्त अधिकारी दिए गए और न ही आपदा प्रबंधन के लिहाज से विशेषज्ञ।
यहां तक कि एक भी अतिरिक्त स्टाफ मुहैया नहीं कराए गए। जिले भर के निवासियों को दैवी आपदा से बचाने की जिम्मेदारी वाले इस प्राधिकरण का जिलों में अपना कोई अलग कार्यालय भी नहीं है।
अगर नरौरा में रेडिएशन शुरू हो जाए तो क्या होगा? एनडीएमए के एक अन्य पूर्व सदस्य बताते हैं कि जापान में भूकंप के बाद वहां के एक परमाणु संयंत्र से रेडिएशन से पैदा हुई आपदा को लोग भूले नहीं होंगे। यूपी के नरौरा (बुलंदशहर) में परमाणु बिजलीघर है।
ऐसी किसी आपात परिस्थिति से निपटने के लिए इमरजेंसी ऑपरेटिंग सेंटर की स्थापना की बात काफी दिन से हो रही है, लेकिन अभी तक यह बन नहीं सका है। हालांकि शासन के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि मुख्यमंत्री ने इस बार के बजट में इसके लिए पैसे का बंदोबस्त कर दिया है। इस पर जल्द काम शुरू हो जाएगा।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की भी हालत खस्ता
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की सूबे में आपदा की संभावनाएं कम करने के लिहाज से बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन यहां राहत आयुक्त को छोड़ दीजिए तो ज्यादातर स्टाफ या तो डेपुटेशन पर हैं या कांट्रैक्ट पर।
इसके अलावा विभिन्न विभागों के बीच समन्वय का काम भी प्राधिकरण को करना है, लेकिनस्टाफ की कमी और स्थायी कर्मियों के अभाव में यह पहल आगे नहीं बढ़ पा रही है।
जिला प्राधिकरण के मुख्य काम - हर जिले की अपनी आपदा मोचक योजना होगी। इसे जिला प्राधिकरण बनाएगा।
- राष्ट्रीय नीति, राज्य नीति, राष्ट्रीय योजना, राज्य योजना व जिला योजना का कार्यान्वयन, समन्वय व मॉनिटरिंग।
- जिले में आपदाओं के संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और निवारण के उपाय। - जिला स्तर पर सरकारी विभागों में आपदा प्रबंधन योजनाओं पर अमल।
- स्थानीय अधिकारियों, सरकारी व गैरसरकारी संगठनों की सहायता से सामुदायिक प्रशिक्षण व जागरूकता का आयोजन - जनता को आपदा से पहले चेतावनी देने का तंत्र विकसित करना।
13 मार्च 2013 को तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने आपदा जोखिम को कम करने के लिए विभिन्न विभागों को कई कदम उठाने के निर्देश दिए थे। इसमें विश्वविद्यालयों में आपदा प्रबंधन विभाग की स्थापना की भी बात शामिल थी। लखनऊ विश्वविद्यालय ने ही इस पर अमल नहीं किया। विश्वविद्यालय के प्रवक्ता प्रो. एनके पांडेय कहते हैं कि अगले सत्र में इस पर कार्यवाही की जाएगी।
मामले पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पूर्व सदस्य प्रो. एन. विनोद चंद्र मेनन का कहना है कि 2005 के एक्ट को बहुत सोच-समझकर बनाया गया है। इसमें केंद्र व राज्य स्तरीय प्राधिकरणों के साथ जिला आपदा प्रबंध प्राधिकरणों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका तय की गई है।
इस एक्ट को बिहार, उड़ीसा, गुजरात व असोम जैसे राज्य बहुत अच्छी तरह से लागू कर रहे हैं। यूपी को भी इसे प्रभावी तरीके से लागू करना चाहिए। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।
वही, प्रमुख सचिव राजस्व सुरेश चंद्रा का कहना है कि राज्य प्राधिकरण से लेकर जिला स्तर तक के आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों की मजबूती पर गंभीरता से विचार हो रहा है। मुख्य सचिव के स्तर पर इस संबंध में विस्तार से चर्चा हुई है। सरकार इस पर तेजी से काम करेगी।