स्वामी प्रसाद मौर्या, विधायक पडरौना, कुशीनगर
स्थानीय समीकरण : स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वामी बसपा से आकर बड़े मंत्री बन गए, लेकिन भाजपा के लोगों से घुले-मिले नहीं। भाजपा समर्थकों में इनके प्रति नाराजगी चरम पर थी। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने नेतृत्व को संदेश दे दिया था कि स्वामी को पडरौना से टिकट दिया गया तो वे सपा प्रत्याशी को वोट देना पसंद करेंगे। बाहरी को जिताने की फिर गलती नहीं करेंगे। इसके अलावा स्वामी अपने बेटे उत्कर्ष के लिए रायबरेली की ऊंचाहार सीट से फिर टिकट चाहते थे। वहां से उनका बेटा लगातार दो चुनाव सपा नेता मनोज पांडेय से हार चुका है। मनोज सपा के कद्दावर ब्राह्मण नेता माने जाते हैं। भाजपा तीसरी हार के लिए उत्कर्ष पर दांव लगाने को तैयार नहीं थी। यही नहीं, स्वामी अपने साथ आकर विधायक बने सभी सहयोगियों के टिकट न काटे जाने की गारंटी भी चाहते थे। पडरौना के लोग बताते हैं कि भाजपा ने स्वामी को बनाए रखने के लिए उनकी सीट बदलकर विधानसभा पहुंचाने की योजना बनाई थी। उन्हें पड़ोस की फाजिलनगर सीट से चुनाव लड़ाने की योजना थी। वहां के विधायक गंगा कुशवाहा 75 वर्ष पार करने की वजह से प्रत्याशी की दौड़ से बाहर हैं। स्वामी सीट बदलने को तैयार नहीं थे। इसके अलावा भाजपा खराब रिपोर्ट कार्ड वाले उनके सहयोगियों का टिकट न काटने का आश्वासन भी स्पष्टता से नहीं दे रही थी। पिछले चुनाव में स्वामी की शर्तों पर थिरकी भाजपा इस बार ऐसा करने के मूड में नहीं थी। लिहाजा, उनके लिए दूसरे ठौर की तलाश अवश्यंभावी हो गई थी। वह साथियों सहित सपा में चले गए। मौर्या की बेटी संघमित्रा मौर्या भाजपा की बदायूं से सांसद हैं।
आगे क्या : नजरें इस पर होंगी कि सपा स्वामी व उनके सहयोगियों का कहां और किस स्तर तक समायोजन करती है? दूसरा, क्या सपा मनोज पांडेय के सामने स्वामी के बेटे को तवज्जो दे पाती है? तीसरा, इनकी सीटों पर पांच वर्ष से चुनाव की तैयारी कर रहे सपा के दावेदार क्या रुख अपनाते हैं?
दारा सिंह चौहान, विधायक मधुबन, मऊ
स्थानीय समीकरण : पिछले चुनाव में बसपा से भाजपा में शामिल हुए थे। फीडबैक में इनके खिलाफ स्थानीय जनता में नाराजगी सामने आई। चौहान को भी इसका अंदाजा था। लिहाजा वे सीट बदलकर चुनाव लड़ने के प्रयास में थे। जानकार बताते हैं कि उन्होंने घोसी सीट की मांग की थी। 2017 में इस सीट से नोनिया समाज के कद्दावर नेता फागू चौहान जीते थे। वे बिहार के राज्यपाल बनाए गए, तो उप चुनाव हुआ। भाजपा ने युवा विजय राजभर को टिकट दिया और वे जीत भी गए। सुभासपा नेता ओम प्रकाश राजभर के सपा से हाथ मिलाने के बाद भाजपा विजय का टिकट काटकर दूसरे को मौका देने की स्थिति में नजर नहीं आ रही थी। दूसरा, फागू चौहान के बेटे की दावेदारी भी यहां से सामने आ रही है। ऐसे में भाजपा ने चौहान को घोसी से टिकट देने में असमर्थता जता दी। इसके बाद से ही चौहान के दलबदल की अटकलें तेज हो गई थीं।
आगे क्या : देखना है कि सपा चौहान को कहां से टिकट देती है? मधुबन में चौहान की स्थिति अच्छी नहीं है। वह घोसी से टिकट पाते हैं तो विजय टिकट पाएं या फागू चौहान के पुत्र, लड़ाई दिलचस्प होगी।
डॉ. धर्म सिंह सैनी, विधायक नकुड़, सहारनपुर
स्थानीय समीकरण : पिछले चुनाव में बसपा से भाजपा में आए थे। वे अपने क्षेत्र के मजबूत चेहरा माने जाते हैं। सैनी ने कांग्रेस का मुस्लिम चेहरा रहे इमरान मसूद को हराया था। लेकिन, उन्हें कम महत्व वाला आयुष विभाग बतौर स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री के रूप में मिला। वे प्रारंभ से ही खिन्न बताए जा रहे थे। क्षेत्र के भाजपा काडर से उनका तालमेल नहीं होने की बात आम थी। संभवत: यही वजह रही कि शुरुआती दौर में भाजपा छोड़ने की अटकलों में शामिल मंत्रियों में उनका नाम सबसे आगे था। एक बार उन्होंने भाजपा छोड़ने से इनकार भी किया, लेकिन अंत में सपा में चले गए। खास बात ये है कि पिछले दो चुनावों में वे जिन इमरान मसूद को हरा रहे थे, वे भी सपा का दामन थाम चुके हैं।
आगे क्या : देखना है कि सपा सैनी व इमरान का किस तरह समायोजन करती है? दोनों को अलग-अलग सीट के लिए सहमत किए जाने के प्रयास की बात सामने आ रही है।
राधाकृष्ण शर्मा, विधायक बिल्सी, बदायूं
स्थानीय समीकरण : बसपा प्रत्याशी के रूप में 2007 में भाजपा के पूर्व मंत्री धर्मपाल सिंह को हराया था। 2017 में भाजपा में आए। आंवला की जगह बिल्सी से टिकट मिला और विधायक बने। फीडबैक में उनकी निष्क्रियता सामने आई। भाजपा कार्यकर्ता भी नाराज थे। यह इस बार फिर आंवला से टिकट मांग रहे थे। आंवला से पूर्व सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह मौजूदा विधायक हैं। भाजपा उनका टिकट काटकर इन्हें टिकट देने का आश्वासन नहीं दे रही थी। लिहाजा सपा में चले आए।
आगे क्या : इनके समर्थकों का दावा है कि टिकट मिलने के आश्वासन पर ही सपा में गए हैं। सपा से कई लोग पहले से टिकट मांग रहे हैं।
दिग्विजय नारायण उर्फ जय चौबे, विधायक संतकबीरनगर
स्थानीय समीकरण : जय चौबे पूर्वांचल के ब्राह्मण नेता पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी परिवार के करीबी माने जाते हैं। 2017 में भाजपा से विधायक बने। यहां के लोग बताते हैं कि तिवारी समर्थक होने की वजह से इनकी योगी सरकार में ज्यादा चल नहीं पाई। कांटे को ब्लॉक मुख्यालय बनवाने और बंद पड़ी खलीलाबाद शुगर मिल को चालू करवाने जैसा कोई बड़ा वादा पूरा नहीं कर पाए। जिला पंचायत सदस्य चुनाव में उनके ज्यादातर समर्थकों को टिकट नहीं मिल सका। जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए अपने खास बलिराम यादव को टिकट नहीं दिला पाए तो सपा के समर्थन से बलिराम यादव को जिता ले गए। तभी से माना जा रहा था कि चौबे की भाजपा के साथ यात्रा बढ़ नहीं पाएगी। पिछले दिनों हरि शंकर तिवारी के बेटे चिल्लूपार विधायक विनय शंकर तिवारी, पूर्व सांसद भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी सपा में गए तो चौबे भी उनके साथ हो लिए।
आगे क्या : स्थानीय लोग बताते हैं कि चौबे अपना टिकट पक्का मानकर प्रचार कर रहे हैं। लेकिन, यहां से कई मजबूत दावेदार भी कतार में हैं।
अवतार सिंह भड़ाना, विधायक मीरापुर, मुजफ्फरनगर
स्थानीय समीकरण : अवतार सिंह भड़ाना गुर्जर समाज के प्रभावशाली नेता माने जाते हैं। वे चार बार सांसद रहे हैं। 2017 में विधायक बनने के बाद मंत्री न बनाए जाने से नाराज थे। गुर्जर समाज के ही अशोक कटारिया को एमएलसी बनाकर सरकार में मंत्री बनाए जाने से भड़ाना की नाराजगी और बढ़ गई। नतीजा ये हुआ कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भड़ाना यूपी से भाजपा विधायक रहते हुए हरियाणा की फरीदाबाद सीट से कांग्रेस प्रत्याशी बनकर चुनाव लड़ आए। वहां चुनाव हार गए, लेकिन, समाज का कद्दावर नेता होने की वजह से भाजपा ने इनके खिलाफ दलबदल की कार्रवाई नहीं की। अब चुनाव से पहले वह रालोद में चले गए हैं।
आगे क्या : रालोद ने अवतार को प्रत्याशी घोषित कर दिया है। भाजपा के प्रत्याशी पर लोगों की नजर है।
डॉ. मुकेश वर्मा, विधायक शिकोहाबाद, फिरोजाबाद
स्थानीय समीकरण : पिछले चुनाव में बसपा से आकर भाजपा की सियासत करने वाले डॉ. मुकेश स्वामी प्रसाद के समर्थक माने जाते हैं। भाजपा से वे पहली बार विधायक बने। बताया जा रहा है कि दो विधायकों के बीच हुई बात वायरल होकर चर्चा का विषय बनी। जैन मंदिर पुजारी से अभद्रता व जमीन से जुड़े कई प्रकरण में उनकी भूमिका की शिकायत पार्टी नेतृत्व तक पहुंची थी। फीडबैक में स्थिति कमजोर होने की भनक मिलते ही उनका स्वामी के साथ जाना तय हो गया था।
आगे क्या : सपा के पूर्व विधायक ओम प्रकाश वर्मा इस बार भी टिकट के तगड़े दावेदार हैं। ऐसे में डॉ. मुकेश की स्थिति पर निगाहें टिकी हैं।
राकेश राठौर, विधायक, सीतापुर
स्थानीय समीकरण : सीतापुर से भाजपा विधायक राकेश राठौर की पृष्ठभूमि भी बसपा की रही है। 2017 में वे भाजपा से विधायक बने, लेकिन पार्टी नेताओं से तालमेल नहीं बन सका। कोविड काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ताली और थाली के प्रयोग पर तंज कसा था। सरकार पर भी निशाना साधते रहे। यहां तक कह दिया कि योगी सरकार में विधायकों की सुनने वाला कोई नहीं है। भाजपा से उनका टिकट कटना पक्का माना जा रहा था। भाजपा से सपा में जाने वाले वह पहले विधायक थे।
आगे क्या : नगर पालिका के अध्यक्ष और सपा के कई बार विधायक रहे राधेश्याम जायसवाल पहले से टिकट मांग रहे हैं। ऐसे में राठौर की स्थिति पर नजरें टिकी हैं।
भगवती प्रसाद, विधायक बिल्हौर, कानपुर नगर
स्थानीय समीकरण : पूर्व में बसपा से विधायक और मंत्री रहे भगवती प्रसाद 2017 में बीजेपी के टिकट पर बिल्हौर से जीते थे। फीडबैक में सामने आया कि ये क्षेत्र में सक्रिय नहीं रहे। भाजपा कार्यकर्ताओं व समर्थकों में नाराजगी थी। इसके चलते टिकट कटने की चर्चा थी। हालांकि, भगवती प्रसाद न सिर्फ फिर से बिल्हौर से लड़ना चाहते थे, बल्कि अपने बेटे के लिए झांसी की मऊरानीपुर सीट से भी टिकट चाहते थे। वे मऊरानीपुर से विधायक रह चुके थे। बिल्हौर से भाजपा की ओर से पूर्व डीजीपी व राज्य सभा सदस्य बृजलाल की पत्नी को प्रत्याशी बनाने की चर्चा तेज हो गई थी। बात बनती नहीं दिखी तो सपा के साथ हो लिए।
आगे क्या : कानपुर की बिल्हौर व घाटमपुर और झांसी की मऊरानीपुर में से किसी सीट पर भगवती या इनके पुत्र को टिकट दिए जाने की चर्चा है।
बृजेश प्रजापति, विधायक तिंदवारी, बांदा
स्थानीय समीकरण : बृजेश सत्ताधारी दल के विधायक होने के बावजूद शुरू से अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़े करते रहे हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि वे स्वामी प्रसाद मौर्या के समर्थक हैं। स्थानीय भाजपा नेताओं से उनकी कभी नहीं पटी। उन्होंने सरकार में भ्रष्ट अफसरों के हावी होने के आरोप लगाए। अवैध खनन व ओवरलोडिंग की जांच के लिए खुद ही पहुंच गए। इससे कई बार विभागीय अमले से टकराव की नौबत आई। उन्हें पहले ही संकेत दे दिया गया था कि मौजूदा सीट पर टिकट मिलना मुश्किल है।
आगे क्या : पूर्व से तैयारी कर रहे कई स्थानीय दावेदारों के बीच टिकट पर नजर।
रोशन लाल, विधायक तिलहर, शाहजहांपुर
स्थानीय समीकरण : रोशन लाल 2017 में बसपा से भाजपा में आए थे। तब कांग्रेस नेता रहे जितिन प्रसाद को हराया था। जितिन अब भाजपा में शामिल होकर मंत्री व एमएलसी हैं। बताया जा रहा है कि जितिन के भाजपा में आने के बाद से रोशनलाल असहज महसूस कर रहे थे। वे कहते रहे हैं कि शाहजहांपुर में वरिष्ठ मंत्री सुरेश कुमार खन्ना के अलावा किसी विधायक को तवज्जो नहीं मिल रही। रोशनलाल पर स्वामी प्रसाद का समर्थक होने की छाप थी।
आगे क्या : भाजपा का प्रत्याशी तय होने के बाद स्थिति स्पष्ट होगी। रोशनलाल का सपा से टिकट तय बताया जा रहा है।
चौधरी अमर सिंह, विधायक शोहरतगढ़, सिद्धार्थनगर
स्थानीय समीकरण : अमर भाजपा के सहयोगी दल अपना दल (एस) से पहली बार विधायक बने थे। स्थानीय लोग बताते हैं कि अमर का भाजपा व अपना दल दोनों से सामंजस्य नहीं रहा। काफी समय पहले से ही अपनी गाड़ी व घर पर अपनी पार्टी का झंडा तक लगाना बंद कर दिया था। स्थानीय भाजपा सांसद जगदंबिका पाल पर भी निशाना साध चुके थे। पूरे कार्यकाल में विपक्ष के नेता की तरह काम करते रहे और सरकार के खिलाफ बयानबाजी की। पंचायत चुनाव में उन्होंने परिवार व रिश्ते के तीन लोगों को प्रधान, बीडीसी व जिला पंचायत सदस्य जिताने में सफलता हासिल की। बाद में ब्लॉक प्रमुख का चुनाव हुआ तो भाजपा के वॉकओवर से पत्नी को प्रमुख भी बनवा लिया। ऐसी परिस्थितियों में उन्हें भाजपा गठबंधन से टिकट मिलना मुश्किल हो गया था।
आगे क्या : देखना ये है कि भाजपा व अपना दल (एस) गठबंधन में यह सीट किसके हिस्से में जाती है। सपा से अमर को टिकट मिलने पर लड़ाई दिलचस्प होगी।
बाला प्रसाद अवस्थी, विधायक धौरहरा, लखीमपुर खीरी
स्थानीय समीकरण : बाला प्रसाद अवस्थी दो बार बसपा से विधायक रहने के बावजूद लखीमपुर खीरी में भाजपा काडर के नेता माने जाते हैं। दो बार भाजपा से विधायक और एक बार जिलाध्यक्ष रहे हैं। धौरहरा के अलावा मोहम्मदी से भी विधायक रह चुके हैं। क्षेत्र के लोग बताते हैं कि अवस्थी की क्षेत्र में सक्रियता कम थी। इससे भाजपा ने दूसरे कार्यकर्ता को भी तैयारी का संकेत दे दिया था। तिकुनिया में किसानों के साथ घटना ने भाजपा का माहौल प्रभावित किया। इससे टिकट मिलने पर भी अवस्थी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे और उन्होंने सपा को चुन लिया।
आगे क्या : सपा से पूर्व विधायक शमशेर बहादुर सिंह, पूर्व विधायक यशपाल चौधरी के बेटे वरुण चौधरी पहले से टिकट मांग रहे हैं। अवस्थी तीसरे दावेदार हैं। सपा किसे टिकट देती है, इस पर सभी की निगाहें हैं।
विनय शाक्य, विधायक विधूना, औरैया
स्थानीय समीकरण : सपा शासनकाल में विधानसभा अध्यक्ष रहे धनीराम वर्मा को 2012 में हराकर विनय चर्चा में आए थे। 2007 में वे वर्मा से हारे थे तो बसपा ने एमएलसी व दर्जा प्राप्त मंत्री बना दिया। 2017 में भाजपा में शामिल हुए और फिर विधायक बन बए। इन्हें स्वामी प्रसाद गुट का माना जाता है। मौर्या जब बसपा से भाजपा में गए तो ये भी भाजपा में पहुंच गए। अब मौर्या सपा में गए तो विनय वहां भी चले आए। पूरे क्षेत्र में विनय व पारिवारिक सदस्यों में मनभेद की चर्चा सरगर्म है। लोग बताते हैं कि विनय की बेटी रिया ने भाजपा से टिकट के लिए आवेदन कर दिया है। भाजपा का स्थानीय शाक्य खेमा रिया का पर्दे के पीछे समर्थन कर रहा है। इसके अलावा अब तक सपा से डॉ. नवल किशोर भी तैयारी कर रहे थे। स्वामी प्रसाद व विनय के सपा में जाने से नवल की दावेदारी कमजोर हो गई है। दूसरा, नवल की स्वामी प्रसाद के परिवार से खराब संबंध भी चर्चा का विषय है। टिकट न मिलने पर नवल का समर्थन भी रिया को मिल सकता है।
आगे क्या : सपा से विनय व भाजपा से रिया की दावेदारी हुई तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
माधुरी वर्मा, नानपारा, बहराइच
स्थानीय समीकरण : माधुरी कद्दावर राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं। पति दिलीप वर्मा कई बार विधायक रहे हैं। माधुरी खुद बसपा के समर्थन से एमएलसी, कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में विधायक रही हैं। 2017 में वे भाजपा से विधायक बनीं। बताया जा रहा है कि इनके पति दिलीप वर्मा की कार्यशैली ने भाजपा में इनकी स्थिति कमजोर कर दी थी। एक राजस्व अधिकारी से विवाद में दिलीप के खिलाफ एफआईआर हुई थी। इसके बाद जिला पंचायत चुनाव में दिलीप ने भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इससे माधुरी को टिकट मिलना मुश्किल हो गया था। स्थिति भांपते हुए पहले दिलीप वर्मा और बाद में माधुरी सपा में शामिल हो गईं।
आगे क्या : पिछले पांच साल से चुनाव की तैयारी कर रहे कृपा राम वर्मा भी टिकट के प्रबल दावेदार हैं। माधुरी व दिलीप के सपा में आने से टिकट को लेकर मारामारी रहेगी।