‘कौन-सी बात कहां कैसे कही जाती है, ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है’ कहने वाले मशहूर शायर वसीम बरेलवी की बात अब देखना है कि राजनीति में कितनी सुनी जाएगी। प्रदेश की सपा सरकार ने उन्हें विधान परिषद के लिए नामित किया है।
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इस घोषणा के अगले ही दिन शनिवार को राजधानी पहुंचे और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ मंच साझा करने वाले वसीम बरेलवी की ‘अमर उजाला’ से लंबी बातचीत हुई। पेश है प्रमुख अंश :
कभी कवि कुंभन दास ने कहा था ‘संतन को कहां सीकरी सो काम’, आप राजनीति में अपने जुड़ाव को किस रूप में देखते हैं?
- उस सियासी सोच का बहुत आभारी हूं जिसने कलम की इज्जत की, जिसने साहित्य के लिए दरवाजा खोला। मैंने आम आदमी के दर्द को गाया, उसे आवाज दी। किसी राजनीतिक दल ने मेरी इस छोटी-मोटी सेवा को मान्यता दी, मैं इसका आभारी हूं। राजनीति साहित्य को जितना करीब रखेगी, उतना ही समाज को समझने में मदद मिलेगी और समस्याओं के निराकरण में आसानी होगी। समाज को बेहतर समझने के लिए साहित्य आईना होता है।
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राजनीति में साहित्कार के काम करने की गुंजाइश पर
शपथ लेते वसीम बरेलवी
- फोटो : amar ujala
आज के राजनीतिक परिदृश्य में किसी साहित्यकार के लिए काम करने की कितनी गुंजाइश देखते हैं?
-साहित्यकार के लिए काम करने की गुंजाइश तो हर समाज में रहती है। साहित्यकार के लिए जो आजादी है, वह उसकी फिक्र की आजादी है, उसकी कलम की आजादी है। वह तो खुद उसमें इतना मगन होता है कि उसे इधर-उधर देखने की फुरसत नहीं होती है। ये तो सियासी हुकूमतों पर है कि वे साहित्य को कितना सम्मानित करते हैं। हम तो फकीर लोग हैं। दुनियावी तौर पर हमारे पास कुछ भी नहीं है लेकिन जो फकीरों की इज्जत करते हैं, उन्हें दूसरों की इज्जत मिलती है।
क्या पहले भी आपका राजनीतिक जुड़ाव रहा है?
-राजनीति से मेरा कभी कोई संबंध नहीं रहा है, राजनीतिक व्यक्तियों से रहा है। राजनीति में जो अच्छे लोग होते हैं, उनके लिए दिल में दुआ रहती है। अकबर महान क्यों हुए, उन्हें अकबर द ग्रेट क्यों कहा गया क्योंकि उन्होंने अपने चारों ओर साहित्यकारों को, संगीतकारों को रखा था, उन्हें नवरत्न बनाया था। यह तो एक अच्छी मानसिकता है।
राज्यसभा में भी साहित्यकारों, संगीतकारों का चयन होता है लेकिन वे सदन में अधिक समय नहीं दे पाते हैं, आप कितना समय दे पाएंगे?
-यह तो समय पर निर्भर करेगा। फिर भी कोशिश रहेगी कि जो जिम्मेदारी मुझे दी गई है, मैं उसके साथ पूरा इंसाफ कर सकूं। मैं दावे तो नहीं करता लेकिन समाज के हित के लिए, उसे संगठित रखने के लिए जो काम मेरी कलम करती रही है, हिंदुस्तान की साझी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए जो काम करता रहा हूं, यहां भी करता रहूंगा।
आपको लखनऊ में अधिक रहना होगा?
-यकीनन। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुशायरों के कारण मैं बरेली में भी अधिक नहीं रह पाता हूं लेकिन मैं चाहूंगा कि मुझे जो जिम्मेदारी दी गई है उसे पूरा करने के लिए अधिक से अधिक वक्त निकाल सकूं।
इन दिनों आपका कोई संग्रह आने वाला है?
-मेरी दो किताबें तैयार हैं। मुझ पर लेखों का एक संकलन भी है तैयार है। एक शोध पुस्तक भी तैयार हो रही है। ये सारी पुस्तकें जल्द ही आने वाली हैं।