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मुद्दा : दलितों का उत्थान, दलों के दायरे से निकल अपने सवालों के जवाब तलाशते दलित

Tue, 21 Dec 2021 02:36 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अमित मुद्गल, अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

दलितों का बेहद अहम भावनात्मक मुद्दा आरक्षण की सुरक्षा है। वे चाहते हैं कि दूसरी जातियों के लोग इसमें सेंध न लगाएं। जिस तरह पिछड़ों की 17 उप जातियां एससी का दर्जा पाने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं, उसको लेकर दलितों का कहना है कि आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए।
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विस्तार
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दो अप्रैल 2018...। एससी-एसटी एक्ट में हुए बदलावों के खिलाफ दलित सड़कों पर थे। देखते ही देखते स्थिति ऐसी बिगड़ी कि भीड़ बेकाबू हो गई। बवाल हुआ और देश भर में कई लोगों की जान चली गई। यूपी में भी यही हुआ और स्थिति सामान्य होने में काफी समय लगा। एक दलित चिंतक कहते हैं कि यह कोई अचानक आया उबाल नहीं था, बल्कि अधिकारों को लेकर भीतर ही भीतर सुलग रहे ज्वालामुखी का विस्फोट था। यही स्थिति आज भी है। दलितों के मुद्दे बरकरार हैं। चुनावी बयार में सियासी पार्टियां फिर से दलितों को लुभाने में जुटी हैं। पर, अहम सवाल है कि दलित किधर जाएंगे?

 

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दलितों का बेहद अहम भावनात्मक मुद्दा आरक्षण की सुरक्षा है। वे चाहते हैं कि दूसरी जातियों के लोग इसमें सेंध न लगाएं। जिस तरह पिछड़ों की 17 उप जातियां एससी का दर्जा पाने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं, उसको लेकर दलितों का कहना है कि आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग भी लंबे समय से चली आ रही है। वहीं, बैकलॉग पूरा करने की भी मांग यदा-कदा जोर पकड़ती ही रहती है। बसपा व दूसरे विपक्षी दल इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष को घेरते रहे हैं। वहीं दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा का है। 


दलित चिंतक सतीश प्रकाश कहते हैं, दलित चाहते हैं कि कानून व्यवस्था बेहतर हो। क्योंकि, अपराध का शिकार भी वे कहीं ज्यादा होते हैं। वे चाहते हैं कि बेरोजगारी की बात हो। प्रशासनिक व्यवस्था में उनकी सहभागिता बढ़े। जन कल्याणकारी योजनाएं उन तक पहुंचंे, इसके लिए पारदर्शी व्यवस्था भी वे चाहते हैं। भीम आर्मी व आजाद समाज पार्टी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद इन सवालों को और भी स्पष्ट कर देते हैं। वे कहते हैं, राजनीति की बिसात पर दलितों को केवल मोहरा बनाया गया। समाज की अन्य जातियां जहां अपनी हिस्सेदारी के लिए लड़ रही हैं, वहीं दलित केवल रोटी, कपड़ा और मकान के लिए संघर्ष कर रहा है। देश में हर साल लाखों बच्चों की मौत कुपोषण से होती है। 

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सियासी चेतना तो बढ़ी...

पर आर्थिक मोर्चे पर उतना नहीं दिखा असर
सतीश प्रकाश और चंद्रशेखर आजाद के सवाल अपनी जगह जायज भी हैं। ये सवाल आम दलित युवाओं को झकझोरते भी हैं। बहरहाल, दलितों के वोट पर सबसे बड़ा दावा बसपा करती रही है। इसका उसे फायदा भी खूब मिला। जब-जब दलितों के साथ अन्य वर्ग के मतदाता साथ आए, तब-तब बसपा मजबूत हुई। वर्ष 2007 के चुनाव में तो इस सोशल इंजीनियरिंग ने कमाल दिखाया और बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। बहरहाल दलित वोट बैंक के दम पर मायावती चार बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। पर, यह भी उतना ही सच है कि दलितों की राजनीतिक चेतना मजबूत हुई, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति में खास बदलाव नहीं आया। बसपा संस्थापक कांशीराम ने दलितों की राजनीति में उभार को उनके उत्थान के लिए जरूरी कदम बताया था। कुछ इसी तर्ज पर चंद्रशेखर आजाद भी कहते हैं, दलितों को लोकतांत्रिक ताकत अपने हाथ में लेनी होगी, तभी जमीन पर बदलाव दिखेगा।

दलितों की ताकत?
जहां तक सवाल सियासी ताकत की है तो दलित मतदाता किसी भी विधानसभा क्षेत्र में किसी भी चुनाव का परिणाम प्रभावित कर सकने का माद्दा रखते हैं। ऐसा होता भी रहा है, जब दलितों ने अपने दम पर चुनावी परिणाम का रुख मोड़ दिया।नीति आयोग 2016 की रिपोर्ट की रिपोर्ट बताती है कि सबसे अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी करीब 20 फीसदी है। वर्ष 2011 की जनगणना के हिसाब से यूपी में दलितों की जनसंख्या 4 करोड़ 45 लाख 89 हजार 300 है। पर, अब तो यह संख्या और भी बढ़ गई है। यही वजह है कि सभी दल इस वोटबैंक को पाने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। पर, एक हकीकत यह भी है कि 86 आरक्षित सीटों पर ही दलितों को राजनीतिक दल टिकट देते हैं। अन्य सीटों पर दलित उम्मीदवारों की संख्या नगण्य ही रहती है।

कई जिलों में परिणाम प्रभावित करने की क्षमता 

वैसे तो दलितों में जाटव, कोरी, पासी, धोबी, वाल्मीकि आदि हैं, पर इनकी 66 उप जातियां हैं। इनमें सबसे ज्यादा जाटव व अन्य 56 प्रतिशत हैं। पासी 16, धोबी, कोरी और वाल्मीकि 15 प्रतिशत, गोंड, धानुक, खटीक 5 प्रतिशत से ज्यादा हैं। 
आगरा, बिजनौर, सहारनपुर, गोरखपुर, आजमगढ़, जौनपुर, गाजीपुर में जाटव व अन्य का तगड़ा प्रभाव है, तो इसके अलावा हरदोई, रायबरेली, सीतापुर, इलाहाबाद क्षेत्र में पासी जाति का काफी प्रभाव है। सुल्तानपुर, बरेली, गाजियाबाद आदि जिलों में धोबी, कोरी, वाल्मीकि का प्रभाव है। बिजनौर में जाटवों के अलावा हिंदू जुलाहा जाति का भी खासा वर्चस्व है। यही कारण है कि इन क्षेत्रों में सुरक्षित सीटों के अलावा अन्य सीटों पर भी दलित वोटों का अहम प्रभाव है।

पर दलितों के मन में क्या?
अन्य जातियों की तरह ही यह भी अहम रहा है कि दलितों के साथ जब तक दूसरे वर्गों का समीकरण फिट नहीं होता, तब तक वे किसी भी एक पार्टी की चुनावी नैया आसानी से पार नहीं लगा सकते हैं। यही कारण है कि सभी दल इस समीकरण को तैयार करने की कोशिश में हैं। 
- बसपा सुप्रीमो मायावती दलितों के साथ ब्राह्मण व मुस्लिम समीकरण साधना चाह रही हैं। भाजपा भी अपने समीकरण पर काम कर रही है और कांग्रेस ने तो पंजाब में दलित को सीएम बनाकर दलित कार्ड खेल ही दिया है। 
- बसपा के टूटे दलित सिपहसालारों को अपने यहां लाकर सपा भी दलितों को लुभाने के लिए पूरा जोर लगाए है। पर, इन सब के बीच बड़ा सवाल है कि दलितों के मन में क्या है? वे किसके साथ खड़े होंगे? दलितों के मन में चाहे जो भी हो, पर एक चीज साफ रही है कि वे अपने पत्ते कभी खोलते नहीं हैं। 

सुरक्षा का सवाल अब भी बड़ा...
सुरक्षा दलितों के लिए एक बड़ा मुद्दा है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि दलितों के खिलाफ होने वाले अपराध में भी उत्तर प्रदेश पहले पायदान पर है। साल 2020 में देश में दलितों के खिलाफ अपराध के कुल 50,291 मामले दर्ज हुए। इनमें से 12,714 मामले उत्तर प्रदेश के हैं। 2019 की तुलना में दलितों के खिलाफ होने वाले अपराध का आंकड़ा भी बढ़ा है।

दलितों को वोट बैंक न समझें राजनीतिक दल

मुख्यधारा से जोड़ने के लिए दलितों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना होगा। दलित भारतीय समाज का एक ऐसा वर्ग है, जो ऐतिहासिक संदर्भों में सभी संसाधनों से वंचित रहा है। संविधान में प्रदत्त प्रावधानों के बावजूद दलित वर्ग संसाधनों में अपनी भागीदारी और अस्मिता की लड़ाई अब भी लड़ रहा है। इसका आशय यह कदापि नहीं है कि दलितों की स्थिति में स्वतंत्रता के बाद कुछ भी सुधार नहीं हुआ है। पर, यह सुधार अभी नाकाफी हैं। 

कुछ शहरी क्षेत्रों को छोड़ दें तो आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में जातिवाद वैमनस्यकारी और अपने परंपरागत रूप में कायम है। दलितों के सशक्तीकरण के लिए सरकारों ने अब तक जो प्रयास किए या तो वे नाकाफी रहे या उनके प्रयासों में राजनीति ज्यादा और ईमानदारी कम रही। यह दुर्भाग्य ही है कि दलित वर्ग अब भी विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए महज एक वोट बैंक है। मेरा मानना है कि यदि दलितों को मुख्यधारा से जोड़ना है और उन्हें सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना है तो सरकारों को ईमानदारी दिखानी ही होगी।

प्रतिनिधित्ववादी सिद्धांत लागू करना पड़ेगा :  गैर दलित समाज को इस अवधारणा से मुक्त होना पड़ेगा कि आरक्षण एक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम है। इसके लिए सरकारों को प्रतिनिधित्ववादी सिद्धांत की अवधारणा को लागू करना पड़ेगा। क्योंकि, आरक्षण केवल सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है, अन्य क्षेत्रों में नहीं। जबकि प्रतिनिधित्ववादी सिद्धांत हर क्षेत्र के संसाधनों में सभी वर्गों की बराबर भागीदारी सुनिश्चित करने की बात करता है।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व सामाजिक-आर्थिक भागीदारी का पर्याय नहीं :  वर्तमान में राजनीतिक क्षेत्रों में मिलने वाली भागीदारी (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) को सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों की भागीदारी का पर्याय बना दिया गया है, जो उचित नहीं है। दुर्भाग्य से आरक्षित वर्ग से आने वाले ज्यादातर राजनेता अपने समाज का प्रतिनिधित्व न कर सिर्फ अपनी अपनी राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने लगे हैं। इसी का नतीजा है कि दलितों की मूल समस्याओं का निदान और दूभर हो चला है।

समाज में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए सरकारों को और सजग रहना पड़ेगा। जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए संविधान में वर्णित जो प्रावधान हैं, नियम और कानून हैं, उनका सरकारें कड़ाई से पालन सुनिश्चित करवाएं। यह सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज के निर्माण के लिए यह आवश्यक भी है।

नौकरियों की निगरानी के लिए आयोग गठित हो
एससी-एसटी को सरकारी नौकरियों में मिलने वाला आरक्षण 22.5 प्रतिशत है। लेकिन इतने बरसों बाद भी एससी-एसटी को मिलने वाली सरकारी नौकरियों का प्रतिशत महज 9 से 10 ही है। दलितों के लिए सरकारी नौकरियों में निर्धारित आरक्षण तय समय सीमा के अंदर पूरा कराया जाना चाहिए। यह तभी संभव है जब सरकारें ईमानदारी से प्रयास करें। यही नहीं,  निगरानी के लिए एक आयोग भी गठित होना चाहिए जो हर साल दलितों को दी जाने वाली नौकरियों की समीक्षा करे और जहां सीटें रिक्त हैं वहां बैकलॉग के माध्यम से सीधी भर्ती करे। जो संस्थान या प्रतिष्ठान आरक्षित सीटों को जानबूझकर रिक्त रखते हैं उन पर आयोग कानूनी कार्रवाई करे।

निजी-सार्वजनिक संसाधनों में भागीदारी सुनिश्चित हो 
सरकारों को चाहिए कि वह निजी क्षेत्रों के साथ सभी सार्वजनिक क्षेत्रों के ‘संसाधनों’ में दलितों की भागीदारी सुनिश्चित करें। एक स्वस्थ समाज के लिए ऐसा करना जरूरी है। सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करके ही सही अर्थों में दलितों को मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है।
डॉ. राजेंद्र कुमार वर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय 
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अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकार ने लाभ पहुंचाया 

पहले दलितों के साथ मजाक होता था। यह भाजपा की ही सरकार है जिसने अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक लाभ पहुंचाया। दलितों के उत्थान के लिए योजनाएं शुरू कीं। प्रदेश के गरीब बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की। कॅरिअर निर्माण के लिए अभ्युदय कोचिंग सेंटर पहले मंडल और फिर जिला स्तर पर खोलने का काम किया। आश्रम पद्धति विद्यालय खोले। सभी को छात्रवृत्ति देने की व्यवस्था की। दलितों के उत्पीड़न पर उत्पीड़न-अत्याचार निवारण अनुदान तक की व्यवस्था की गई है। चाहे पारिवारिक भत्ता हो या अन्य अनुदान, सभी पर भाजपा ने काम किया।        
 - रमापति शास्त्री, मंत्री समाज कल्याण उप्र

नेताओं को दोहरा चरित्र त्यागना होगा
पूरे विश्व में रंगभेद, छुआछूत खत्म हो चुका है, पर शर्म की बात है कि देश में यह सब अब भी जारी है। अमेरिका जैसे देश में बदलाव आ गया, पर पता नहीं यहां कब आएगा? बड़े नेता मंचों से इसे खत्म होने की बात कहते हैं, पर सही बात यह है कि उनके मन में भी यह फर्क हमेशा रहता है। यह उनका दोहरा चरित्र है। इसे त्यागना होगा। जो मन में हो, वही जुबान पर हो। जब तक यह नहीं होगा, तब तक दलितों के मुद्दे बने ही रहेंगे। बसपा का तो आधार ही दलित हैं। - भीमराव आंबेडकर, विधायक बसपा

मुद्दे तमाम, सबसे बड़ा रोजगार
दलितों के लिए सबसे अहम है रोजगार का मामला। आरक्षण होने के बावजूद बैकलॉग का कोटा पूरा नहीं किया जा रहा है। बसपा के अलावा कोई भी पार्टी इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। बराबरी की बात केवल दावों में है। यथार्थ के धरातल पर फर्क साफ दिखाई देता है। सच्चे मायने में बसपा सुप्रीमो मायावती ने दलितों को मुख्य धारा में लाने का काम किया, पर अभी हमें बहुत मेहनत करनी होगी। यह लड़ाई सामाजिक भी है और राजनीतिक भी। -अतर सिंह राव, सचेतक विधान मंडल दल बसपा

बसपा से दलितों का भ्रम टूटा
बसपा से दलितों का भ्रम टूट गया है, क्योंकि बसपा केवल अपना स्वार्थ देख रही है। सपा के साथ दलित हैं नहीं, क्योंकि सपा ने उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। रही बात भाजपा की तो भाजपा अगड़ों का प्रतिनधित्व करती है। दलित तो इनसे वैसे ही परेशान हैं। ऐसे में भाजपा के साथ दलित जाने वाले नहीं हैं। हां, कांग्रेस ने पहले भी दलितों को आगे बढ़ाया था, वहीं अब भी अपने घोषणापत्र में दलितों के मुद्दों को विस्तार से रखा है। -पीएल पूनिया, वरिष्ठ कांग्रेस नेता

आरक्षण में होती है बेईमानी 
दलितों का जीवन ही संघर्ष से भरा है। सबसे अहम है शिक्षा। हम तो बस यही कहते हैं कि उच्च शिक्षा तक की पढ़ाई हमारे लिए मुफ्त कर दी जाए। हम अपना रास्ता बना लेेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। उच्च शिक्षा तो और महंगी कर दी गई है। प्रतिपूर्ति शुल्क का बजट तक कम कर दिया गया है। ऐसे में दलित कैसे रास्ता बना पाएंगे? आरक्षण तक में दलितों के साथ बेईमानी हो रही है। बैकलॉग पूरा ही नहीं होता है। -सर्वेश आंबेडकर, प्रदेश कमेटी सदस्य सपा

जो गरीब है, वही दलित है
हम सामाजिक समरसता का अभियान चलाते हैं। मैं कहना चाहती हूं कि गरीब केवल अनुसूचित जाति के लोग ही नहीं, सभी जातियों के लोग हैं। गरीबों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा आरक्षण है। सामान्य जाति में भी भाजपा ने गरीबों को दस प्रतिशत आरक्षण दिया। हमारी योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना हो या आयुष्मान, किसान सम्मान निधि सभी को लाभ मिल रहा है। सभी गरीबों, दलितों को  साथ लेकर भाजपा चल रही है। -डॉ. रचना पाल, समाजसेवी एवं पूर्व क्षेत्रीय मंत्री भाजपा
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